बागियों व असंतुष्टों से निपटने में सभी दलों के छूट रहे पसीने
भाजपा व कांग्रेस में बागियों व असंतुष्टों का प्रमाण सबसे अधिक

* असंतुष्टों द्वारा उपरी तौर पर पार्टी के साथ रहने का दिखावा
* कई असंतुष्ट ‘अंदरबट्टे’ में प्रतिस्पर्धीयों को दे रहे छिपा समर्थन
* कुछ असंतुष्ट बगावत कर बदल चुके पाला, कुछ ने निर्दलीय के तौर पर ठोंका खम
अमरावती/दि.8 – इस समय महानगर पालिका के चुनाव की जबरदस्त धामधूम चल रही है और सभी राजनीतिक दलों ने चुनावी मैदान में अपने-अपने प्रत्याशियों को भी उतार दिया है. परंतु टिकट बंटवारे के समय हुई गडबडियों के चलते लगभग सभी राजनीतिक दलों में असंतुष्टों की संख्या अच्छी-खासी है. जिसके चलते टिकट वितरण की वजह से नाराज बागियों को संभालना हर राजनीतिक दल के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है और ऐसा करने में सभी राजनीतिक दलों के अच्छे-खासे पसीने भी छूट रहे है. विशेष रुप से यह स्थिति भाजपा और कांग्रेस जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों में है और इन दोनों राजनीतिक दलों को ही फिलहाल मनपा चुनाव के लिहाज से एक-दूसरे का जबरदस्त प्रतिस्पर्धी माना जा रहा है. जिसके चलते दोनों राजनीतिक दलों द्वारा शह और मात वाली राजनीति के तहत एक-दूसरे के बागियों व असंतुष्टों को किसी भी तरह से अपने पाले में करने का प्रयास किया जा रहा है. वहीं अपनी पार्टी से अपना टिकट कट जाने के चलते असंतुष्ट रहनेवाले कई दावेदारों ने पाला बदलकर किसी अन्य पार्टी से खुद के लिए टिकट हासिल कर लिया है, या फिर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में खम ठोंका है. वहीं कई ऐसे भी असंतुष्ट है, जिन्होंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, बल्कि वे नाराज रहने के बावजूद अपनी पार्टी में ही बने हुए है. ऐसे असंतुष्टों से कहीं कोई भीतराघात न हो जाए ऐसा डर इस समय हर राजनीतिक पार्टी को सता रहा है. क्योंकि ऐसे कई असंतुष्ट उपरी तौर पर यद्यपी खुद को पार्टी के साथ दिखा रहे है. लेकिन कई असंतुष्टों द्वारा अंदर ही अंदर छिपे तौर पर किसी प्रतिस्पर्धी प्रत्याशी का समर्थन किया जा रहा है. जिसके चलते ऐसे असंतुष्टों के सामने हर पार्टी और उस पार्टी के वरिष्ठ नेता पूरी तरह से हतबल नजर आ रहे है.
सूत्रों के मुताबिक, अनेक असंतुष्ट ‘अंदरबट्टे’ में अपने ही दल के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ प्रतिद्वंद्वियों को छिपा समर्थन दे रहे हैं. इससे संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े हो रहे हैं और नेतृत्व की रणनीति की परीक्षा हो रही है. टिकट न मिलने से नाराज़ कई दावेदार ऊपर से पार्टी अनुशासन का पालन करते नजर आ रहे हैं, लेकिन अंदरखाने कहानी कुछ और ही है. कुछ असंतुष्टों ने खुली बगावत का रास्ता चुना है, किसी ने पाला बदलकर विरोधी दल का दामन थामा तो किसी ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी रण में उतरकर अपनी ताकत दिखाने की ठान ली है. इससे न सिर्फ वोटों का बिखराव बढ़ा है, बल्कि कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या चतुर्भुजीय हो गया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ‘मौन विद्रोह’ और ‘छिपा समर्थन’ चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. खासकर करीबी मुकाबलों वाले वार्डों में कुछ सौ वोटों का हेरफेर भी जीत-हार तय कर सकता है. ऐसे में दलों की शीर्ष नेतृत्व टीमें डैमेज कंट्रोल में जुटी हैं-कहीं मान-मनौव्वल, कहीं पद-प्रतिष्ठा के आश्वासन, तो कहीं भविष्य के टिकट का वादा किया जा रहा है. हालांकि सवाल यह भी है कि क्या चुनाव से ठीक पहले की गई यह अग्निशमन राजनीति पर्याप्त साबित होगी? जमीनी कार्यकर्ताओं में फैली नाराज़गी और अंदरूनी खींचतान अगर मतदान तक बनी रहती है, तो ‘अपनों’ से मिली चोट किसी भी दल के लिए भारी पड़ सकती है. चुनावी रण में अब असली परीक्षा न सिर्फ विपक्ष से, बल्कि भीतर से उठे असंतोष को संभालने की है.
* बागियों के चलते राकांपा व शिंदे सेना की ‘बल्ले-बल्ले’
ऐसे कई पूर्व पार्षद है, जिन्हें इस बार उनकी पार्टी से टिकट नहीं मिली है. तो इसके बावजूद वे शांत बैठे है, परंतु कुछ ने पाला बदलकर अन्य दलों में प्रवेश करते हुए वहां से टिकट हासिल कर ली और कुछ ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन भी भरा. पाला बदलनेवाले ऐसे प्रत्याशियों के चलते अजीत पवार गुट वाली राकांपा और शिंदे गुट वाली शिवसेना की जमकर ‘बल्ले-बल्ले’ रही. क्योंकि इन दोनों ही पार्टियों के पास बागियों व असंतुष्टों की जबरदस्त ‘इनकमिंग’ हुई. खास बात यह रही कि, अजीत पवार गुट वाली राकांपा और शिंदे गुट वाली शिवसेना में आनेवाले असंतुष्टों में से अधिकांश का वास्ता भाजपा से था और भाजपा में खुद को टिकट नहीं मिलने के चलते ऐसे असंतुष्टों ने भाजपा के साथ ही राज्यस्तर पर महायुति में शामिल शिंदे गुट वाली शिवसेना व अजीत पवार गुट वाली राकांपा में प्रवेश करने का निर्णय लिया.
* भाजपा व कांग्रेस के प्रत्याशियों को करना पड रहा दोहरी चुनौती का सामना
भाजपा व कांग्रेस की ओर से नगरसेवक पद के लिए चुनावी मैदान में रहनेवाले प्रत्याशियों को फिलहाल दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड रहा है. जिसके तहत एक ओर तो उन्हें अपने प्रतिस्पर्धी प्रत्याशी से स्पर्धा करनी पड रही है. वहीं दूसरी ओर अपनी ही पार्टी में रहकर कहीं कोई असंतुष्ट व्यक्ति प्रतिस्पर्धी पार्टी के प्रत्याशी को सहायता तो नहीं दे रहा. इस पर भी नजर रखनी पड रही है. क्योंकि कई स्थानों पर प्रबल दावेदार रहने के बावजूद अपनी टिकट कट जाने की वजह से उपजी नाराजी के चलते असंतुष्टों द्वारा पार्टी में ही रहकर पार्टी की जडों को खोजने का काम किया जा रहा है. जिससे प्रतिस्पर्धी पार्टी व उसके प्रत्याशी को फायदा पहुंच सकता है. ऐसे में सभी राजनीतिक दल भीतराघात की आशंका से घिरे हुए है.





