काहे का काडर, काहे का संगठन, इतना कम वोटिंग!
धरे रह गए दलों के दावे

* प्रत्याशियों के मित्र परिवार ने निकाले घरों से वोट
* क्या महज शहरीकरण है जिम्मेदार?
अमरावती/दि.16- चुनाव आते ही अनेकानेक राजनीतिक दल अपने काडर बेस, अनुशासन और पक्के वोट बेस के दावे करते आए हैं. मगर अमरावती महापालिका का गुरूवार 15 जनवरी को हुआ अल्प वोटिंग इन दावों की बखिया उधेड रहा है. प्रशासन का भी वोटिंग प्रतिशत बढाने के लिए किया गया कथित जनजागरूकता अभियान तो सवालों के घेरे में आया ही हैं. वहीं अनेक दलों के दावों को भी खोखला साबित कर रहा है. वह तो महापालिका चुनाव लड रहे उम्मीदवारों के मित्रजनों ने मेहनत ली. नहीं तो कई प्रभागों में मतदान की कंडिशन और भी बुरी हो जाने की चर्चा समस्त भागों में हो रही हैं. महापालिका चुनाव के वोटिंग पश्चात विचारकों को यह प्रश्न साल रहा है कि इतना कम मतदान कैसे हो सकता है. इसी के साथ कई प्रकार के प्रश्न भी उपस्थित हो रहे हैं. जिसमें विभिन्न दलों के अपने पक्के वोट, काडर बेस और अनुशासन के दावे भी थोथे सिध्द हो जाने की चर्चा अब हो रही हैं.
केवल 53 फीसदी वोटिंग
मनपा के 22 प्रभागों में कुछ एक को छोडकर मात्र 52-53 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया हैं. चुनाव आयोग द्बारा दिया गया मतदान का फाइनल आंकडा 3 लाख 63 हजार रहा. अर्थात करीब सव्वातीन लाख लोग वोट डालने के लिए घरों से ही नहीं निकले. जबकि शहरी एरिया होने से सभी प्रकार के साधन उपलब्ध रहते हैं. इससे भी प्रश्न उपस्थित हुआ है कि दलों का काडर बेस होने का दावा गलत तो नहीं हैं? उसी प्रकार अनुशासन की बडी लफ्फाजी करनेवाली पार्टीयां भी अब इस तरह के दावे करने से पहले सोच विचार ले तो बेहतर रहेगा. मतदान के प्रमुख प्रभागों के आंकडे खुद अपनी कहानी कह रहे हैं.
कहां गया वोट निकालनेवाला कार्यकर्ता
पार्टियां अपने सभी कार्यक्रमों में दावे करती है कि इस क्षेत्र में उसका अधिकार का वोट बैंक है. अनुशासित कार्यकर्ता है. बल्कि कार्यकर्ता का काडर का विशेषण दिया जाता है. पार्टिया और उनके नेता भारी भरकम दावे क्षेत्र विशेष के लिए करते आए है. अमरावती में मनपा चुनाव का वोटिंग इन दावों को मुंह चिढा रहा है. कई प्रतिष्ठित और शहर के बीच बसें प्रभाग में भी वोटिंग का प्रतिशत 50 को पार नहीं कर पाया. इसी से सवाल उपज रहा है कि पार्टियों का काडर और अनुशासन कहां गया? पहले छोटे- बडे सभी प्रकार के इलेक्शन में घर-घर वोट निकालनेवाले कर्मठ कार्यकर्ता थे. अब वह स्थिति नहीं रह गई हैं. यह बात दलों को भी समझ जानी चाहिए.
भला हो मित्र परिवार का
अंबापेठ, गडगडेश्वर, स्वामी विवेका नंद कॉलोनी, संत गाडगे बाबा, साई नगर ऐसे प्रभाग कहें जा सकते हैं. जहां पढा लिखा और कुलीन वोटर रहता है. खेद की बात है कि इन्हीं प्रभागोंं में 100 में से 50 वोटर भी मतदान के लिए बूथ पर नहीं पहुंचे. उम्मीदवारों को अपने समस्त मित्र परिवार के भरोसे रहना पडा. नहीं तो कदाचित वोटिंग की संख्या 40 फीसद को भी पार न कर पाती. इस प्रकार की आशंका अमरावती के सामाजिक जानकार व्यक्त कर रहे हैं. उन्होंने अमरावती मंडल से चर्चा में कहा कि दलों को कार्यकर्ता के साथ अपने व्यवहार में बदलाव करना पडेगा. नहीं तो आनेवाले समय में यही ढर्रा कायम हो सकता है.
क्या हुआ स्वीप अभियान का
महापालिका इलेक्शन में मतदान का टका बढाने के लिए चुनाव आयोग ने विशेष स्वीप अभियान चलाया. महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं तथा संगठनों को साथ लेकर मतदान के लिए जागरूकता का प्रयास किया. यहां तक कि शालाओं में भी बच्चों को अपने माता-पिता से वोट अवश्य डालने कहने की मुहिम चलाई गई. इसके बावजूद लोकसभा और विधानसभा की तुलना में वोटिंग कम से कम तर होता स्पष्ट हो रहा हैं. जिससे आयोग द्बारा स्वीप अभियान पर फूंके गए लाखों रुपए भी बर्बाद होने का ही चित्र हैं.
शहरी भागों में रही है उदासीनता
शहरी क्षेत्रों में वोटिंग का आंकडा सदा ही देहाती भागों की तुलना में कम रहा हैं. इसके पीछे नानाविध कारण गिनाए जाते रहे हैं. एक प्रमुख वजह वोटिंग लिस्ट में दुबारा नाम होना, दूसरा मृतकों के भी नाम वर्षों तक लिस्ट से नहीं हटाना, तीसरा कार्यवश लोगों के बाहरगांव रहना, चौथा यह सोच कि मेरे एक वोट न देने से क्या फर्क पड जाएगा? यह कारण आगे किए जाते रहे हैं.
पढे लिखों ने मुंह फेरा
अमरावती में अंबापेठ- गोरक्षण प्रभाग 13, संत गाडगे बाबा पीडीएमसी प्रभाग -2 , गडगडेश्वर- रवि नगर प्रभाग 17, बुधवारा- जवाहर गेट प्रभाग 14, साई नगर – अकोली प्रभाग 19, राजापेठ- श्री संत कंवरनगर प्रभाग 18, स्वामी विवेकानंद- बेलपुरा प्रभाग 12 ऐसे क्षेत्र रहे जहां कह सकते हैं कि पढे लिखे, स्नातकोत्तर, प्रोफेशनल्स की बस्ती हैं. इन्हीं प्रभागों में सबसे कम मतदान दर्ज हुआ हैं. जिससे अनेक प्रश्न उपस्थित किए जा रहे हैं. एक आम चर्चा यहीं है कि पढा लिखा वोटर मतदान के कर्तव्य से दूर रहता हैं. वह सोशल मीडिया पर एक्टीव रहकर रात दिन व्यवस्था को भलाबुरा कहने में गुरेज नहीं करता. लगता है कि दलों का काडर बेस और अनुशासन का दावा इन्हीं कथित सोशल मीडिया इनफ्ल्यूएन्सर को मान लिया गया हैं. अनेकानेक वजहें गिनाई जा सकती हैं. अंत में प्रश्न यहीं है की अमरावती के तीन लाख से अधिक लोग भरपूर समय दिए जाने के बावजूद पोलिंग बूथ क्यों नहीं पहुंचे?.





