भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की आत्मकथा रूको नहीं पथिक विमोचित

अमरावती/ दि.30-‘… न लिखता तो कोई कैसे जान पाता कि वह कौन-सी बात है जिसके कारण मेरे मन में तेरहवी के भोज के प्रति कड़ी वितृष्णा और विक्षोभ है! … मेरे हालात को समझकर स्कूल सर्टिफिकेट में अपने हाथ से मेरी जन्मतिथि पीछे करके मुझे दो साल तक अपने कार्यालय में चपरासी की नौकरी देनेवाले राजपत्रित अधिकारी के बारे में कोई कैसे जान पाता?’ अपने संघर्ष -काल की ऐसी अनेक मर्म-स्पर्शी घटनाओं को उद्घटित करती भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की ‘रुको नहीं पथिक’ शीर्षक आत्मकथा का रविवार28 मई को वरिष्ठ नाट्य-कर्मी-लेखक प्रा. रमेश लोंढे के हाथों विमोचन किया गया.
भारत सरकार, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, आचार्य आनंद ऋषि साहित्य निधि संस्था, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली आदि द्वारा विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित वरिष्ठ लेखक-अनुवादक ‘प्रखर’ की यह सोलहवीं पुस्तक है. बताया गया कि विमोचित पुस्तक के एक खण्ड में उनके पचास वर्षों से अधिक के लेखकीय-जीवन के अनुभव हैं जो नव- लेखकों के लिए उपयोगी एवं प्रेरणादायी साबित होंगे. कार्यक्रम के आरंभ में मराठी लेखक पवन नालट और विष्णु सोलंके को उनकी नेत्र-दीपक उपलब्धियों के लिए शॉल, मुक्ता-लता तथा पुस्तकें देकर सम्मानित किया गया. पवन नालट को हाल ही में केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2022 के युवा साहित्य पुरस्कार से गौरवान्वित किया गया है तथा विष्णु सोलंके के समग्र साहित्य पर पीएचडी के लिए संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है. ‘प्रखर’ जी के आवास पर काव्य-संध्या के रूप में सम्पन्न इस गरिमायुक्त कार्यक्रम में प्रा. रमेश लोंढे, डॉ. आशा पाण्डेय, डॉ.सुबोध निवाने, डॉ. रवि सिरसाट, डॉ. ममता मेहता, डॉ. मनोज जोशी, पवन नालट, सुरेश आकोटकर, विष्णु सोलंके, रमेश भाई दरजी, शंकर भुतड़ा, श्याम दम्मानी, मनोहर तिखिले, राजश्री कडु, प्रवीण मुलताईकर, भगवान वैद्य ‘प्रखर’ द्वारा उत्कृष्ट मराठी तथा हिंदी रचनाएं प्रस्तुत की गई.