ठाकरे के गढ में डेप्युटी सीएम शिंदे की अग्निपरीक्षा

भाजपा के सहारे चुनौती पार हुई तो सियासी कद और बढ़ेगा

मुंबई /दि.9 – शिवसेना से बाहर निकलने के बाद एकनाथ शिंदे ने अपने लिए भाजपा का समर्थन हासिल किया था और वे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री भी बने थे. साथ ही वर्ष 2024 में हुए विधानसभा चुनाव पश्चात उनके हिस्से में उपमुख्यमंत्री पद आया. विधानसभा चुनाव में उन्होंने उद्धव ठाकरे की शिवसेना को आसानी से मात दी. लेकिन अब मुंबई महानगरपालिका चुनाव के बहाने वे सीधे ठाकरे के गढ़ में सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा का सामना कर रहे हैं.
यहा यह विशेष उल्लेखनीय है कि, ठाकरे परिवार के पास ‘मातोश्री’, शिवसेना भवन और दशकों से बना राजनीतिक-भावनात्मक ब्रांड है. इसके बावजूद शिंदे ने उसी ब्रांड को खुली चुनौती दी है. बगावत के दौरान उन्होंने शिवसेना के 40 विधायकों को अपने साथ किया, मुख्यमंत्री बने और मुंबई में उद्धव गुट के 60 से अधिक पूर्व नगरसेवकों को भी तोड़ा. एकनाथ शिंदे अपने आप में अलग किस्म का राजनीतिक व्यक्तित्व हैं. कब सोते हैं और कब उठते हैं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. देर रात तक कार्यकर्ताओं के बीच रहने के बाद भी सुबह नई ऊर्जा के साथ मैदान में उतर जाना उनकी पहचान बन चुकी है. कार्यकर्ताओं को समय पर संसाधन और समर्थन उपलब्ध कराना उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है. यही गुण उन्हें उद्धव और राज ठाकरे की तुलना में संगठनात्मक रूप से अधिक मजबूत बनाता है. भाषण कला और तंज कसने की शैली शिंदे की मूल पहचान नहीं रही, लेकिन सत्ता और संघर्ष के अनुभव ने उन्हें यह हुनर भी सिखा दिया है. हाल ही में मुंबई में हुई संयुक्त सभा में इसका साफ संकेत देखने को मिला.
* ‘डबल ठाकरे ब्रांड’ बनाम ‘ठाकरे’
अब तक लोकसभा और विधानसभा चुनावों में शिंदे का मुकाबला केवल उद्धव ठाकरे से था, लेकिन मुंबई महानगरपालिका चुनाव में पहली बार उन्हें उद्धव-राज ठाकरे की जोड़ी का सामना करना पड़ रहा है. एक तरह से यह मुकाबला ‘डबल ठाकरे ब्रांड’ बनाम ‘ठाकरे’ का है. हालांकि शिंदे के पीछे भाजपा की मजबूत संगठनात्मक और चुनावी ताकत खड़ी है. एक साधारण ऑटो रिक्शा चालक से मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले शिंदे यदि भाजपा के सहयोग से मुंबई महानगरपालिका जीत लेते हैं, तो यह उनकी राजनीतिक नेतृत्व क्षमता को नई चमक देगा और उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति में और मजबूत स्थिति में खड़ा कर देगा.
* कुछ गंवाने की चिंता किए बिना झोंक देने वाला नेता
ठाकरे परिवार से मुकाबले के साथ-साथ शिंदे को कभी-कभी भाजपा के साथ भी अंदरूनी संघर्ष का सामना करना पड़ता है-चाहे वह मुंबई-ठाणे में सीटों का बंटवारा हो या सत्ता संतुलन का प्रश्न. बावजूद इसके, शिंदे अपने हिस्से की बात मनवाने में पीछे नहीं हटते. अपने साथ कोई राजनीतिक हिरासत या पार्श्वभूमि नहीं रहनेवाले डेप्युटी सीएम शिंदे अक्सर कहते हैं कि ‘हम राजनीतिक क्षेत्र में क्या लेकर आए थे, जो हमें कुछ खोने का डर हो.’ यही सोच उन्हें जोखिम उठाने और पूरी ताकत से झोंक देने वाला नेता बनाती है. फिलहाल, मुंबई महानगरपालिका चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी और निर्णायक चुनौती साबित होने जा रही है.

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