खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा भाजपा में चुनावी बैठकों का दौर
निर्वाचन प्रभारी व विधायक संजय कुटे कल फिर शहर में

* विधायक राणा की युवा स्वाभिमान पार्टी को लेकर होगी विशेष बैठक
* युति होने के बावजूद भाजपा के सामने राणा ने उतारे अपने 41 उम्मीदवार
* अजीबो-गरीब समस्या को लेकर भाजपा में जबरदस्त ‘माथापच्ची’ शुरु
* समस्या का समाधान भाजपा के स्थानीय नेताओं की समझ से पूरी तरह परे
* भाजपा के लिए गठबंधन बना बोझ, रणनीति बनी उलझन, नियोजन पर जमकर लग रहे सवालिया निशान
अमरावती/दि.1 – अमरावती महानगरपालिका चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के भीतर चुनावी बैठकों का दौर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. हालात यह हैं कि निर्वाचन प्रभारी व विधायक संजय कुटे कल एक बार फिर शहर में डेरा डालने वाले हैं. लगातार बैठकों के बावजूद पार्टी की उलझनें सुलझने के बजाय और गहराती नजर आ रही हैं. इस बार बैठक का केंद्रबिंदु रहने वाली है विधायक रवी राणा की युवा स्वाभिमान पार्टी, जिसके साथ युति घोषित होने के बावजूद विधायक राणा ने भाजपा के सामने ही अपने 41 उम्मीदवार मैदान में उतार दिए, जिससे गठबंधन की वास्तविक स्थिति पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है.
बता दें कि, भाजपा ने युति को लेकर चल रही चर्चाओं के दौरान बार-बार यह दोहराया था कि, युति के तहत युवा स्वाभिमान पार्टी के लिए भाजपा द्वारा 9 सीटें छोडी जाएंगी. लेकिन हकीकत में भाजपा ने युति के तहत युवा स्वाभिमान पार्टी के लिए महज 6 सीटें ही छोडी है और 69 सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर किए है. ज्ञात रहे कि, मनपा की 87 सीटों में से 3 मुस्लिम बहुल प्रभागों की 12 सीटों को छोडकर 75 सीटों को लेकर ही भाजपा की शिंदे सेना व युवा स्वाभिमान पार्टी के साथ चर्चा चल रही थी. ऐसे में भाजपा द्वारा युति के तहत युवा स्वाभिमान पार्टी के लिए केवल 6 सीटें ही छोडे जाने और 75 में से 69 सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम घोषित किए जाने के तुरंत बाद युवा स्वाभिमान पार्टी ने उन 6 सीटों के साथ-साथ अन्य 35 सीटों के लिए अपने 41 अधिकृत प्रत्याशियों के नामों की सूची जारी करने के साथ ही पार्टी प्रत्याशियों के नाम बी-फॉर्म भी जारी कर दिए. जिसके चलते कई सीटों पर भाजपा और युवा स्वाभिमान पार्टी के प्रत्याशी ही एक-दूसरे के आमने-सामने है. जिसकी वजह से दोनों दलों के पदाधिकारियों सहित आम मतदाताओं में भाजपा व युवा स्वाभिमान पार्टी की इस अजीबो-गरीब युति को लेकर काफी असमंजस वाली स्थिति है. हालांकि भाजपा द्वारा इस मामले को लेकर बात के बढते ही यह कहते हुए अपना दामन बचाने का प्रयास किया गया कि, भाजपा ने युवा स्वाभिमान पार्टी के लिए 6 सीटें छोडने के साथ ही 2 सीटों पर युवा स्वाभिमान पार्टी के पदाधिकारियों को ‘कमल’ चुनाव चिन्ह पर भाजपा का प्रत्याशी बनाया है. जिसकी वजह से भाजपा द्वारा युवा स्वाभिमान पार्टी को 8 सीटें दी गई है. परंतु भाजपा का यह तर्क किसी के पल्ले नहीं पड रहा. क्योंकि यदि उन दोनों सीटों पर भाजपा के ‘कमल’ चुनाव चिन्ह के साथ प्रत्याशी के तौर पर खडे दावेदार चुनाव जीतते है, तो वे भाजपा के प्रत्याशी कहलाएंगे और उन पर भाजपा का ही व्हीप चलेगा. इसके चलते फिलहाल युवा स्वाभिमान पार्टी के पास युति के तहत भाजपा की ओर से केवल 6 सीटे ही छोडी गई है. जिसकी वजह से युवा स्वाभिमान पार्टी ने 41 सीटों पर दावा ठोंक दिया है. जिसे लेकर दोनों के बीच अच्छा-खासा तनाव भी कहा जा सकता है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सीटों का विवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व और नेतृत्व की चुनौती का खुला प्रदर्शन है. जिस युति को चुनावी ताकत बताया जा रहा था, वही अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी बन चुकी है. भाजपा के भीतर इस स्थिति को लेकर जबरदस्त ‘माथापच्ची’ चल रही है. समस्या इतनी उलझी हुई है कि इसका समाधान स्थानीय भाजपा नेताओं की समझ से पूरी तरह परे बताया जा रहा है. यही वजह है कि बार-बार बाहर से प्रभारी बुलाने पड़ रहे हैं, फिर भी कोई ठोस फार्मूला सामने नहीं आ पा रहा.
लगातार बदलते फैसले, सार्वजनिक घोषणाओं और ज़मीनी हकीकत के बीच के फर्क ने भाजपा के चुनावी रणनीतिक नियोजन को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है. पार्टी कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति है कि आखिर लड़ाई किसके साथ और किसके खिलाफ है. अब सवाल यह नहीं रह गया कि भाजपा कितनी सीटें जीतेगी, बल्कि यह बनता जा रहा है कि क्या भाजपा अपनी अंदरूनी उलझनों से बाहर निकल पाएगी, या यही उलझनें चुनावी नुकसान की वजह बनेंगी?
* युति या यूज़ एंड थ्रो राजनीति?
अमरावती महानगरपालिका चुनाव में अब मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम विपक्ष तक सीमित नहीं रह गया है. असली लड़ाई भाजपा और उसके तथाकथित सहयोगी विधायक रवी राणा के बीच खुलकर सामने आ चुकी है. युति के नाम पर जिस तालमेल का दावा किया जा रहा था, वह ज़मीनी हकीकत में सीधा टकराव बन चुका है. भाजपा के साथ युति होने के बावजूद राणा की युवा स्वाभिमान पार्टी द्वारा 41 उम्मीदवार मैदान में उतारना किसी राजनीतिक भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी ताकत आज़माइश माना जा रहा है. यह कदम सीधे तौर पर भाजपा नेतृत्व को यह संदेश देता है कि अमरावती में राणा किसी के बैसाखी पर चुनाव नहीं लड़ रहे.
* भाजपा की दुविधा: दबाव में समझौता या टकराव?
भाजपा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह राणा की इस चुनौती को स्वीकार कर सख्ती दिखाए, या फिर सत्ता संतुलन के नाम पर सब कुछ नजरअंदाज़ करे. यही असमंजस भाजपा की रणनीति को बार-बार बदलने पर मजबूर कर रहा है. नतीजा यह है कि भाजपा द्वारा निर्वाचन प्रभारी संजय कुटे को बार-बार अमरावती बुलाया जा रहा है, फिर भी कोई ‘फाइनल लाइन’ तय नहीं हो पा रही.
* स्थानीय नेतृत्व हाशिये पर, फैसले बाहर से
इस टकराव ने भाजपा के स्थानीय नेतृत्व की सीमाएं भी उजागर कर दी हैं. हालात ऐसे बन चुके हैं कि समस्या का समाधान स्थानीय नेताओं के बूते का नहीं माना जा रहा, और हर फैसला ‘ऊपर’ से आने का इंतजार कर रहा है. इससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि पार्टी अंदर से एकजुट नहीं है.
* भाजपा की रणनीति पर राणा भारी?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि भाजपा ने राणा को साथ लेकर जिस राजनीतिक जोखिम को कम आंक लिया था, वही अब पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. युति का गणित भाजपा के पक्ष में नहीं, बल्कि राणा के दबाव की राजनीति के पक्ष में जाता दिख रहा है.
* चुनाव से पहले शक्ति परीक्षण
अमरावती का यह चुनाव अब केवल सीटों का नहीं, बल्कि कौन किस पर भारी है, इसका शक्ति परीक्षण बन गया है. यदि भाजपा पीछे हटती है, तो संदेश जाएगा कि राणा की शर्तों पर राजनीति हो रही है. और यदि भाजपा टकराव चुनती है, तो नुकसान दोनों पक्षों का तय माना जा रहा है. एक बात तय है कि इस बार अमरावती में भाजपा की सबसे कठिन लड़ाई विपक्ष से नहीं, अपने ही सहयोगी राणा से है. ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि, मनपा चुनाव के लिए युति के नाम पर एक-दूसरे के साथ रहनेवाली दोनों पार्टियों के बीच ‘अंदरबट्टे’ में चल रही तनातनी का नतीजा क्या निकलता है.





