सीएम फडणवीस बने ‘वैदर्भिय भगीरथ’, कर डाली जल क्रांति
95 हजार करोड के वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड प्रकल्प को मिली मंजूरी

* विदर्भ के 8 जिलों को मिलेगी राहत, 15 तहसीलों को होगा लाभ
* पेयजल की समस्या होगी हल, सिंचाई व उद्योग को मिलेगी गतिमानता
मुंबई/दि.24 – विदर्भ में सिंचन के वर्षों पुराने अनुशेष को दूर करने के लिए राज्य मंत्रिमंडल ने लगभग 87,342 करोड़ से 95,000 करोड़ रुपये लागत वाले महत्त्वाकांक्षी वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड़ परियोजना को मंजूरी दे दी है. इस परियोजना के माध्यम से गोसीखुर्द (इंदिरा सागर) बांध से पानी सीधे बुलढाणा जिले के नलगंगा प्रकल्प तक पहुंचाया जाएगा, जिससे क्षेत्र की कृषि तस्वीर बदलने की उम्मीद है. इस प्रकल्प को राज्य सरकार की मंजूरी मिलते ही सीएम देवेंद्र फडणवीस एक तरह से ‘वैदर्भिय भगीरथ’ साबित हुए है. जिन्होंने केवल नागपुर ही विदर्भ नहीं, ऐसी टिका-टिपणी करनेवाले आलोचकों को जबरदस्त जवाब दिया है और करीब 427 किमी की लंबाई वाले नदीजोड प्रकल्प के जरिए अमरावती विभाग हेतु वरदान साबित होनेवाले प्रकल्प को मान्यता दिलाई है. जिसके चलते विदर्भ विशेषकर पश्चिम विदर्भ क्षेत्र में जल क्रांति होने जा रही है.
राज्य सरकार के अनुसार, इस योजना से भंडारा, नागपुर, वर्धा, अमरावती, यवतमाल, अकोला, वाशिम और बुलढाणा सहित आठ जिलों की लगभग 4 लाख 4 हजार 281 हेक्टेयर भूमि सिंचन के दायरे में आएगी. विदर्भ के आत्महत्याग्रस्त और कोरडवाहू क्षेत्रों के लिए इसे गेमचेंजर परियोजना माना जा रहा है. इस प्रकल्प के तहत रबी सीजन में पानी उपलब्ध कराने के लिए 50 जलसंग्रहण तलावों का प्रावधान किया गया है. इनमें से 18 पहले से अस्तित्व में हैं, जिनमें 10 की ऊंचाई बढ़ाई जाएगी, जबकि 32 नए तलाव बनाए जाएंगे. निम्न वर्धा, काटेपूर्णा और नलगंगा परियोजनाओं को भी भंडारण के लिए उपयोग में लाया जाएगा.
* परियोजना की पृष्ठभूमि और उद्देश्य
महाराष्ट्र सरकार ने सिंचन तंत्र आणि जलसंधारण के लिए महत्त्वाकांक्षी नदीजोड योजना वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड प्रकल्प को मंजूरी दी है. इसका लक्ष्य गोसीखुर्द जलाशय (वैनगंगा) से पानी उठाकर नलगंगा नदी प्रणाली में सप्लाई करना है, जिससे सूखाग्रस्त और सिंचनहीन विदर्भ इलाकों में कृषि को पानी मिले. विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को समयबद्ध रूप से तैयार करने के लिए प्रशासन द्वारा निर्देश जारी किए गए हैं, ताकि सरकारी मंजूरी प्रक्रिया जल्द पूरी हो सके. परियोजना में लगभग 426-427 किमी लंबी नहर, नलिकाएँ, लैपट इरिगेशन सिस्टम, कैनाल्स और पंप इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं. कुल लगभग 41 जल संग्रहण तटबंधों (डैम/तलाब) का निर्माण प्रस्तावित है, जिनमें से पहले से मौजूद 10 शामिल हैं; बाकी नए बनाए जाएंगे. विदर्भ सिंचन विकास महामंडल (वीआईडीसी) का कहना है कि वास्तविक काम अगले 1 वर्ष के भीतर शुरू होने की संभावना है, क्योंकि मंजूरी प्रक्रियाओं में तेजी लाई जा रही है. पर्यावरण मंजूरियों सहित केंद्रीय जल आयोग तथा अन्य विभागों की मंजूरियों के लिए प्रस्ताव भी भेजे जा रहे हैं ताकि समयबद्ध कार्य संभव हो. यह परियोजना विदर्भ की सूखाग्रस्त और सिंचनहीन कृषि भूमि के विकास में एक बड़ा परिवर्तन लेकर आएगी. बढ़ती सिंचन सुविधा से फसल उत्पादन, जलसंचय, ग्रामीण रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिलने की उम्मीद है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने इस योजना को राज्य के अकाल प्रभावित इलाकों के जल संकट से बाहर निकालने वाला बताया है. वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड परियोजना महाराष्ट्र की ऐतिहासिक सिंचन पहलों में से एक मानी जा रही है. यदि यह तय समय और बजट के अनुसार सम्पन्न होती है, तो यह विदर्भ की कृषि अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती है और लंबे समय से चले आ रहे जल संकट को समाप्त कर सकती है.
राज्य सरकार ने इस परियोजना को स्वीकृत करते हुए कहा है कि इससे न केवल सिंचाई की समस्या कम होगी, बल्कि किसी हद तक पाणीटंचाई से जूझ रहे इलाकों के किसानों को राहत भी मिलेगी. प्रोजेक्ट को अगले 10 वर्षों के भीतर पूरा करने की योजना बनाई गई है और आवश्यक वन, पर्यावरण तथा केंद्रीय जल आयोग की मंजूरियां भी इसी क्रम में प्राप्त की जाएंगी. हालांकि परियोजना की व्यापक रूप से प्रशंसा की जा रही है, कुछ जल विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई है कि प्रोजेक्ट के विभिन्न चरणों में प्राकृतिक पारिस्थितिकी, पर्यावरणीय प्रभावों और वित्तपोषण व्यवस्था को संतुलित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. इसके अलावा भू-अधिग्रहण और पुनर्वासनीत कार्यों में देरी भी संभावित अड़चनें हो सकती हैं.
* राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
इस निर्णय को विदर्भ में लंबे समय से प्रतीक्षित कृषि और जल सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. राजनीति के विश्लेषक मानते हैं कि इस परियोजना से विदर्भ के किसानों के जीवन स्तर में सुधार होने के साथ ही सरकार के प्रति ग्रामीण समर्थन भी मजबूत हो सकता है. वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड़ परियोजना विदर्भ के किसानों के लिए एक आशाजनक उम्मीद है, जो इलाके के व्यापक सिंचन संकट को दूर करने में मदद करेगी. हालांकि इसके सुचारु क्रियान्वयन के लिए कई प्रशासनिक, पर्यावरणीय और वित्तीय चुनौतियों का समाधान करना होगा, लेकिन सरकार के प्रयास से यह परियोजना अगले कुछ वर्षों में विदर्भ के कृषि नक्शे को बदल सकती है और इस क्षेत्र में स्थायी जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है.
* वैनगंगा-नलगंगा प्रकल्प से सिंचन लाभ, विस्तृत आंकड़े और विशेषज्ञ राय
1. सिंचन क्षमता और लाभार्थी क्षेत्र
इस परियोजना के पूरा होने पर कुल लगभग 3.71 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सीधा सिंचन लाभ मिलेगा. यह जमीन मुख्यतः नागपुर, वर्धा, अमरावती, यवतमाल, अकोला और बुलढाणा जिलों में फैली हुई है. अनुमान है कि परियोजना से इस बड़े इलाके में सिंचाई की सुविधा मिलने से पूरे साल में दो फसलें (खरीफ और रबी) अधिक स्थिर रूप से उगाई जा सकेंगी. इससे अब तक ‘मॉनसून पर निर्भर’ खेती को स्थायी जल पहुंच मिलेगा.
2. कृषि उत्पादन में वृद्धि की संभावनाएँ
विशेषज्ञों के अनुसार प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन से किसानों को पारंपरिक एक फसल प्रणाली से हटकर दो से तीन फसलें प्रतिवर्ष उगाने की क्षमता प्राप्त होगी. इससे खेती का उत्पादन और कुल आय में महत्वपूर्ण वृद्धि संभव है. विशेष रूप से विदर्भ में पानी की कमी के कारण कई खेत खरीफ या रबी दोनों बार उजाड़ रहते थे. इस परियोजना के बाद लाभार्थी किसान उच्च मूल्य वाली फसलें भी उगा सकेंगे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूती से सुधर सकती है.
3. सिंचन के अलावा अन्य उपयोग लाभ
परियोजना सिर्फ कृषि पानी नहीं देगा – यह इलाकों में घरेलू उपयोग और औद्योगिक उपयोग के लिए भी पानी उपलब्ध कराएगा, जिससे ग्रामीण जीवन स्तर और स्थानीय उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा. परियोजना का डिज़ाइन ऐसा है कि नहरों और जलभंडारण संरचनाओं के निर्माण से आसपास के इलाकों में महत्वपूर्ण जल भंडारण वृद्धि होगी, जो भूजल स्तर को भी सुदृढ़ करेगा.
4. विशेषज्ञों के विचार और चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रकल्प विदर्भ जैसे सूखा-प्रवण क्षेत्र के लिए जल जीवन रेखा जैसा कदम साबित हो सकता है, जो वर्षों से ‘सिंचन बैक्लॉग’ यानी पिछड़े सिंचन नेटवर्क को दूर करने में मदद करेगा. हालांकि, विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इतने बड़े नेटवर्क में तकनीकी जटिलताएँ, लागत वृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन जैसे मुद्दे चुनौती बन सकते हैं, जिन्हें समाधान के साथ आगे चलना आवश्यक है.
5. परियोजना की अनुमानित पूर्वानुमानित प्रभाव अवधि
अधिकारियों का मानना है कि परियोजना के कार्य पूरा होने पर जल वितरण में सुधार से पहले 3-4 वर्षों में ही प्रारंभिक सिंचन लाभ दिखने लगेगा, जबकि पूर्ण प्रभाव आने में लगभग 5-7 वर्ष का समय लग सकता है. वैनगंगा-नलगंगा नदीजोड परियोजना सिर्फ एक सिंचन योजना नहीं है, बल्कि विदर्भ की कृषि और ग्रामीण विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम मानी जा रही है. यह योजना 3.7 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को सिंचाई सुविधा देगी, जिससे किसानों को बार-बार फसलें उगाने, आय बढ़ाने और जल संकट से मुक्ति पाने का मार्ग मिलेगा. वहीं, घरेलू तथा औद्योगिक उपयोग के लिहाज़ से भी इस परियोजना के लाभ व्यापक होंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना अगर समयबद्ध तरीके से लागू होती है, तो विदर्भ के कृषि परिदृश्य में आधुनिक क्रांति जैसा परिवर्तन लाएगी और यहां के किसानों का जीवन स्तर भी सुदृढ़ करेगी.
* प्रशासनिक प्रक्रिया तेज
परियोजना का विस्तृत अहवाल मे. सिएन्सीस टेक लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया है और फिलहाल प्रशासनिक स्वीकृति की प्रक्रिया में है. वन एवं पर्यावरण मंजूरी के साथ प्रस्ताव केंद्रीय जल आयोग को भी भेजा जा रहा है ताकि प्रक्रिया में विलंब न हो. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अगले एक वर्ष के भीतर परियोजना का प्रत्यक्ष कार्य शुरू होने की संभावना है.
* बदलेगा विदर्भ का कृषि परिदृश्य
सिंचन सुविधाओं के अभाव में सीमित उत्पादन झेल रहे विदर्भ के किसानों के लिए यह परियोजना बड़ी राहत साबित हो सकती है. सरकार का दावा है कि इससे रबी फसल क्षेत्र में वृद्धि होगी, जलसंकट कम होगा और औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी. राजनीतिक और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना समयबद्ध तरीके से पूरी हुई तो विदर्भ के कृषि और आर्थिक विकास में यह ऐतिहासिक कदम साबित होगा.
* परियोजना की प्रमुख विशेषताएं
कुल लागत – लगभग 94,912 करोड़ रुपये
मुख्य नहर की लंबाई – 388.28 किमी (कुल), जिसमें 13 सुरंगें (23.77 किमी) और करीब 222 किमी खुला कालवा शामिल
जल हस्तांतरण – वैनगंगा नदी के गोसीखुर्द प्रकल्प से लगभग 1,804 दलघमी पानी तापी उपखोरे की नलगंगा नदी में छोड़ा जाएगा
सिंचन क्षमता – 4,04,281 हेक्टेयर क्षेत्र
घरेलू उपयोग – 80 दलघमी
औद्योगिक उपयोग – 139 दलघमी
पंपिंग स्टेशन – 8 स्थानों पर पंपयंत्रणा स्थापित होगी
* इन अधिकारियों की भूमिका रही महत्वपूर्ण
जलसंपदा विभाग के मुख्य सचिव दीपक कपूर ने इस प्रकल्प की मंजूरी हेतु नागपुर में समय-समय पर बैठकें आयोजित कर प्रकल्प के काम को आगे बढाया. साथ ही कार्यकारी संचालक राजेश सोनटक्के व मुख्य अभियंता जयंत गवली का भी इस प्रकल्प की मान्यता संबंधी काम में सक्रिय सहभाग रहा, यह विशेष उल्लेखनीय है.
* तीन चरणों में होगा अमल
पहला चरण – गोसीखुर्द बांध से लोअर वर्धा प्रकल्प.
दूसरा चरण – लोअर वर्धा प्रकल्प से काटेपूर्णा प्रकल्प.
तीसरा चरण – काटेपूर्णा प्रकल्प से नलगंगा प्रकल्प.





