23 को शिवसेना नाम और चुनाव चिन्ह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई
दिवंगत बालासाहब ठाकरे की जयंती पर ही फैसला आने की पूरी उम्मीद

नई दिल्ली/मुंबई/दि.21 – महाराष्ट्र की राजनीति को पिछले ढाई वर्षों से झकझोर रहे शिवसेना पार्टी और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह के विवाद पर अब निर्णायक मोड़ आने वाला है. सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की खंडपीठ के समक्ष यह मामला 23 जनवरी को अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध किया गया है. संयोग से यह दिन शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की जयंती भी है, जिससे इस सुनवाई का राजनीतिक और भावनात्मक महत्व और बढ़ गया है. इस मामले की सुनवाई पहले 21 जनवरी को होनी थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते टल गई. अब देशभर की निगाहें 23 जनवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, क्योंकि इसका फैसला न केवल शिवसेना के भविष्य, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता राजनीति की दिशा तय कर सकता है.
बता दें कि, इस पूरे विवाद की जड़ें जून 2022 में हैं, जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के करीब 40 विधायकों के साथ बगावत कर भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई. इसके चलते उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई और राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया. शिंदे गुट का दावा रहा कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन शिवसेना की मूल विचारधारा से भटकाव था, इसलिए बगावत जरूरी थी. वहीं, ठाकरे गुट ने इसे पार्टी की वैचारिक और संगठनात्मक परंपराओं से विश्वासघात बताया. वहीं फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को ‘खरी शिवसेना’ के रूप में मान्यता दी और उन्हें पार्टी का पारंपरिक चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ आवंटित किया. यह निर्णय मुख्य रूप से विधायकों के संख्याबल के आधार पर लिया गया. इसके बाद 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव शिंदे गुट ने शिवसेना के नाम और चिन्ह पर लड़े, जबकि उद्धव ठाकरे गुट को ‘शिवसेना (यूबीटी)’ नाम और ‘मशाल’ चिन्ह के साथ चुनाव मैदान में उतरना पड़ा.
इस फैसले को ठाकरे गुट ने अपने लिए बड़ा राजनीतिक झटका बताया. चुनाव आयोग के निर्णय को चुनौती देते हुए उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. उनकी दलील है कि जब विधायकों की अयोग्यता का मामला अभी लंबित था, तब केवल संख्याबल के आधार पर आयोग द्वारा फैसला देना न्यायसंगत नहीं था. ठाकरे गुट का तर्क है कि शिवसेना की संगठनात्मक संरचना, पार्टी प्रमुख पद और अधिकांश पदाधिकारियों पर उनका नियंत्रण है. ऐसे में संगठन और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति में केवल विधायकों के आधार पर निर्णय लेना लोकतांत्रिक और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले चुनाव आयोग के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, जिससे फिलहाल शिंदे गुट के पास पार्टी का नाम और चिन्ह बना रहा.
* केवल चिन्ह नहीं, बल्कि विरासत की लड़ाई
यह विवाद सिर्फ चुनाव चिन्ह का नहीं, बल्कि शिवसेना की आत्मा और बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का संघर्ष है. शिवसेना महाराष्ट्र की राजनीति में सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि एक भावनात्मक पहचान रही है. यही कारण है कि यह मामला कानूनी के साथ-साथ भावनात्मक और वैचारिक स्तर पर भी बेहद संवेदनशील है. एकनाथ शिंदे के लिए ‘धनुष-बाण’ बनाए रखना उनकी बगावत को वैधता और नैतिक आधार देता है, जबकि उद्धव ठाकरे के लिए इसे वापस पाना बालासाहेब ठाकरे की विरासत और पार्टी की मूल पहचान की रक्षा से जुड़ा सवाल है.
* संभावित राजनीतिक प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में दूरगामी प्रभाव डाल सकता है. यदि ठाकरे गुट को राहत मिलती है तो इससे सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिरता पर असर पड़ सकता है. वहीं, यदि चुनाव आयोग का फैसला बरकरार रहता है तो शिंदे गुट की स्थिति और मजबूत होगी. इस प्रकार 23 जनवरी की सुनवाई न केवल एक कानूनी लड़ाई का अंत तय करेगी, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीतिक धारा और आगामी चुनावी समीकरणों को भी नई दिशा दे सकती है.





