अमरावतीमहाराष्ट्र

‘हे हाथों मा धरिया ने कानो मा बालिया रे लो…’

मेलघाट रंगोत्सव : पथनाट्य, लोकनृत्य, एकांकिका बना जनजागृति का माध्यम

* नागरी सुविधा केंद्र पर उमड़ी आदिवासी बंधुओं की भीड़
चिखलदरा /दि.25– आदिवासियों का ‘शिमगा’ अर्थात फागुन उत्सव जिसे रंगोत्सव भी कहा जाता है, इस ‘मेलघाट रंगोत्सव’ का पंचमी तक ‘अबीर गुलाल’ उड़ाते हुए आदिवासी बंधु आनंद ले रहे हैं. यह उत्सव केवल शासकीय आयोजन नहीं, बल्कि अब इन आदिवासी समाज बंधुओं के लिये यादगार पल बन चुका है. ‘हे हाथों मा धरिया ने कानो मा बालिया रे लो…’ जैसे पारंपरिक आदिवासी गीतों पर थिरकते हुए यह मूलनिवासी अपने पूर्वजों को याद कर नई पीढ़ी को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. इस ‘मेलघाट रंगोत्सव’ में हर प्रकार के रंग भी हैं और परंपराओं का संगम भी देखने को मिल रहा है.
स्थानीय गिरिराज विद्यालय व तहसील कार्यालय के समीप कवायत मैदान ‘मेलघाट रंगोत्सव’ सांस्कृतिक कार्यक्रम का जिलाधीश कार्यालय, जिला परिषद व एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प धारणी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजन किया गया है. ‘मेलघाट रंगोत्सव’ के उद्घाटन अवसर पर विधायक केवलराम काले, जिला परिषद सीईओ संजीता महोपात्रा, एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प अधिकारी प्रियंवदा म्हाडदलकर, तहसीलदार जीवन मोरनकर, गटविकास अधिकारी शिवशंकर भारसाकले, वन अधिकारी यशवंत बहाले, मुख्याधिकारी लोहकरे, हिरुजी हेकडे, उपेन बघेल, नामदेव येवले, किरवाडे आदि प्रमुखता से उपस्थित थे. जिप सीईओ संजीता महोपात्रा ने कहा कि, फागुन के शिमगा में आदिवासी समाज बंधु अपने घर लौटते हैं. उनके लिए पंचमी तक इस त्यौहार का विशेष महत्व होता है. आदिवासी समाज बंधुओं की परंपरा का जतन कर हम उन्हें आज के दौर से जोड़ते हुए घर बैठे सरकारी सुविधा का लाभ दे सकें, यह प्रयास इस ‘मेलघाट रंगोत्सव’ के माध्यम से किया है. यह महोत्सव लोककला, पारंपरिक वेशभूषा, पाककला, सांस्कृतिक धरोहर के साथ उन्हें आज के युग में आवश्यक सुविधा से परिचित करने, उन्हें जनजागृत करने का एक मंच है. जिसका आदिवासी समाज बंधु लाभ ले रहे हैं. यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि होने की बात उन्होंने कही. विधायक केवलराम काले ने कहा कि, हम आदिवासी वैसे तो मूलनिवासी कहे जाते हैं, लेकिन आज भी हम कई सुविधाओं एवं सेवाओं से वंचित हैं. शासन ने अब आदिवासी समाज के विकास का बीड़ा उठाकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया है. इस प्रयास को अगर हमें सफल बनाना है तो चिखलदरा में उपस्थित अधिकारी व कर्मचारियों द्वारा लगाये गये विविध स्टॉल को भेंट देकर अपनी सुविधा अनुसार खुद को आधुनिकीकरण के साथ अपडेट करने का आवाहन उन्होंने किया. इस ‘मेलघाट रंगोत्सव’ के माध्यम से प्रशासन को नरेगा के भुगतान जल्द से जल्द करने का सुझाव उन्होंने इस मंच द्वारा दिया.

* विविध स्पधाओं में जीते पुरस्कार
महोत्सव में लोकनृत्य, पाककला, पारंपरिक वेशभूषा स्पर्धा का प्रशासन द्वारा आयोजन किया गया, ताकि युवा पीढ़ी अपनी परंपरा को याद रख सके. इस उद्देश्य से आयोजित इन स्पर्धाओं में कई समाजबंधुओं ने पुरस्कार प्राप्त किये, जिनमें लोकनृत्य स्पर्धा में प्रथम धारणी तहसील की बिजूधावडी, द्वितीय चिखलदरा तहसील का ढाकणा, तृतीय बेरदाबला तथा प्रोत्साहन पुरस्कार चिखलदरा के भिरोजा व कोयलारी ने जीता. वेशभूषा स्पर्धा में प्रथम साबूलाल व गीता दहीकर (मोथा), द्वितीय सरिता मावसकर (धारणी), तृतीय अनुसया पराते (धोतरखेडा), पाककला में प्रथम जासमू कासदेकर (आलंदी), द्वितीय सुमन कासदेकर व प्रमिला कंदिलवार, तृतीय नगाय चिमोटे को प्रदान किया गया. इन सभी को पुरस्कार स्वरुप स्मृतिचिन्ह व नकद राशि प्रदान की गई.

* विविध स्टॉल पर आदिवासियों की भीड़
आदिवासी समाजबंधु जो सालभर अपने मूलगांव से रोजी-रोटी के लिए बाहर रहते हैं, इस बार उनके पास पहचान पत्र के रुप में इस्तेमाल होने वाले दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते. इस रंगोत्सव के माध्यम से प्रशासन ने उन्हें एक ही छत के नीचे सभी प्रकार के दस्तावेज बनाने के लिए सुविधा स्टॉल लगाये थे, जिसमें आधार अपडेट करना, एग्रीस्टैक पंजीयन, राशनकार्ड पंजीयन, गोल्डन कार्ड, स्वास्थ्य जांच, नि:शुल्क मौखिक जांच, पर्यटन विभाग, तहसील कार्यालय की विविध सेवाएं, पोस्ट ऑफिस व बैंक खाता खोलना उसे आधार से अपडेट करना जैसी सुविधाओं के स्टॉल लगाये गये थे. इन स्टॉल को भी इन आदिवासी बंधुओं ने भेंट देकर अपने दस्तावेज बनवाने की प्रक्रिया शुरु कर दी है.

* लोककला बनी जनजागृति का आधार
बता दें कि, इस मेलघाट महोत्सव में आदिवासी समाज की भावनाएं तथा उनकी विचारशैली अनुरुप उन्हें जागृत करने की मुहिम चलाई जा रही है. आदिवासी समाज में शिक्षा का अभाव रहने से वे आज भी रुढ़िवादी परंपरा अनुसार अपने बच्चों का उपचार करते हैं. इसी परंपराओं के चलते मेलघाट में कुछ वर्ष पूर्व 21 दिनों के बच्चे के उनके ही माता-पिता ने 62 बार चटके देकर उपचार करने की कोशिश की थी. इस प्रकार की उपचार पद्धति कितनी घातक है. आज के दौर की स्वास्थ्य सुविधाओं को अपनाकर अपने बच्चों को ‘कुपोषित’ नहीं सुदृढ़ बनाने का आवाहन करते हुए लोककला के माध्यम से आदिवासियों को नए संसाधनों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.

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