भगवान तो प्रेम में वश हो जाते है, वो यह नहीं देखते, मुझे किसने पुकारा हैं
प.पू. संत डॉ. संतोषदेव महाराज का प्रतिपादन

* कल्याण नगर में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन
अमरावती/दि. 28– भगवान तो प्रेम में वश हो जाते है, वो यह नहीं देखते, मुझे किसने पुकारा हैं. या ध्रुव प्रल्हाद जैसे पांच वर्ष के बालक ने बुलाया है या इज्जत पर आंच आई द्रौपदी ने पुकारा है, या फिर मां रुक्मिणी ने उनकों पत्र लिखकर अपना भावभेंट धरा था. परंतु मेरे ठाकुरजी पुकार सुनकर चले आते हैं. वैसे ही मां रुक्मिणी की पुकार सुनकर प्रभु कौंडण्यपुर में दाऊ बलरामजी के साथ पधारेें और मां गौरी के मंदिर में पूजा करने के उपरांत मां रुक्मिणी को द्वारका लेकर आए और माधवपुर में विवाह किया था, ऐसा प्रतिपादन शिवधारा के प.पू. संत डॉ. संतोषदेव महाराज ने व्यक्त किए. वे स्थानीय कल्याण नगर में संत बालयोगी गजानन महाराज के जन्मोत्सव पर आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के पांचवे दिन कथा श्रवण करवा रहे.
श्रीमद् भागवत कथा महापुराण के पांचवे दिन कथाव्यास संत डॉ. संतोषदेव महाराज ने अपनी सुमधूर वाणी में कथा श्रवण करवाते हुए कहा कि, ऐसे ही हम जब भी किसी दुख दूर करने की भावना से या सुख की प्राप्ति की भावना से या निष्काम प्रेम भक्ति की भावना से भगवान को पुकारेंगे तो वह दर्शन देने अवश्य आते है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि, एक बार रामपुरी स्थित पुरसवानी परिवार में बालक शिवम सुनिलकुमार पुरसवानी गरम पानी में गिर गया था. तो प्लास्टिक सर्जन डॉ. भरत शहा ने बोंडे अस्पताल में उसको आईसीयू में एडमीट करके कहा था कि, एक महिने के बाद बताएंगे कि, यह बच्चा बच पाएगा या नहीं. परंतु उसी बालक की माता ने सद्गुरु स्वामी शिवभजन महाराज की प्रतिमा उसके सिरहाने रखी और बाबाजी को पुकारा था. बाबाजी ने आधी रात को उनको दर्शन देकर तसल्ली दी थी. सुबह जब डॉक्टर आए तो उन्होंने देखा और कहा, इसको एडमीट करने की जरुरत नहीं है. इसको आज ही अपने घर ले जाईए, यह सब कृपा सद्गुरु देव भगवान शिवधारा वाले बाबा की थी. कथा के पांचवे दिन रुक्मिणी-कृष्ण विवाह के उपलक्ष्य में कथा स्थल पर बडी संख्या में भाविक उपस्थित थे. कथा स्थल पर पांचवे दिन भक्तों की भारी भीड उमडी और वहां एड. गुप्ता, अनिल तरडेजा, पूर्व पार्षद बलदेव बजाज, कैलाश पुंशी, अर्जून चांदवानी, लक्ष्मणदास पोपटानी, आचार्य देशमुख, श्यामलाल खत्री, शिवकुमार मोहनानी, सुंदरदास कटिहार विशेष तौर पर महाराज के पिता जयपालदासजी नवलानी आदि का सम्मान किया गया.