1806 में रघुजी राजे भोसले ने शुरु किया था पोला
छोटे बच्चों का समूचे विदर्भ में भरता तान्हा पोला

अमरावती/दि. 2 – श्रावण अमावस्या को महाराष्ट्र में पोला बडे उत्साह के साथ मनाया जाता है. भारत में किसान अपने सहयोगी बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते है. आज भी विदर्भ में पोला बडे उत्साह से मनाया जाता है. अपने बैलों को तैयार कर सजाकर किसान उत्साह से पोले में लाते है. छोटे बच्चों के लिए तान्हा पोला का प्रारंभ नागपुर में रघुजी राजे भोसले की पहल से हुआ था. वह वर्ष 1806 का था. आज तान्हा पोला 218 वर्षों का हो गया है. बच्चों का तान्हा पोला में जाने का जोश देखते ही बनता है.
* मिट्टी और लकडी के बैल
तान्हा पोला का प्रारंभ करने के साथ बच्चों के लिए मिट्टी के बैल और लकडी के बैल बनाए जाने लगे. जिन्हें सजाकर बच्चें अपने पोले में ले जाते. इसके साथ ही बच्चों को भी पोले पर उनका बैल की सजावट देखकर शगुन देने का प्रचलन प्रारंभ होने की चर्चा एवं मान्यता है.
* खेती किसानी से बडा लगाव
इतिहास में गौर करें तो राजे भोसले को खेती-किसानी से बडा लगाव रहा. वें किसानों का बडा स्नेह और आदर करते थे. इसी प्रकार कला प्रेमी एवं सृजनशील थे. कला का गौरव करने का विशेष गुण उनमें था. उन्होंने नागपुर के तेलंगखेडी में अनेक बगीचे भी खूबसूरत बनाए थे. वें खेती को केवल उद्यम नहीं तो परंपरा और संस्कृति मानते थे. यह परंपरा और संस्कृति नई पीढी भी अपनाएं ऐसा उनका आग्रह था. इसीलिए नागपुर और अमरावती में 200 से अधिक वर्षो से तान्हा पोला की परंपरा चली आ रही है. बच्चों को इस दिन का बडा इंतजार रहता है. विदर्भ में कुछ भागों में पोले पर काली और पीली मारबत के जुलूस भी निकाले जाते है. राजनेताओं एवं व्यवस्था पर मारबत के जरिए व्यंग किए जाते हैं.
* बच्चों को उपहार
नागपुर में काष्ठ शिल्पकार कायरकर ने बैल जितने आकार का लकडी का बैल बनवाया. राजे भोसले ने लकडी के बैल को घूमाने के लिए उसे पहिए भी लगवाएं. जिससे बच्चे यह बैल यहां-वहां ले जा सकते थे. कालांतर में लकडी के छोटे बैल भी बनना प्रारंभ हो गए. बच्चे चाव से न सिर्फ इन्हें अपनाते बल्कि अपनी रुची और यथाशक्ति सजाने का भी काम करते. राजे भोसले बच्चों का पोला भरवाने के साथ इसके लिए मुनादी करवाते. फिर बच्चों को उपहार भी दिए जाते. बैलों को लेकर जिस प्रकार जुलूस निकाले जाते है, वैसे ही तान्हा पोला के बैलों के भी जुलूस निकाले जाते थे. अपना पशुधन की सुरक्षा और जतन का पाठ इस माध्यम से राजे भोसले ने पढाया.
* आज भी मौजूद है वह बैल
राजे मुधोजीराव भोसले ने भी परिवार की परंपरा को कायम रखा है. उनके वाडे में सबसे बडा लकडी का बैल सुरक्षित जतन कर रखा गया है. 8 फीट उंचा 6 फीट चौडा यह लकडी का बैल है. जिसके पैरो में चांदी के कडे है. भोसले घराना द्वारा लकडी के बैल बनाए जाने की परंपरा शुरु किए जाने से कई काष्ठशिल्पीयों को रोजगार मिला. लकडी की पटिया को आऊटलाईन कर उसे पहिए लगाकर लकडी का बैल तैयार होता है.
* आज चार जगह पोला
पोले का त्यौहार मनाया जा रहा है. किंतु बारिश का खलल पडने की आशंका है. सबेरे से शहर और परिसर में बरसात हो रही है. उधर नेहरु मैदान, शिवाजी संस्था के रुरल कालेज के मैदान, खोलापुरी गेट चौक, राजापेठ और दस्तुर नगर में पोले के आयोजन है. जहां किसान शाम को अपने बैल सजाकर लाएंगे. लोग भी कृषको के साथी वृषभ राज की मनोभाव से पूजा करते है. घर-घर मिट्टी के और लकडी के बैलों की भी पूजा होती है.