अमरावती

केंद्रीय अधिकारियों को गिरफ्तारी से मिलने वाली छूट रद्द

सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला

नई दिल्ली/दि.12- केंद्रीय सरकारी सेवा के संयुक्त सचिव और उस पद से वरिष्ठ सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों को भ्रष्टाचार के प्रकरणों में गिरफ्तारी से मिलने वाली छूट अथवा संरक्षण रद्द करने का निर्णय वर्ष 2014 के पूर्व से यानि 11 सितंबर 2003 से चालू रहे विविध प्रकरणों में भी लागू होगा. ऐसा महत्वपूर्ण निर्णय सर्वोच्च न्यायालय की घटनापीठ ने सोमवार को दिया. 16 साल से प्रलंबित रहा यह मुद्दा इस कारण मार्ग पर लगा है.
घटनापीठ के निर्णय के मुताबिक वर्ष 2014 के पूर्व के प्रकरणों में भी केंद्रीय अधिकारियों को संरक्षण नहींं मिलेगा. न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता में इस घटनापीठ में न्यायमूर्ति अभय ओक, संजीव खन्ना, विक्रम नाथ और जे. के. महेश्वरी का समावेश था. लेकिन ताजा निर्णय दिल्ली पुलिस कानून की धारा 61 (अ) अंतर्गत न्यायालय के समक्ष प्रलंबित प्रकरणों को लागू होगा या आगे चलने वाले प्रकरणों को लागू होगा. इस बाबत स्पष्टता नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस कानून की धारा 6 (अ) बाबत प्रावधान के संदर्भ में ताजा निर्णय हुआ है. वर्ष 2014 के निर्णय में न्यायालय ने संयुक्त सहसचिव और उस पद के सरकारी अधिकारी, कर्मचारियों को गिरफ्तारी से मुक्तता का प्रावधान रद्द किया था. दिल्ली सरकार के मुख्य जिला वैद्यकीय अधिकारी डॉ. आर.आर. किशोर की घुसखोरी के प्रकरण की खंडपीठ ने यह प्रकरण घटनापीठ की तरफ भेजा था. दिल्ली विशेष पुलिस आस्थापना कानून की धारा 6 (अ) (1) का उचित अर्थ क्या है? घटना की धारा 20 के संदर्भ में दिया हुआ न्यायालय का कोई भी पुराना निर्णय किसी भी पुराने कामकाज पर परिणाम कर सकता है क्या? जैसे मुद्दों पर सुनवाई हुई. यह प्रकरण 16 वर्ष पूर्व जनवरी 2007 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया था. दिल्ली पुलिस कानून में कहा गया है कि भ्रष्टाचार प्रतिबंधक कानून 1988 के तहत अपराध किया जाता है, तब दिल्ली विशेष पुलिस आस्थापना, केंद्र सरकार की पूर्वानुमति के बिना इस प्रकरण की जांच नहीं कर सकती. विशेषतः यदि केंद्र सरकार के सहसचिव दर्जे के अधिकारियों पर मामला दर्ज होगा तो रिश्वत लेते समय अथवा लेने का प्रयास करते समय घटनास्थल पर ही गिरफ्तारी की गई होगी तो पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है.
ऐसा था प्रकरण
इस प्रकरण में किशोर को रिश्वत लेते हुए सीबीआई ने गिरफ्तार किया था. लेकिन उन्होंने धारा 6 का आधार लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी. इस प्रकरण में सीबीआई ने गिरफ्तारी पूर्व ही जांच शुरु की थी और इस कारण यह धारा यहां लागू नहीं होती. ऐसा दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना था. यदि गिरफ्तारी गैरकानूनी साबित हुई तो भी इसका डॉ. किशोर निर्दोष नहीं है. सीबीआई केंद्र सरकार की मंजूरी लेकर फिर से जांच शुरु करें, ऐसे भी निर्देश उच्च न्यायालय ने दिए थे.

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