
* पुराने जनप्रतिनिधियों के विजनलेस होने का खामियाजा
* शहर की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव
* इंजीनियर मिलिंद कहाले का इंटरव्यू (भाग-1)
अमरावती/दि. 30 – इंजीनियर और युवा कार्यकर्ता मिलिंद कहाले ने कहा कि, पुराने जनप्रतिनिधियों की दूरदृष्टि का अभाव का खामियाजा अमरावती भुगत रहा है. यहां के जनप्रतिनिधियों ने बगैर विजन कार्य किया. जिसके कारण आज भी केवल गली-मोहल्ले की सडकों और नालियों के काम को विकास बताया जाता है. जबकि हकीकत बहुत विदारक है. अमरावती में इंडस्ट्री अर्थात उद्योगधंधे नहीं होने से यहां के कम से कम पांच लाख युवा पुणे, मुंबई जैसे बडे शहरो में जा बसे हैं. उनके वहां चले जाने से अमरावती की अर्थव्यवस्था पर टोटल इकोसिस्टम पर प्रतिकूल असर हुआ है. यहां चुनाव आने पर चर्चा होती है कि, 18 लाख वोटर्स हैं. प्रत्यक्ष मतदान 11-12 लाख होता है. यह जो 5-6 लाख वोटर्स मतदान नहीं करते दरअसल वे बडे शहरो में जा बसे हैं. माइग्रेंट हो गए हैं. मिलिंद कहाले अमरावती मंडल से विशेष चर्चा कर रहे थे. इंजीनियर एसो. के अध्यक्ष और अनेक संगठनों व संस्थाओं में एक्टीव कहाले ने इस बातचीत में अमरावती के लीक से हटकर मुद्दों की बात की. कई ज्वलंत विषयों की ओर ध्यान दिलाया.
* वोटर लिस्ट में नाम, वोटर माइग्रेंट
कहाले ने अपनी बात को समझाकर बताया कि, 18-19 साल के रहने पर यह युवा महाविद्यालयों में पढ रहे थे. उनका ग्रैज्युएशन होते ही वे अमरावती में उनके ढंग का जॉब नहीं होने से बाहर चले गए. वहां अपनी स्कील के बूते तरक्की प्राप्त कर आगे बढे. वहीं जाकर बस गए. पुणे और मुंबई की बात नहीं, देश के अन्य बडे शहरों और उससे भी आगे विदेशो में जाकर बसनेवाले इंजीनियर्स की संख्या लाखो में है. जबकि उनके नाम आज भी स्थानीय वोटर लिस्ट में मौजूद है. जिससे वोटर लिस्ट 18-19 लाख मतदाता बतलाती है. प्रत्यक्ष मतदान 11-12 लाख तक पहुंच पाता है.
* 4 से 5 लाख युवा बाहर
कहाले ने और विवरण देकर बताया कि, 10 साल पहले केवल 20 कॉलेज में 6 फैकल्टी में 60-60 विद्यार्थी गिने तो 7200 होते है और उनकी कुल संख्या 72 हजार तक होती है. 10 वर्षो में यह आंकडा 7 लाख को पार कर जाता है. कुछ युवा यहां अपना कामधंधा अपना लेते हैं. किंतु अधिकांश लगभग 4 से 5 लाख युवा दूसरे शहरों में चले जाते हैं. क्योंकि, यहां उनके लायक उद्योगधंधे नहीं है, जॉब नहीं है. उन्हें मजबूरन दूसरे शहरों में जाकर परिवार से दूर रहना पड रहा है.
* नहीं सोचा किसी ने भी
कहाले ने दो टूक आरोप किया कि, 10-20 वर्षो पहले के हमारे जनप्रतिनिधियों ने इस बारे विचार ही नहीं किया. जिस अनुपात में इंजी. कॉलेज बढे, उन अनुपात में यहां रोजगार के लिए उद्योगधंधे स्थापित करने, सरकार को इसके लिए विवश करने का काम किसी भी लोकप्रतिनिधि ने नहीं सोचा. कुछ तो केवल दो फ्लाईओवर बनाकर स्वनाम धन्य विकास पुरुष बने बैठे हैं, तो कुछ आज भी गली-मोहल्ले की सडक और नालियों के भूमिपूजन में धन्य हो रहे हैं. असली विकास की ओर ध्यान नहीं दिया अथवा उसका विजन ही इन नुमाईंदो के पास न रहने का स्पष्ट आरोप पेशे से सफल सिविल इंजीनियर मिलिंद कहाले ने किया.
* राज्यकर्ता भी जिम्मेदार
एक युवा कार्यकर्ता के रुप में पहचान रखनेवाले मिलिंद कहाले ने कहा कि, असमतोल विकास के लिए राज्य के शासनकर्ता भी जिम्मेदार है. उन्होंने कुछ क्षेत्र विशेष पर ही मेहरबानी की. सारे बडे उद्योग इन क्षेत्रों में लगा दिए हैं. जिससे एक ही राज्य का हिस्सा रहने पर भी कई क्षेत्र उद्योगधंधो के लिए आज भी मोहताज है और वहां के पढे-लिखे युवा को माइग्रेंट होना पड रहा है. अमरावती जैसे और भी शहर विदर्भ तथा मराठवाडा व अन्य भागों में हैं. राज्यकर्ताओं ने कभी अमरावती संभाग में इंडस्ट्री विकसित नहीं होने दी.
* इंडस्ट्री नहीं, सामाजिक दुष्परिणाम भी
इंडस्ट्री नहीं होने से अमरावती जैसे शहर में जहां 4 हजार वन और टू बीएचके फ्लैट की योजनाएं आधी-अधूरी और अविकसित एवं खाली पडी है. वहीं प्रॉपर्टी के रेट भी अपेक्षित रुप से नहीं बढ पाए है. इंडस्ट्री नहीं होने से सामाजिक दुष्परिणाम का सामना अमूमन सभी समाज में करना पडा है. युवकों को 30 प्लस होने पर भी विवाह संबंध नहीं हो पा रहे. हुए तो टिक नहीं पा रहे. दूसरे-तीसरे वर्ष में सोडचिठ्ठी की नौबत आ रही. इससे भी भयंकर बात यह है कि, युवा वर्ग नैराश्य की चपेट में आ रहा है. अंदेशा है कि आनेवाले वर्षो में ऐसे निराश युवाओं का आत्मघात का ग्राफ न बढ जाए.
* आईटी पार्क होना चाहिए
मिलिंद कहाले ने कहा कि, अमरावती में बढती अभियांत्रिकी महाविद्यालयों की संख्या के साथ ही यहां आईटी पार्क के बारे में विचार होना चाहिए था. वह नहीं हुआ. जिसके कारण हजारों युवाओं को डिग्री प्राप्त करने के बाद दूसरे शहरों का मजबूरी में रुख करना पडा है. यह अत्यंत चिंता की बात है. अमरावती में आज भी आईटी पार्क विकसित करने के बारे में सोचा जाना चाहिए. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि, उनकी बैच के 60 में से 52 सहपाठी दूसरे शहरों में जा बसे हैं. (शेष अगले अंक में)