‘निर्विरोध’ का मामला पहुंचा अदालत में
राज्य के मनपा चुनाव में महायुति के 66 पार्षद चुने गए निर्विरोध

* मनसे की हाईकोर्ट में याचिका, एड. असीम सरोदे ने दी जानकारी
* जनप्रतिनिधि कानून में निर्विरोध की अवधारणा नहीं
* निर्विरोध निर्वाचन की आड में कई गलत काम होने का लगाया आरोप
मुंबई/दि.5 – राज्य में नगरपालिका चुनावों के बाद अब महापालिका चुनावों में भी ‘निर्विरोध निर्वाचन’ की बाढ़ आ गई है. भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) महायुति के लगभग 70 उम्मीदवार बिनविरोध निर्वाचित होने के बाद विपक्ष ने इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. ठाणे से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेता अविनाश जाधव ने पत्रकार परिषद में आरोप लगाया कि ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में कई स्थानों पर धमकी, दबाव और पैसों के लालच देकर उम्मीदवारों से नामांकन वापस करवाया गया. उन्होंने इन आरोपों के समर्थन में कुछ सबूत भी पेश किए हैं.
मनसे नेता अविनाश जाधव और कांग्रेस नेता समीर गांधी की ओर से महापालिका चुनावों में बिनविरोध चुने गए उम्मीदवारों के खिलाफ मुंबई उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की गई है. पुणे के वरिष्ठ विधिज्ञ एड. असीम सरोदे ने इसकी पुष्टि की. एड. असीम सरोदे के अनुसार, जाधव ने उन्हें फोन कर बताया कि मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने महापालिकाओं में बड़ी संख्या में बिनविरोध चुने गए उम्मीदवारों को लेकर नाराजगी व्यक्त की है और इस पूरे मामले का समाधान न्यायालय के माध्यम से होना चाहिए. सरोदे ने कहा कि राज्य में 68 से 70 सीटें बिनविरोध हुई हैं, जिनमें लगभग 50 सीटें भाजपा, 20 सीटें शिंदे गुट और कुछ अन्य दलों की हैं. उन्होंने इसे नए साल में महाराष्ट्र को मिला राजनीतिक भ्रष्टाचार का तोहफा करार दिया.
एड. सरोदे ने आरोप लगाया कि राज्य निर्वाचन आयोग इस मामले में पक्षपाती भूमिका निभा रहा है और सत्ताधारी दल के दबाव में काम कर रहा है. हालांकि आयोग ने कुछ स्थानों पर जांच शुरू की है, लेकिन उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता, ऐसा भी कहा गया. एड. सरोदे ने कहा कि, सोलापुर में मनसे नेता बालासाहेब सरवदे की नामांकन वापसी के मुद्दे पर हत्या हुई. कई स्थानों पर उम्मीदवारों की खरीद-फरोख्त की गई. पैसे और आपराधिक तत्वों का खुलेआम इस्तेमाल हुआ. उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बंगले से जुड़े वीडियो वायरल हुए हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों की जांच निर्वाचन आयोग के बजाय उच्च न्यायालय की निगरानी में होनी चाहिए.
याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘निर्विरोध’ की अवधारणा लोकप्रतिनिधि अधिनियम में मौजूद नहीं है. कानून में केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधि का उल्लेख है. इसलिए निर्विरोध विजयी उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम मत प्रतिशत तय किया जाए. जांच पूरी होने तक बिनविरोध चुनाव परिणाम घोषित न किए जाएं. पूरी प्रक्रिया की न्यायिक जांच कराई जाए. इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले, यानी 16 तारीख से पूर्व, इस याचिका को हाईकोर्ट की बोर्ड पर लिया जाए.





