अमरावती आयएमसी के संचालक सौमित्र के खिलाफ दर्ज एट्रॉसिटी का मामला खारिज
नागपुर हाईकोर्ट ने दी बडी राहत

नागपुर /दि.28 – जाति के आधार पर प्रताडना किए जाने से संबंधित कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं रहने की बात को ध्यान में रखते हुए मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने भारतीय जनसंवाद संस्थान के पश्चिम विभाग केंद्र के तत्कालीन संचालक डॉ. अनिलकुमार सौमित्र के खिलाफ दर्ज एट्रॉसिटी के अपराध व मुकदमे को अवैध ठहराते हुए रद्द करने का आदेश जारी किया. नागपुर हाईकोर्ट के न्या. प्रवीण पाटिल की अदालत द्वारा यह निर्णय दिया गया.
जानकारी के मुताबिक अमरावती स्थित फ्रेजरपुरा पुलिस ने भारतीय जनसंवाद संस्थान के ठेका नियुक्त सहायक व्याख्याता विनय सोनुले के शिकायत के आधार पर यह एफआईआर दर्ज कराई थी. जिस पर हुई जांच के बाद पुलिस ने अदालत में मुकदमा दायर किया था. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि, अनुसूचित जाति से वास्ता रखनेवाले सहायक व्याख्याता विनय सोनुले का तत्कालीन संचालक सौमित्र द्वारा हमेशा ही सार्वजनिक रुप से अपमान किया जाता था. हालांकि, इससे संबंधित कोई भी ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था. साथ ही साक्षीदारों के बयान और समिति द्वारा की गई जांच में भी सौमित्र द्वारा जाति के आधार पर सोनुले की प्रताडना किए जाने की बात नहीं कही गई थी. जिसे ध्यान में रखते हुए अदालत ने यह मुकदमा कायम रखने पर कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होने की बात कहते हुए सौमित्र के खिलाफ दर्ज अपराधिक मामले व मुकदमे को रद्द करने का निर्णय लिया. इस मामले में सौमित्र की ओर से एड. अतुल पांडे द्वारा सफल पैरवी की गई.
* कानून का दुरुपयोग न हो
लंबे समय तक अपमान व प्रताडना सहन करने वाले वंचित वर्ग के व्यक्तियों का संरक्षण करने तथा उनकी सामाजिक व आर्थिक परिस्थिति को सुधारने हेतु एट्रॉसिटी कानून को लागू किया गया है. ऐसे में जाति के आधार पर यदि वंचित वर्ग के किसी व्यक्ति के साथ अपमानास्पद व प्रताडनापूर्ण व्यवहार होता है, तभी इस कानून को लागू करना आवश्यक व अभिप्रेत है. परंतु अपने फायदे के लिए किसी अन्य व्यक्ति को अदालती कार्रवाई या मुकदमेबाजी में फंसाने हेतु वंचित वर्ग के व्यक्तियों द्वारा इस कानून का दुरुपयोग भी नहीं किया जाना चाहिए.
* … तो अधिकारी दोषी नहीं
अपने फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि, यदि कोई अधिकारी संस्था की प्रगति के लिए कर्मचारियों को अनुशासित रखने का प्रयास करता है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है और ऐसे व्यवहार के लिए अधिकारियों को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता.





