मनपा की सत्ता के लिए अब ‘बर्फ पिघलने’ की तैयारी

खोडके को राणा दूर रखना चाह रहे, तो खोडके अब युति में आना चाह रहे

* अब तक युति के तहत राणा के लिए कठोर भूमिका लेकर चल रहे खोडके दिख रहे नर्म
* भाजपा मेंं भी एक धडा राणा के साथ-साथ खोडके का भी समर्थन लेने के पक्ष में
* पूरे पांच साल राणा दबंगई से बचने हेतु खोडके को साथ लेकर ‘बैलेंसींग’ की भूमिका में भाजपा
* खोडके के सामने भी सत्ता पक्ष में शामिल होने की मजबूरी, अगले चार साल पडेगी विकास निधि की जरुरत
* दो विधायक पद पास रहने के बावजूद मनपा की सत्ता में शामिल नहीं होने का खोडके को होगा नुकसान
* व्यक्तिगत व राजनीतिक नफे-नुकसान को ध्यान में रखकर बिछाई जा रही सत्ता के शतरंज की बिसात
अमरावती /दि.24- अमरावती महानगर पालिका के चुनावी नतीजे घोषित हुए आज करीब एक सप्ताह का समय पूरा हो चुका है. वहीं संभवत: आगामी सप्ताह में मनपा के नए महापौर व उपमहापौर का चयन भी हो जाएगा. परंतु मनपा में सत्ता किसकी स्थापित होगी और किस पार्टी का महापौर बनेगा, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है. क्योंकि इस बार अमरावती की जनता ने किसी भी एक पार्टी के पक्ष में स्पष्ट जनादेश नहीं दिया है. जिसके चलते मनपा के सदन में किसी भी एक पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत भी नहीं है. ऐसे में अब बहुमत के लिए जरुरी रहनेवाले जादुई आंकडे को जुटाने हेतु राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने समविचारी दलों के साथ हाथ मिलाकर सत्ता के समीकरण को साधने का प्रयास किया जा रहा है. जिसके चलते अब तक व्यक्तिगत अहंकार एवं राजनीतिक वर्चस्व को लेकर विधायक राणा दंपति तथा विधायक खोडके दंपति के बीच चली आ रही प्रतिस्पर्धा के चलते बेहद तल्ख हो चुके रिश्तों में पडी बर्फ के पिघलने के पूरे आसार दिखाई दे रहे है.
बता दें कि, अमरावती महानगर पालिका के चुना में 25 सीटें जीतकर भाजपा सबसे बडी राजनीतिक पार्टी बनी है. लेकिन 87 सदस्यीय मनपा के सदन में सत्ता स्थापित करने हेतु बहुमत के लिए कुल 44 सदस्यों का समर्थन हासिल रहना जरुरी होता है. जिसके चलते सदन में सबसे बडा दल साबित होने के बावजूद भाजपा को अन्य राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करना ही होगा. चूंकि राज्य की महायुति में भाजपा के साथ शामिल रहनेवाली युवा स्वाभिमान पार्टी ने भी मनपा के चुनाव में 15 सीटें जीती है और शिंदे गुट वाली शिवसेना ने भी मनपा की 3 सीटों पर जीत हासिल की है. ऐसे में इस वक्त इन तीनों दलों के बीच मनपा की सत्ता के लिए राजनीतिक गठबंधन बनाने हेतु प्रयास तेज है. साथ ही साथ इस गठबंधन में बसपा के 3 व वंचित बहुजन आघाडी के 1 सदस्य को भी शामिल करने के प्रयास किए जा रहे है, ताकि बहुमत हेतु जरुरी संख्या को जुटाया जा सके. वहीं दूसरी ओर राज्य की महायुति सरकार में शामिल अजीत पवार गुट वाली राकांपा ने भी अमरावती मनपा के सदन में 11 सीटों पर जीत हासिल की है. लेकिन अमरावती में राकांपा का नेतृत्व करनेवाले पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष व विधायक संजय खोडके ने पहले ही खुला ऐलान कर दिया था कि, वे ऐसे किसी गठबंधन में शामिल नहीं होंगे, जिसमें विधायक रवि राणा और उनकी युवा स्वाभिमान पार्टी का समावेश रहेगा. यही वजह रही कि, राकांपा ने मनपा का चुनाव भी अपने अकेले के दम पर लडा और 87 में से 75 सीटों पर अपने प्रत्याशी खडे किए थे. जिसमें से 11 प्रत्याशी चुनाव जीतकर पार्षद निर्वाचित हुए. लेकिन इसके बाद भी विधायक संजय खोडके ने स्पष्ट किया था कि, चुनाव पश्चात होनेवाले किसी गठबंधन में यदि विधायक राणा शामिल रहते है, तो वे उस गठबंधन का हिस्सा नहीं रहेंगे. जबकि कयास लगाए जा रहे थे कि, यदि भाजपा के 25, युवा स्वाभिमान पार्टी के 15, अजीत पवार गुट वाली राकांपा के 11 व शिंदे गुट वाली शिवसेना के 3 पार्षदों द्वारा मनपा में युति की जाती है, तो इस गठबंधन के पास बेहद मजबूत और स्पष्ट बहुमत हो जाएगा. जिसके बलबूते यह गठबंधन पूरे पांच साल तक स्थिर तरीके से काम भी कर सकेगा. परंतु विधायक खोडके की भूमिका के चलते मामला अधर में लटकता दिखाई दिया.
लेकिन यदि पूरे राजनीतिक परिदृष्य पर बेहद सुक्ष्मता के साथ नजर डाली जाए, तो पता चलता है कि, अब जहां एक ओर किंगमेकर की भूमिका में रहनेवाले विधायक राणा भी नहीं चाहते कि, उनके और भाजपा के बीच होनेवाले गठबंधन में विधायक खोडके के नेतृत्ववाली राकांपा भी शामिल हो. वहीं दूसरी ओर खुद को हाशिए पर पडता देख कहीं न कहीं विधायक खोडके ने अपनी भूमिका को थोडा नर्म कर लिया. जिसके तहत अब तक अपने फैसले पर ही चलने वाले विधायक खोडके द्वारा अब अपनी भूमिका स्पष्ट करने के साथ-साथ पार्टी नेतृत्व की इच्छा और उपरी आदेश जैसे शब्दों का भी प्रयोग किया जा रहा है. जिसका साफ मतलब है कि, यदि पार्टी नेतृत्व द्वारा उपर से आदेश दिया जाता है, तो विधायक खोडके की ऐसे किसी गठबंधन में भी शामिल रहने की तैयारी रहेगी, जिसमें विधायक राणा और उनकी युवा स्वाभिमान पार्टी भी शामिल होंगे.
यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि, विधायक रवि राणा को राजनीति के मामले में ‘बाजीगर’ कहा जाता है और वे कब कौनसा दांव चलेंगे, इसका अनुमान लगाना भी काफी हद तक मुश्किल रहता है. बल्कि कई बार अपने राजनीतिक पैतरों से विधायक राणा सभी को विस्मित भी कर देते है. जबकि दूसरी ओर विधायक खोडके हमेशा ही अपनी सीधी-सपाट और जरुरत पडने पर कठोर भूमिका से लिए जाने जाते है. इसमें भी खास बात यह है कि, विगत 15 वर्षों की राजनीति को यदि देखा जाए तो इसमें कई बार खोडके दंपति पर विधायक राणा भारी पडते भी दिखाई दिए है. चूंकि विधायक राणा के हाथों सन 2009 व 2014 में सुलभा खोडके को बडनेरा निर्वाचन क्षेत्र में हार का सामना करना पडा था. जिसके चलते सुलभा खोडके ने बडनेरा निर्वाचन क्षेत्र को छोडकर अमरावती विधानसभा क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाना बेहतर समझा. वहीं वर्ष 2014 के दौरान तत्कालीन एकीकृत राकांपा में जबरदस्त दबदबा रखनेवाले खोडके दंपति के तमाम विरोध को धता बताते हुए विधायक राणा ने अपनी पत्नी नवनीत राणा के लिए अमरावती लोकसभा सीट हेतु राकांपा की टिकट भी हासिल की थी. जिसकी वजह से खोडके दंपति को राकांपा से बाहर भी होना पडा था. जिसके चलते खोडके दंपति और राणा दंपति के बीच जबरदस्त राजनीतिक अदावत का दौर शुरु हुआ था और यही वजह रही कि, वर्ष 2019 में कांग्रेस-राकांपा के समर्थन से संसदीय चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी रहनेवाली नवनीत राणा के प्रचार से तब कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष रहनेवाले संजय खोडके ने खुद को दूर रखा था. साथ ही नवनीत राणा के प्रचार में अपने छायाचित्र के प्रयोग को लेकर भी आपत्ति उठाई थी. हालांकि इसके बावजूद नवनीत राणा सांसद निर्वाचित होने में कामयाब रही थी. यानि कुल मिलाकर राणा को लेकर संजय खोडके द्वारा किए गए तमाम विरोध बेअसर साबित हुए थे. इस बार भी लगभग वही स्थिति बनती दिखाई दे रही है और संभवत: इस बात को खुद विधायक संजय खोडके भी बेहतर ढंग से समझ रहे है. शायद यही वजह है कि, इस बार विधायक संजय खोडके के राणा विरोधी स्वर कुछ हद तक नर्म पडते दिखाई दे रहे है. कारण स्पष्ट है कि, यदि विधायक खोडके भाजपा के साथ मनपा की सत्ता में शामिल नहीं होते, तो उन्हें मनपा में पूरे पांच साल तक विपक्ष में बैठने हेतु मजबूर रहना पडेगा. चूंकि खोडके पति-पत्नी दोनों ही विधायक है. ऐसे में 2-2 विधायक पद पास में रहने के बावजूद स्थानीय स्तर पर यदि विपक्ष में रहना पडता है, तो इसका दोनों विधायकों को कोई लाभ नहीं होनेवाला. बल्कि स्थानीय स्तर पर विकास निधि व विकास कामों के मामले में नुकसान ही होगा. जिसका खामियाजा सन 2029 में होनेवाले विधानसभा चुनाव में भी उठाना पड सकता है. इस बात को ध्यान में रखते हुए विधायक खोडके द्वारा अपनी भूमिका और रवैये के लहजे में अप्रत्यक्ष रुप से बदलाव किया जा रहा है.
जबकि दूसरी ओर विधायक राणा को इस बार मनपा के चुनाव में अपनी बढी हुई ताकत और अपने संख्याबल के महत्व सहित अपनी राजनीतिक चतुराई व कौशल्य का बखुबी अंदाजा है. जिसके चलते उन्हें शायद यह भरोसा है कि, अपने 15 सदस्यों को लेकर भाजपा के 25 पार्षदों के साथ हाथ मिलाते हुए वे अन्य दलों के 4 से 5 पार्षदों का समर्थन हासिल कर बहुमत के लिए जरुरी आंकडा जुटा सकते है. जिसके चलते इस गठबंधन को राकांपा पार्षदों की जरुरत ही नहीं पडेगी. साथ ही यदि इस गठबंधन में राकांपा को शामिल नहीं किया जाता है, तो इस गठबंधन में विधायक राणा की भूमिका ही किंगमेकर वाली रहेगी. जिसकी बदौलत पूरे पांच साल तक विधायक राणा के लिए भाजपा के साथ राजनीतिक ‘सौदेबाजी’ फायदेमंद भी रह सकती है, इस बात का भी विधायक राणा को बखुबी अंदाजा है. ऐसे में अब विधायक राणा खुद यह चाह रहे है कि, उनके और भाजपा के बीच मनपा की सत्ता हेतु होनेवाले गठबंधन से विधायक खोडके और अजीत पवार गुट वाली राकांपा को दूर रखा जाए.
इन सबके साथ ही मनपा के सदन में सबसे बडी पार्टी रहनेवाली भाजपा में भी विधायक राणा और विधायक खोडके को लेकर बडी ही उहापोह वाली स्थिति है. क्योंकि भाजपा में भी एक ऐसा धडा है, जो यह मानता है कि, भाजपा, युवा स्वाभिमान पार्टी व शिंदे गुट द्वारा ही आपस में हाथ मिलाकर तीन दलों वाली सरकार बनाई जाए तथा इस गठबंधन को विधायक संजय खोडके को दूर ही रखा जाए. जबकि भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं का यह मानना है कि, यदि ऐसा किया जाता है, तो अगले पूरे पांच साल तक भाजपा को विधायक राणा ही ‘दबंगई’ व ‘दादागिरी’ बर्दाश्त करनी पडेगी. जिससे बचने हेतु जरुरी है कि, इस गठबंधन में विधायक खोडके के नेतृत्ववाली राकांपा (अजीत पवार) के 11 पार्षदों को भी शामिल किया जाए, जो भाजपा व युवा स्वाभिमान पार्टी के बीच ‘शॉकअप’ का काम कर सकते है.
इन तमाम स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि, अस्पष्ट जनादेश रहने और किसी भी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं रहने के साथ ही लगभग सभी पार्टियों के पास एक-दूसरे के समान ही सदस्य संख्या रहने के चलते राजनीतिक समीकरण तथा चुनाव पश्चात गठबंधन को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है. बल्कि सत्ता पक्ष व विपक्ष द्वारा जमकर आंकडों के खेल खेले जा रहे है. जिसे ध्यान में रखते हुए सभी राजनीतिक दलों को एक-दूसरे के साथ व सहारे की जबरदस्त जरुरत है. जिसे ध्यान में रखते हुए अब सर्द हो चुके रिश्तों की दरारों में पडी बर्फ का पिघलना शायद जरुरी हो चला है. तभी सत्ता सुख की गरमाहट हासिल की जा सकती है.

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