खामोश हुई संगीत जगत की एक अमर आवाज

भारतीय ही नहीं अपितु विश्व की नारियों के हिस्से में आनेवाले विविध रूप, प्रसंग, सुख, दुख और सभी प्रकार की परिस्थितियों की तीव्र भावना को गीतों के माध्यम से एकीकृत स्वर देनेवाली वरिष्ठ पार्श्वगायिका आशा भोसले का निधन भारतीय संगीत प्रेमियों के लिए निश्चित ही अपूरणीय क्षति है. एक स्वर नक्षत्र अर्थात सितारा विलुप्त हो जाने की भावना हर कोई व्यक्त कर रहा है. सिने जगत से लेकर संगीत जगत के अनेकानेक दिग्गजों ने सचमुच गायन क्षेत्र की सभी दिशाओं को जीतनेवाली आशा भोसले के अवसान पर गहरा दु:ख व्यक्त किया है. सचमुच आशा भोसले विलक्षण गायिका थी. कभी उनके गीतों के रसिकवर्ग ठुड्डी पर हाथ का आधार देकर आंखे बंद कर सुनते, इस प्रकार के गीत है तो ऐेसे भी गीतों को आशा भोसले ने गाया है कि हम सुध-बुध भुलाकर झूम उठते. थिरक उठते हैं. इस प्रकार की गायन शैली सचमुच कठोर अभ्यास से ही प्राप्त की जा सकती है. अभ्यास की बजाय साधना कहना उचित रहेगा. अपने गीतों के माध्यम से वे सदैव संगीत प्रेमियों के मन में रहेगी. उन्होंने जीवन के जो उतार-चढाव देखे और उनका दृढता से सामना किया. वह भी न केवल विलक्षण अपितु हर दौर की तरूण पीढी के लिए प्रेरणास्पद कहा जा सकता है. वे अगली कई पीढियों के लिए प्रेरक रहेगी, इसमें तनिक भी शंका नहीं.
आशा भोसले की पहले यह पहचान थी कि वे संगीतज्ञ दीनानाथ मंगेशकर की सुपुत्री है. भारत की गान कोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन है. इसके अतिरिक्त अपनी पहचान बनाने के लिए आशा भोसले ने 11 वर्ष की आयु में संघर्ष प्रारंभ किया तो फिर पीछे मुडकर नहीं देखा. एक दौर ऐसा भी आया कि लता जी से अधिक गीतों का काम आशा जी के पास रहता था. इसके अपने कारण भी रहे. आशा जी विविधतापूर्ण गायन में महारथ हासिल कर चुकी थी.े इसी कारण उत्तर और दक्षिण सभी क्षेत्र के दिग्गत संगीतज्ञ अपनी नई रचना आशा भोसले के साथ करना चाहते थे.आशा जी ने भी दिग्गज संगीतकारों के साथ अपनी आवाज को नये अंदाज में प्रस्तुत किया. फलस्वरूप वे सभी मूड के गीत गाने और उनके माध्यम से श्रोतावर्ग, रसिकों के दिलों में बस जाने में सफल रही.
आशा जी के निधन पर एक वरिष्ठ संगीतज्ञ ने सटीक कहा कि अब हमें लता और आशा नहीं है, इस बात की आदत डालनी होगी. यह बहुत कठिन है लगभग असंभव है. उसी प्रकार मनसे नेता राज ठाकरे ने उन्हें लास्ट एम्परर कहा. फिल्मकार रमेश सिप्पी ने कहा कि ऐसी गायिका सदियों में एक होती है. इन बातों से स्पष्ट है कि किस श्रेणी, गुणवत्ता की गायिका आशा भोसले रही. सुगम संगीत का एक युग समाप्त हो जाने की भावना अधिकांश रसिकों की आज हो रही है. वहीं जीवन का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है.
आशा भोसले ने कडे परिश्रम से अपनी आवाज को विविध मूड के अनुरूप बनाया. पिता का छत्र लडकपन में ही हट गया था. ऐसे में व्यक्तिगत जीवन का संघर्ष आपने किया. उन संघर्ष पर मात करते हुए गायन की अपनी विशिष्ट शैली विकसित की. फिर उस शैली में भी सीमित न रहते हुए प्रत्येक विधा के और परिस्थिति के गीतों को इस अंदाज में गाया कि सटिक रहे. 12 हजार गीतों को आपने आवाज दी. निश्चित ही एक- एक गीत की रिकार्डिंग उस दौर में बडा परिश्रम लिए होती थी. बार- बार टेक और रिटेक होते थे. सफलता के लिए हमेशा कठोर परिश्रम और लगन के लिए उम्र के 80 वर्षो बाद भी वे तैयार रहती. उसी प्रकार आवाज, शैली को लेकर जितने प्रयोग आशा भोसले ने किए, हमें नहीं लगता किसी अन्य गायिका ने इतनी रिस्क ली हो. उनके नाम पर शो आयोजित किए गये. वे बिरले कलाकारों में रही कि उनके नाम पर शो के टिकट देश- विदेश में हाथों हाथ बिक जाते थे. वे भी रसिकों के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने का संपूर्ण प्रयत्न करती. जीवन के 92 वर्ष की आयु में भी अंतिम दिनों तक उनका सक्रिय रहना बतलाता है कि नेम और फेम के चक्कर में न पडकर आपने अपनी लता दीदी समान अनुशासन का संपूर्ण अनुगमन किया. ऐसी विलक्षण प्रतिभा को सहेजना आवश्यक भी था. उनके जाने से हर कोई, विशेषकर संगीत की थोडी भी समझ और रूचि रखनेवाले रसिक कह रहे है कि संगीत जगत की एक अमर आवाज आज मौन हो गई है. उनके अनेकानेक गीतों ने दो तीन पीढियों को प्रभावित किया. मनोरंजन किया. आनंद के असीमित क्षण दिए तो प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना भी सिखाया. अतिशयोक्ति लग सकती है. किंतु निश्चित ही आशा भोसले का कला जीवन सभी के लिए उर्जा और प्र्रेरणा देनेवाला रहा है.
अमरावती विद्यापीठ ने अपने तीसरे ही दीक्षांत समारोह में आशा जी को सबसे बडी डी लिट की उपाधि से गौरवान्वित किया था. यह कहना थोडा कठिन लग रहा है कि सम्मान आशा जी का बढा अथवा विद्यापीठ का ! आशा जी ने अपने स्वर्णिम दौर में अमरावती विवि की मानद उपाधि ग्रहण कर विनम्रता का परिचय दिया था. वह क्षण भी विद्यापीठ से जुडे प्रत्येक के जीवन में अमिट रहेगा. उस समारोह के प्रत्यक्षदर्शी अमरावती के अनेक गणमान्य ने यह भावना बोलकर बतलाई है.
संगीत पर मंगेशकर परिवार का स्नेह , जुडाव कहने की बात नहीं है. अपने काम के प्रति सदैव सजग रहने, निष्ठावान रहने की आदतें भारतीय फिल्म इंडस्ट्री ने मंगेशकर जैसे घरानों से ही अपनाई है. आशा भोसले ने भारत की सभी भाषाओं में अधिकारपूर्वक पार्श्वगायन किया तो निश्चित ही इसके पीछे उनकी लगन रही. संगीतकार खय्याम ने बताया था कि कोई भी गीत गाने से पहले वे परदे पर प्रस्तुत करनेवाली अभिनेत्री, सिच्युऐशन और अन्य बातों पर गौर करती. उपरांत पहले खूब रियाज करती. उसके बाद स्टुडियों में रिकॉर्डिग के लिए प्रस्तुत होती. यह सब बातें सिध्द हस्त गायिका के सदगुण कहे जा सकते हैं. जीवन में दुख की बेला में भी वे डगमगाई नहीं तो सुखों में इतराई नहीं. विनम्रता तो खैर संपूर्ण मंगेशकर परिवार को ही अंगीकार है.आए उतार चढाव से निर्बल होने की बजाय वे सबल और अधिक सुदृढ होकर आगे बढी. परिजनों का वियोग सहा. अपनी संतानों की अकाल मृत्यु को भी देखा, दु:ख सहन किया. कह सकते हैं कि इन घटनाओं ने आशा जी को झकझोर ने की पूरी कोशिश की थी. मगर उन्होंने कई अवसरों पर स्थितप्रज्ञ होकर सुख दुख का सामना किया. आशा भोसले के जीवन के उतार चढाव से भी युवा पीढी सीख ले सकती है. प्रेरणा ले सकती है. आशा भोसले अब अपनी बेजोड गायिकी के कारण हमारे साथ रहेगी. उनकी गायन शैली अपनाने की कोशिश दो पीढियों ने की है. आगे भी कई पीढियां आशा भोसले के गाए गीतों से सीखने, समझने का प्रयत्न करेगी.





