मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमा परिसर में चित्रलेखों का रहस्य आज भी कायम

सतपुडा पर्वतश्रृंखलाओं में छिपी है प्राचीन विरासत

* शालेय पाठ्यक्रमों में शामिल
अमरावती/दि.9 – मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमा पर मोर्शी से कुछ दूरी पर फैली सतपुडा पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है. इस पर्वत श्रृंखला को सतपुडा पर्वतमाला के नाम से जाना जाता है. हालांकि, ऐतिहासिक शोध के अनुसार, यह क्षेत्र गाविलगढ के पूर्वी भाग के रूप में जाना जाता है. पुराने विद्वानों का कहना है कि पूर्व के स्कूल पाठ्यक्रम में, विशेष रूप से 1962 में मध्य प्रदेश की चौथी कक्षा की पुस्तकों में, इस क्षेत्र का उल्लेख ‘घास का जंगल’ के रूप में किया गया था. इस सतपुडा पर्वत श्रृंखला में कई रहस्य छिपे हैं. इतिहासकारों ने यहां समय-समय पर शोध किया है. आज भी, यदि आप इस पर्वत पर जाएं, तो कई अद्भुत चीजें देखने को मिलेंगी. सामान्य दृष्टि से देखने पर ऐसा लगता है मानो पर्वत पर रंगोली बनाई गई हो. हालांकि, विद्वानों का मानना है कि ये रंगोली नहीं बल्कि उस अतीत की आदिम और जनजातीय संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं. कुछ स्थानों पर पत्थरों पर नक्कशी भी है.
प्राकृतिक रंगों से बनी ये चित्रकारी कुछ स्थानों पर आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं. चिंचोली गवली से आगे बढते हुए, सबसे पहले भोरकप अम्बादेवी मंदिर क्षेत्र का आता है. इस क्षेत्र के पहाडों को ध्यान से देखने पर चट्टानों पर विभिन्न रंगों में चित्रित खरगोश, हिरण, बाघ और उछलते हुए हिरण जैसे जानवरों के कई चित्र हैं. कुछ चित्र नक्काशीदार हैं, जबकि कुछ रंगीन हैं. इसके साथ ही, विभिन्न आकृतियों के चित्र भी दिखाई देंगे.
* नक्काशी काम से भी अधिक सुंदर और स्पष्ट
स्थानीय आदिवासी इस चित्रकारी को ‘गोंधन कला’ कहते हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह गोंधन कला आदिवासी घरों पर की गई नक्काशी से कहीं अधिक सुंदर, स्पष्ट और कलात्मक है.
* ‘बोलचाल’ कार्यक्रम से जुडी परंपराएं
स्थानीय निवासियों के अनुसार, दिवाली के तीसरे दिन होने वाली ‘बोलना’ की परंपरा इन पहाडों में आज भी निभाई जाती है. ऐसा कहा जाता है कि पूर्वजों ने अपनी विरासत, परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित रखने के लिए चट्टानों पर इस रूप में प्रतीक और चित्र बनाए थे.
* हजारों वर्षों की विरासत
कुछ विद्वानों के अनुसार, यह विरासत महज कुछ सदियों पुरानी नहीं है, बल्कि प्राचीन काल से चली आ रही है. अपनी पहचान, जीवनशैली और विचारधारा को विश्व के समक्ष संरक्षित रखने के लिए उस समय के लोगों ने पौधों से बने रंगों का उपयोग करके ये चित्र बनाए होंगे. इस अमूल्य विरासत का संरक्षण, सुरक्षा और जनमानस तक विस्तृत जानकारी का प्रसार आज समय की सर्वोच्च आवश्यकता बन गया है.

 

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