अंबादेवी परिसर की प्रागैतिहासिक गुफा चित्रकला 35 हजार वर्ष पुरानी होने के संकेत

महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है यह गुफा चित्रकला

* वर्ष 2007 में प्रकृति शोधकर्ताओं ने खोज निकाला था
* क्षेत्र के विकास पर नहीं दिया गया अपेक्षित ध्यान
अमरावती/दि.14- सातपुड़ा पर्वतराजी के तापी घाटी क्षेत्र में महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश सीमा पर स्थित अंबादेवी शैलाश्रय परिसर की प्रागैतिहासिक गुफा चित्रकला लगभग 35 हजार वर्ष पुरानी होने की संभावना नए शोध में सामने आई है.
यह शैलाश्रय सबसे पहले वर्ष 2007 में अमरावती के छह प्रकृति शोधकर्ताओं द्वारा खोजे गए थे. हाल ही में मंगुसादेव शैलाश्रय में मौजूद चित्रों का विस्तृत अध्ययन करते समय शोधकर्ताओं को एक लंबी गर्दन वाले दौड़ते पक्षी का चित्र मिला, जो काफी हद तक शुतुरमुर्ग (ऑस्ट्रिच) से मिलता-जुलता प्रतीत होता है. स्वतंत्र डीएनए और कार्बन-14 परीक्षणों से यह पहले ही सिद्ध हो चुका है कि भारत में लगभग 24 हजार से 42 हजार वर्ष पहले शुतुरमुर्ग मौजूद थे. इसी संदर्भ में इस शोध दल के प्रमुख डॉ. वी.टी. इंगोले का शोधपत्र पहले प्रकाशित हो चुका है. शोधकर्ताओं का मानना है कि मंगुसादेव में मिला शुतुरमुर्ग जैसा चित्र उस समय के प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित हो सकता है. इन गुफा चित्रों में शिवाथेरियम (जिराफ वंश का विलुप्त प्राणी), लंबी थूथन वाला कीटभक्षी आर्डवार्क, भारतीय गैंडा जैसे कई दुर्लभ और विलुप्त जीवों के चित्र भी दिखाई देते हैं. विशेष बात यह है कि सभी चित्र एक ही शैली में बनाए गए हैं और उनमें बाद में रंग भरने या बदलाव के संकेत नहीं मिलते, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ये सभी चित्र एक ही कालखंड के हैं.
हालांकि रंगद्रव्यों की वैज्ञानिक जांच अभी बाकी है, लेकिन उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अंबादेवी क्षेत्र की यह चित्रकला भारत की अब तक की सबसे प्राचीन गुफा चित्रकला हो सकती है. शोधकर्ताओं ने यह संभावना भी जताई है कि यह स्थान लगभग 40 हजार वर्ष पहले के आदिमानवों की भारत की सबसे बड़ी बस्तियों में से एक रहा होगा. इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ताओं में डॉ. वी.टी. इंगोले, प्र. सु. हिरुरकर, पद्माकर लाड, डॉ. मनोहर खोडे और शिरीष कुमार पाटील शामिल हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि लगभग 19 वर्ष पहले खोज होने के बावजूद इस महत्वपूर्ण स्थल को अभी तक अपेक्षित सरकारी महत्व नहीं मिला है. शोधकर्ताओं ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से इस स्थल का गंभीरता से अध्ययन कर यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के प्रयास करने की मांग की है.
महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित होने के कारण दोनों राज्यों के प्रशासन की ओर से भी इस क्षेत्र के विकास पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है. यहां शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाएं, सूचना केंद्र और मार्गदर्शन व्यवस्था का अभाव है. अमरावती विश्वविद्यालय में इस शोध पर आधारित संग्रहालय स्थापित करने का प्रस्ताव भी कई वर्षों से लंबित है. यदि यह संग्रहालय स्थापित होता है तो इस क्षेत्र के प्रागैतिहासिक इतिहास को दुनिया के सामने लाने में बड़ी मदद मिल सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि अंबादेवी के ये शैलचित्र केवल अमरावती या महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और पुरातात्विक विरासत का अमूल्य खजाना हैं. इसलिए इनके संरक्षण, शोध और पर्यटन विकास के लिए तत्काल ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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