
* अनदेखी करना साबित हो सकता है भारी
अमरावती/दि.20– जीबीएस यानि गुलियन बैरी सिंड्रोम नामक दुर्लभ बीमारी के जरिए इन दिनों तेजी से बढते जा रहे है. इस बीमारी में हाथ पैर ढीले पडने जैसे लक्षण दिखाई देते हुए जिसकी ओर अनदेखी किये जाने पर यह काफी भारी पड सकता है और कभी-कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है, ऐसे में समय रहते इस बीमारी का योग्य निदान व इलाज करवाना जरुरी होता है. साथ ही योग्य उपचार व आरोग्यदायी जीवनशैली के जरिए इस बीमारी पर सहज मात की जा सकती है.
डेढ वर्ष की आयु वाले बच्चे में यदि चलने-फिरने और हाथ-पैर हिलाने को लेकर कोई समस्या या दिक्कत होती है, तो इसे जीबीएस की बीमारी का लक्षण मानते हुए इसका समय रहते इलाज करवाना बेहद जरुरी होता है. यह बीमारी अमूमन किसी भी आयु गुट वाले व्यक्ति को हो सकती है. चलते समय संतुलन बिगडना, शरीर के जोडो में दर्द रहना, चेहरे पे सुजन आना, चबाते व गिटकते समय तकलीफ होना, हाथ-पांव ढिले पडना आदि को जीबीएस की बीमारी का लक्षण कहा जाता है. इस बीमारी की चपेट में अमूमन छोटे बच्चे ही अधिक आते है.
गुलियन बैरी सिंड्रोम एक तेज रफ्तार पॉली म्यूरोपैथी है. जिसकी वजह से मांस पेशियां कमजोर होती है. इस बीमारी का शिकार रहने वाले मरीजों हेतु इलेक्ट्रोमायोग्राफी व सीएसएफ विश्लेषण जैसे इलेक्ट्रो डायग्नोसिस्ट इलाज करने की सलाह विशेषज्ञों द्वारा दी जाती है. जिसके चलते इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते हुए विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाकर इलाज करवाना बेहद जरुरी होता है. विशेष उल्लेखनीय यह है कि, इस बीमारी की ओर अनदेखी करने पर आगे चलने पर इस बीमारी से उभरना काफी मुश्किल हो जाता है और इस बीमारी की वजह से स्थायी तौर पर अपंगत्व आने के साथ ही जान के लिए खतरा भी पैदा हो सकता है. अत: इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते हुए समय रहते इसका इलाज करना बेहद जरुरी होता है.
* क्या है जीबीएस?
वायरल या बैक्टेरियल इंफेक्शन की वजह से अथवा रोग प्रतिबंधात्मक टीकाकरण के बाद कई लोगों को जीबीएस की बीमारी होने की बात सामने आयी है. इस बीमारी की वजह से हाथ व पैर की नशे कमजोर होती है. साथ ही धीरे-धीरे रोग प्रतिकारक क्षमता भी कम होती जाती है. पक्षाघात यानि लकवा एवं वात जैसी बीमारियां भी इसी वजह से पैदा होती है.
* क्या है लक्षण?
हाथ-पांव सुन्न होना, मांस पेशियों का कमजोर होना, आंखों व चेहरे की गतिविधियों में तकलीफ होना, मज्जातंतू का धीरे-धीरे नाकाम होना जैसे लक्षण से आगे बढते हुए इस बीमारी के विषाणु हाथ व पैर की उंगलियों सहित फुफ्फुस व श्वसननलिका पर हमला करते है. जिसके चलते मरीज की अवस्था पक्षाघात यानि लकवा वाली हो जाती है.
* कोविड के बाद बढे मरीज
कोविड की महामारी के बाद जीबीएस के बीमारी के मरीज बढने की बात सामने आयी है. वायरल या बैक्टेरियल इंफेक्शन के साथ ही टीकाकरण के बाद कई मरीजों को जीबीएस की बीमारी होने की जानकारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा दर्ज की गई है.
* समय पर इलाज से टलता है खतरा
जीबीएस अथवा एआईडीपी नामक इस बीमारी के लिए आईवीआईजी इंजेक्शन देना काफी महत्वपूर्ण होता है. यह इंजेक्शन थोडा महंगा है, लेकिन तीन दिन के भीतर यह इंजेक्शन लगाये जाने पर मरीज के लिए खतरा टल जाता है. हालांकि यह इंजेक्शन विशेषज्ञ डॉक्टर के निगरानी में ही देना आवश्यक है.
इस बीमारी में केवल हाथ-पैर ही ढिले नहीं पडते, बल्कि शरीर के अन्य अवयवों पर भी इस बीमारी का प्रभाव पड सकता है. यह बीमारी किसी भी आयु गुट के व्यक्ति को हो सकती है. इसके चलते समय रहते किसी योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेकर जीबीएस की जांच कराते हुए इलाज करवाना बेहद जरुरी होता है.
– डॉ. प्रीति मोरे,
फिजिशियन.