अमरावतीमहाराष्ट्र

गुरु के समक्ष शिष्टाचार भक्ति के सच्चे मार्ग पर चलने के संकेत

रायली प्लॉट स्थित गोवर्धननाथ हवेली में पू. पा. गोस्वामी 1008 हरिराय महोदय का कथन

* दो दिवसीय वचनामृत का आयोजन
अमरावती /दि.6– पुष्टीमार्ग में गुरु के समक्ष शिष्टाचार बनाए रखना सिर्फ एक आंतरिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भक्ति के सच्चे मार्ग पर चलने का भी संकेत है. गुरु के प्रति इन आदर्श शिष्टाचारों को बनाए रखते हुए, आप अपनी भक्ति में गहराई और पवित्रता ला सकते हैं, यह बातें पुष्टिमार्ग प्रवर्तक जगदुरु श्रीमद केलभाचार्य महाप्रभू वंशानु वंशज युवा क्षाचार्य पु. पा. गोस्वामी 108 हरिराय महोदय ने कही.
स्थानीय रायली प्लॉट स्थित गोवर्धननाथ हवेली में बुधवार से दो दिवसीय वचनामृत का आयोजन किया गया है. गोवर्धननाथ हवेली सत्संग मंडल की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में युवा आचार्य पू. पी.ओ. गोस्वामी 108 हरिराय महोदय (कामवन-बड़ौदा) ने पुष्टिमार्ग में गुरु के समक्ष शिष्टाचार कैसे बनाए रखा जाए, इस पर वचनामृत का लाभ दिया. उन्होंने कहा कि पुष्टिमार्ग अत्यंत पूजनीय एवं विशिष्ट भक्ति मार्ग है, जिसे श्रीनाथजी ने अपने जीवन में अपनाया है. की उपासना से संबंधित है. इस माकै में गुरु का अत्यधिक सम्मान औ उनकी शिक्षाओं के प्रति पूरी श्रद्ध और समर्पण महत्वपूर्ण है. गुरु के प्रति आदर और श्रद्धा के साथ सादगी और विनम्रता रखनी चाहिए. उन्हें हमेशा आदर और सम्मान देना चाहिए. गुरु के सामने विनम्रता बनाये रखना आवश्यक है. गुरु के आदेशों में भगवान की इच्छा होती है. गुरु के बताये मार्ग पर चलते हुए सच्ची भक्ति और आस्थावान बनना चाहिए. और गुरु के सामने हमेशा सच्चे मन से अपनी साधना करनी चाहिए, जो भक्ति आप गुरु के सामने प्रस्तुत करते हैं, वह सच्चे दिल से होनी चाहिए. अपनी साधना में निरंतरता और ईमानदारी दिखानी चाहिए, ताकि गुरु को यह लगे कि आप उनकी शिक्षा को गंभीरता से अपना रहे हैं. गुरु के सन्मुख शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए. शारीरिक और मानसिक शुद्धता से गुरु के सामने उपस्थित होना चाहिए. शरीर और मन को पवित्र रखना भी शिष्टाचार का हिस्सा है. जिससे गुरु को भी सम्मानित महसूस हो. गुरु के सामने पूजा, आरती, अथवा साधना करते समय मन, वचन और क्रिया से गुरु के पति समर्पण का भाव प्रकट करना चाहिए. यह संकेत देता है कि, आप गुरु की उपासना और उनके उपदेशों को पूरी श्रद्धा से स्वीकार कर रहे है. गुरु के कार्यों को बढावा देना और उनके उपदेशों का प्रचार करना एक पुण्य कार्य माना जाता है. ऐसा भी आचार्य पू. पा. गोस्वामी 1008 हरिराय महा महोदय ने कहा.

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