मोनिका उमक को भाजपा की टिकट नहीं मिलने से पार्टीजनों में असंतोष

भाजपा में टिकट बांटने को लेकर जमकर भेदभाव होने का आरोप

अमरावती /दि.2शिक्षा, समाजसेवा, महिला सशक्तिकरण और मानवीय संवेदना को केवल भाषणों तक सीमित न रखते हुए ज़मीनी स्तर पर कार्य करने वाली प्रा. मोनिका उमक को इस बार मनपा के चुनाव हेतु प्रभाग क्र. 7 जवाहर स्टेडियम से भाजपा की टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, परंतु भाजपा ने ऐन समय पर प्रा. मोनिका उमक का टिकट काटते हुए किसी अन्य को इस प्रभाग से पार्टी प्रत्याशी बनाया है. ऐसे में प्रा. मोनिका उमक के साथ हुए कथित अन्याय को लेकर इन दिनों अमरावती शहर में तीव्र असंतोष देखने को मिल रहा है.
बता दें कि, प्रा. मोनिका उमक पिछले 12 से 15 वर्षों से भाजपा से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है तथा उच्च शिक्षित पीएच.डी. धारक, छह पुस्तकों की लेखिका और हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली प्रा. मोनिका उमक जैसी सामाजिक कार्यकर्ता को दरकिनार कर राष्ट्रवादी कांग्रेस से आए एक पूर्व कार्यकर्ता को भाजपा की टिकट दिए जाने से राजनीतिक गलियारों में नाराज़गी फैल गई है. जिसके चलते अब खुलेआम यह सवाल उठाया जा रहा है यह निर्णय पार्टी का है या कुछ खास रिश्तों का?
ज्ञात रहे कि, स्वरोजगार, उद्यमिता, महिला सशक्तिकरण, नेत्रदान जनजागरण जैसे अनेक सामाजिक उपक्रमों के माध्यम से प्रा. मोनिका उमक अब तक 10 हजार से अधिक महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला चुकी हैं. विधवा, परित्यक्ता और निराधार महिलाओं को ऋण उपलब्ध कराना, उनके लिए छोटे उद्योग खड़े करना और स्वाभिमान से जीने का मार्ग दिखाना-यह सब उन्होंने बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के किया. इसके बावजूद मजबूत जनाधार रखने वाली इस कार्यकर्ता को टिकट से वंचित किए जाने पर पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष है. दूसरी ओर, दूसरे दल से हाल ही में भाजपा में शामिल हुए एक उम्मीदवार को तुरंत टिकट दिए जाने को लेकर शहर में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं. नागरिकों के बीच यह चर्चा आम है कि संबंधित उम्मीदवार भाजपा के एक प्रभावशाली नेता के करीबी रिश्तेदार हैं. इस पूरे घटनाक्रम के बाद अमरावती में पिछले चार-पांच दिनों से एक ही सवाल गूंज रहा है कि, क्या पार्टी के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कोई कीमत नहीं रह गई है?
सामान्य नागरिकों में भी गहरी नाराज़गी देखी जा रही है और सवाल पूछे जा रहे है कि, क्या अब अपक्षता और पार्टी निष्ठा केवल दिखावे की बातें बन गई हैं और क्या अपने रिश्तेदारों को टिकट देने के लिए ज़मीनी कार्यकर्ताओं को किनारे किया जा रहा है. नागरिकों का कहना है कि यदि प्रा. मोनिका उमक को अवसर मिला होता, तो अमरावती में सैकड़ों और महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकती थीं. विधवा और परित्यक्ता महिलाओं के लिए नए सामाजिक कार्यक्रम शुरू होते और समाज के लिए काम करने वाले अनेक लोगों को रोज़गार मिलता. लेकिन टिकट न देकर उनके सामाजिक कार्यों पर ही जैसे रोक लगा दी गई.
अब शहर में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि, मोनिका उमक की गलती क्या है? वे कहां कमज़ोर पड़ीं? उन्होंने ऐसा क्या किया कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया? यह प्रश्न अब केवल उनके समर्थकों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आम नागरिक भी इन्हें पूछ रहे हैं. यह अन्याय आखिर किसका है? पार्टी के निर्णय का या कुछ गिने-चुने राजनीतिक संबंधों के दबाव का? अमरावती की राजनीति में आज एक कड़वा सच सामने आता दिख रहा है कि, जनता के लिए काम करने वालों को नहीं, बल्कि ‘पहचान’ रखने वालों को ही अवसर दिए जा रहे हैं. यह मुद्दा केवल प्रा. मोनिका उमक का नहीं, बल्कि जननिष्ठ कार्यकर्ताओं के अस्तित्व से जुड़ा सवाल बन चुका है.

Back to top button