अमरावतीमहाराष्ट्र

तृष्णातृप्ति की संस्कृति हो रही समाप्त

घुटभर पानी के लिए चलना पडता है कोसो दूर

अमरावती/दि.16– ग्रीष्मकाल में कडी धूप रहते दोपहर के समय शहर की सडको पर घुमने पर घुटभर पानी भी खरीदने की नौबत आ सकती है. लेकिन शहर में हर वर्ष ग्रीष्मकाल में भीडभाड वाले स्थलो पर रहनेवाली तृष्णा तृप्ति इस वर्ष दिखाई नहीं दे रही है. पहले की तरह स्वयंसेवी संस्था भी पाणपोई का निर्माण करते दिखाई नहीं देती.

ग्रीष्मकाल आने पर अनेक स्वयंसेवी संस्था पक्षियों के लिए पेयजल की सुविधा करने के लिए कुंडे लगाते दिखाई देते है. यह उपक्रम प्रशंसनीय है. लेकिन नागरिको को पेयजल के लिए रहनेवाली आवश्यक सुविधा कम होती दिखाई दे रही है. पानी पिलाना यह पुण्य का काम है. इस कारण अनेक व्यक्ति और स्वयंसेवी संस्था पहले सार्वजनिक रुप से यह सुविधा करते थे. लेकिन तृष्णा तृप्ति लगाने के लिए अब प्रयास कम होते दिखाई दे रहे है. इस कारण इसका लाभ पानी की बोतल बेचनेवालो को हो रहा है. कडी धूप में प्यासे व्यक्तियों को अपनी प्यास बुझाने के लिए 10 से 20 रुपए गिनने पड रहे है. विविध स्थानो पर काम करनेवाले मजदूरो को प्यास बुझाने के लिए पानी खरीदना काफी परेशानी का काम है. शहर में अब कुछ ही स्थानो पर पाणपोई दिखाई देती है. पेयजल के लिए नागरिको को भटकना न पडे इसके लिए शहर की सडको पर पाणपोई रहना आवश्यक है.

* यह है कारण
पहले पाणपोई शुरु करने ज्यादा खर्च नहीं आता था. लेकिन अब शेड खडा करने के साथ ही पानी भी हजारो रुपए खर्च कर खरीदना पडता है. इस कारण भीडभाड वाले इलाको में और मुख्य मार्गो पर तृष्णातृप्ति दिखाई नहीं देती.

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