पथरीली जमीन पर शानदार फसल
‘राला’ फसल यह किसानों के लिए वरदान रही है

* कीट रोग का प्रभाव कम
अमरावती/ दि. 19 – मौसम बदलने के समय कम बारिश और हल्की जमीन वाले क्षेत्र में किसानों के लिए ‘राला’ ये फसल वरदान रही है. ‘ मोटे अनाज का राजा’ के रूप में पहचानी जानेवाली यह फसल केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं किसानों की आर्थिक उन्नति के लिए भी महत्वपूर्ण रही है. जिले में कुछ आदिवासी किसान इसका रोपण कर रहे हैं.
बारिश निरंतर न होने से खेत संकट में घिर गया है. ऐसी स्थिति में कम पानी में, हलकी जमीन में और पहाड क्षेत्र में यह फसल किसानों के लिए आशा की किरण है. शाश्वत कृषि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जानेवाली यह कडधान्य अब ‘सुपरफुड’ के रूप में एक बार किसानों की पसंदी रही है. राला फसल की सबसे बडी विशेषता यानी उसकी सहनशक्ति जिस जगह पर सोयाबीन अथवा कपास जैसी फसल पानी के अभाव जल जाती है. वहां पर राला यह फसल डोलती हुई खडी रहती है.
* इस फसल को हलकी उपजाउ जमीन की आवश्यता है
कम पानी में अत्यंत कम खर्च में शाश्वत उत्पादन देनेवाली राला फसल किसानों के लिए विशेष लाभदायक रह सकती है. अत्यंत हलकी तथा पहाडी क्षेत्र की जमीन यह फसल के लिए योग्य रहेगी. जिस जमीन में अन्य फसल नहीं आती. वहां पर राले उत्तम उत्पादन देते. पानी का निचले भाग में होनेवाली जमीन में यह फसल उत्पन्न होती है.
रोग कीट का प्रभाव कम
राला फसल का उत्पादन खर्च तुलना में कम है. कीट व रोगों का प्रभाव भी वहां कम रहता है. इस फसल को खाद अथवा कीटनाशकों की अधिक आवश्यकता और लागत न होने से रोपण का खर्च कम है.
फायबर, लोह, प्रथिना समृध्द फसल
राला में तंतुमय पदार्थ होते है तथा लोहा, कैल्शियम का उत्तम स्त्रोत है. यह गलुटेन- मुक्त है, शक्कर के मात्रा नियंत्रित रहने से मधुमेह मरीजों के लिए यह उत्तम माना जाता है.
ढाई- तीन महिने की फसल बीजों का खर्च शून्य
राला यह अत्यंत कम समय की फसल है. बुआई के बाद केवल 75 से 20 दिन में (ढाई से तीन माह ) में यह फसल काटी जाती है. विशेष यह कि इसके लिए हायब्रीड बीजों की आवश्यकता नहीं रहती. किसान घर के बीजों का उपयोग कर सकते है. जिसके कारण बीजों का खर्च बचता है.
राला के प्रतिक्विंटल कितने रूपए भाव
फिलहाल बाजार में राले की अच्छी मांग है. गुणवत्तानुसार राला को औसतन 3,500 ते 5000 रूपए प्रतिक्विंटल बाजार भाव मिलता है. प्रक्रिया करके चावल बेचने पर अधिक दर मिल सकती है.
खाद की आवश्यकता नहीं
राला फसल जमीन में उपलब्ध अन्न द्रवों पर बढती है. इसे रासायनिक खाद की आवश्यकता नहीं होती. केवल बुआई से पूर्व थोडी गोबर खाद डाली तो भरपूर उत्पादन मिलता है. जिससे यह फसल जैविक खेती के लिए उत्तम पर्याय है.