अमरावती आकर भारत लॉज में ठहरी थी आशा भोसले
कमरा नं. 7 में किया था महान गायिका ने निवास

* हव्याप्रमं में कार्यक्रम के चलते आना हुआ था अमरावती
* सन 1960 के दशक की यादों को अशोकभाई जोशी ने किया ताजा
* अशोकभाई की तब 10 वर्ष की उम्र थी, आशाताई को तानपुरा बजाते देखा था
अमरावती/दि.13 – गत रोज कालकलवित हुई महान गायिका आशा भोसले का अमरावती से भी घनिष्ठ संबंध रहा, यह बात शायद बहुत कम लोगों को पता हो. साथ ही इस बात की भी अब शायद ही किसी को जानकारी होगी. सन 1960 के दशक में आशा भोसले ने एक कार्यक्रम के सिलसिले में अमरावती आने के बाद तब प्रभात चौक स्थित भारत लॉज के कमरा नं. 7 में रुकते हुए अपना समय बिताया था. भारत लॉज के संचालक रहे वरिष्ठ पत्रकार अशोकभाई जोशी ने उस दौर की यादों को ताजा करते हुए बताया कि, वे तब करीब 8 या 10 वर्ष की आयु में थे, जब महान गायिका आशा भोसले अमरावती आकर भारत लॉज में रुकी थी. उस वक्त उन्होंने आशाताई को कमरा नं. 7 में तानपुरा बजाते हुए, गाना गाते हुए देखा और सुना था. वह उनके जीवन का अविस्मरणीय क्षण रहा.
दैनिक अमरावती मंडल के साथ उस अविस्मरणीय क्षण की यादों को ताजा करते हुए अशोकभाई जोशी ने बताया कि, उस समय शायद हनुमान अखाडे में गीत-संगीत का कोई कार्यक्रम आयोजित था. जिसमें हिस्सा लेने के लिए आशा भोसले का अमरावती आगमन हुआ था. जिन्हें उस वक्त आयोजकों द्वारा प्रभाग चौक के निकट स्थित व जोशी परिवार द्वारा संचालित भारत लॉज में ठहराया गया था. जहां पर उन्हें रुकने व रात्रि विश्राम हेतु उस समय के लिहाज से सुसज्जित रहनेवाले भारत लॉज के कमरा नं. 7 में रुकाया गया था. जहां पर विश्राम हेतु मिलनेवाले खाली समय में आशा भोसले द्वारा तानपुरा लेकर रियाज किया जाता था. अशोकभाई जोशी के मुताबिक उस समय वे 8 या 10 वर्ष की आयु में रहे होंगे और वे अक्सर ही अपने पिता व चाचा से मिलने हेतु भारत लॉज पर जाया करते थे. जहां पर उन्होंने कमरा नं. 7 में तानपुरा लेकर रियाज करती आशा भोसले को देखा था. हालांकि उस समय बाल्यावस्था में रहने के चलते उन्हें उस व्यक्तित्व की महानता व यशोकीर्ति का एहसास नहीं था, लेकिन जब वे थोडे बडे हुए और उन्हें आशा भोसले की प्रसिद्धी व उपलब्धियों के बारे में जानकारी हासिल हुई, तब उन्हें समय में आया कि, उन्होंने अपनी बाल्यावस्था के दौरान अपनी आंखों से साक्षात मां सरस्वती के प्रतिरुप का दर्शन किया था. हालांकि इसके उपरांत उनके जीवन में दुबारा ऐसा कोई मौका नहीं आया, जब उन्हें आशा भोसले से मिलने या उन्हें देखने का सौभाग्य मिला हो. जिसके चलते सन 1960 के दशक का वही एक पल उनके जीवन का अविस्मरणीय क्षण बन गया.





