अमरावतीमहाराष्ट्र

‘गालफुगी’ से बचाव हेतु बच्चों को ‘एमएमआर’ वैक्सीन देना जरुरी

भोजन करते समय होती हैं काफी तकलीफ

* रोगप्रतिकार शक्ति बढाने हेतु टिकाकरण आवश्यक
अमरावती /दि.19– गालफुगी नामक बीमारी अपनेआप में एक संसर्गजन्य बीमारी है. जिसका प्रादूर्भाव गर्मी के मौसम दौरान बढ जाता है. खांसने, छींकनेे व बोलने की वजह से गालफुगी के वायरस बच्चों के शरीर में प्रवेश करते है और इस बीमारी की वजह से लार ग्रंथी में सुजन आ जाती है. जिससे गाल सुजा हुआ दिखाई देता है, या कभी-कभी दोनों गाल सूज जाते है. जिससे बच्चों को भोजन करने में तकलीफ होती है और वे भोजन को निगल नहीं पाते. ऐसे में इस बीमारी से बच्चों का संरक्षण करने हेतु उन्हें एमएमआर वैक्सीन दी जाती है.
बता दें कि, गालफुगी की बीमारी बचपन में ही होती है और शालेय शिक्षा लेनेवाली उम्र के बच्चों को इस बीमारी के होने का खतरा सबसे अधिक होता है. ऐसे में बच्चों को इस बीमारी के संक्रमण से सुरक्षित रखने हेतु वैक्सीन तैयार की गई है और जिन क्षेत्रों में सभी बच्चों का टिकाकरण हो चुका है, उन परिसरों से इस बीमारी का संक्रमण लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है. इस बीमारी के चलते बुखार एवं गले में संक्रमण जैसे लक्षण दिखाई देते है. साथ ही बच्चियों के पेट में दर्द होता है. इस बीमारी के लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देते है और इस बीमारी का संक्रमण कान तक पहुंच जाने पर बहरे होने का खतरा भी रहता है. इसके चलते संक्रमण का शिकार रहनेवाले बच्चों को स्कूल में भेजना टाला जाना चाहिए और उन्हें घर में ही सबसे अलग-थलग रखा जाना चाहिए. इसके अलावा बच्चों को समय पर एमएमआर की वैक्सीन दिए जाने पर उन्हें इस बीमारी से सुरक्षित रखा जा सकता है.

* लार ग्रंथी में सुजन, ठुड्डी में दर्द
इस बीमारी के संक्रमण की वजह से लार ग्रंथी में सुजन आ जाती है. जिससे गाल का हिस्सा फुला हुआ दिखाई देता है. साथ ही गाल में आई सुजन की वजह से जबडे एवं ठुड्डी में दर्द होता है. इसके अलावा गालफुगी होने की वजह से छोटे बच्चों को भोजन निगलने में तकलीफ होती है. जिसके चलते उन्हें पानी, जूस व शरबत जैसे पेय पदार्थ ही दिए जा सकते है.

* ठंडी लगकर बुखार और सिरदर्द
गालफुगी की बीमारी में ठंडी लगकर बुखार और सिरदर्द की तकलीफ होती है. साथ ही लार ग्रंथी में सुजन रहने के चलते भोजन व पानी निगलते समय दिक्कत होती है. हालांकि 8 से 10 दिन तक इलाज लेने पर यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो जाती है.

* विषाणूजन्य है बीमारी
गालफुगी की बीमारी संसर्गजन्य है. ऐसे में इस बीमारी की चपेट में रहनेवालों से दूर रहना चाहिए. साथ ही इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत ही बालरोग विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए.

* किस आयुवर्ग के लिए खतरा अधिक
वैसे तो गालफुगी की तकलीफ किसी भी आयु गुट के नागरिकों को हो सकती है. परंतु इसका सर्वाधिक प्रमाण छोटे बच्चों में दिखाई देता है. जिसके चलते छोटे बच्चों की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए.

* बडों को गलगंड होने पर क्या है खतरा
छोटे बच्चों की तरह वयस्कों को भी गलगंड यानी गालफुगी के संक्रमण की तकलीफ हो सकती है और इस संक्रमण का शिकार होने पर वयस्कों को छोटे बच्चों की तुलना में कहीं अधिक तकलीफ होती है. अन्य विषाणूजन्य बीमारियों की तरह इस बीमारी पर कोई निश्चित दवाई नहीं है, बल्कि मरीज में दिखाई देनेवाले लक्षण के अनुसार उन्हें दवा दी जाती है.

* बच्चों को एमएमआर वैक्सिन देना आवश्यक
इस बीमारी से बच्चों को दूर रखने हेतु बच्चे को 9 माह की आयु के बाद एमएमआर का पहला डोज तथा इसके 6 माह पश्चात दूसरा डोज दिया जाना चाहिए.

* गालफुगी होने पर क्या करें?
गालफुगी से बचाव करने हेतु संतुलित आहार बेहद जरुरी है. साथ ही हार्मोन्स व थायरॉईड के लिए आयोडिन आवश्यक होता है, ऐसे में आयोडिनयुक्त भोजन का अपने आहार में समावेश करना चाहिए. जिसमें सेब, दूध, दही, चीज, अंडे, केले व मछली का समावेश हो सकता है.

* गर्मी के मौसम दौरान गालफुगी यानी गलगंड की बीमारी के संक्रमण का खतरा अधिक रहता है. जिसके चलते भूख कम लगती है. हालांकि, 8 से 10 दिन तक इलाज करवाने पर इस बीमारी से ठीक भी हुआ जा सकता है. साथ ही इस बीमारी का छोटे बच्चों को खतरा काफी अधिक रहता है. ऐसे में उन्हें इस बीमारी से सुरक्षित रखने हेतु एमएमआर की वैक्सीन लगाई जानी चाहिए.
– डॉ. सतीश तिवारी
बालरोग विशेषज्ञ.

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