हर कोई बना रहा ‘रील व वीडिओ’, जमकर हो रही राजनीतिक पोस्ट
चुनाव आयोग का सोशल मीडिया पर कोई कंट्रोल नहीं

* केवल अखबारों के लिए ही नियम और नियंत्रण क्यों?
अमरावती/दि.5 – चुनाव आते ही राजनीतिक माहौल पूरी तरह डिजिटल रंग में रंग जाता है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब पर हर कोई नेता, समर्थक और तथाकथित ‘इन्फ्लुएंसर’ बनकर रील और वीडियो के माध्यम से खुला प्रचार कर रहा है. किसी में तथ्य हैं, तो किसी में अफवाह, किसी में नफरत तो किसी में खुला प्रलोभन-लेकिन इन सब पर चुनाव आयोग का कोई ठोस और प्रभावी नियंत्रण नजर नहीं आता. विडंबना यह है कि प्रिंट मीडिया यानी अखबारों पर चुनाव आयोग की कड़ी नजर और सख्त नियम लागू हैं, जबकि सोशल मीडिया पर नियम केवल कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं.
आज स्थिति यह है कि बिना नाम, बिना पते के अकाउंट से राजनीतिक वीडियो वायरल हो रहे हैं. आचार संहिता का खुला उल्लंघन हो रहा है. जाति, धर्म और व्यक्ति विशेष पर आपत्तिजनक टिप्पणियां आम हैं. फर्जी सर्वे, झूठे दावे और भ्रामक क्लिप धड़ल्ले से फैलाए जा रहे हैं. इसके बावजूद शायद ही किसी पर त्वरित कार्रवाई होती दिखाई दे.
* अखबारों पर नकेल, सोशल मीडिया पर खुला मैदान!
कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि, लोकतंत्र का चुनावी उत्सव अब नीतियों और मुद्दों का नहीं, बल्कि रील, वीडियो और वायरल क्लिप्स का युद्ध बन चुका है. मोबाइल हाथ में आते ही हर व्यक्ति नेता, प्रचारक और जज बन बैठा है. फर्क बस इतना है कि कोई जवाबदेही नहीं, कोई नियंत्रण नहीं और कोई डर नहीं. चुनाव आयोग की आचार संहिता अखबारों के लिए तो लोहे की जंजीर बन जाती है, लेकिन सोशल मीडिया के सामने वही आयोग लाचार और मौन क्यों नजर आता है? प्रश्न यह उठता है कि जब अखबारों में प्रकाशित एक-एक शब्द के लिए जवाबदेही तय है. पेड न्यूज, विज्ञापन और खबर के बीच फर्क बताना अनिवार्य है. छोटी सी चूक पर नोटिस और कार्रवाई हो जाती है. तो फिर सोशल मीडिया पर चल रहे खुले प्रचार, उकसावे और फेक कंटेंट पर वही सख्ती क्यों नहीं?
* अखबार ही आसान शिकार, डिजिटल अराजकता का खुला खेल
आज सोशल मीडिया पर झूठ को सच बनाकर परोसा जा रहा है, धर्म और जाति के नाम पर जहर फैलाया जा रहा है, विरोधियों की छवि बिगाड़ने के लिए एडिटेड वीडियो चलाए जा रहे हैं, फर्जी अकाउंट्स से संगठित प्रचार किया जा रहा है. यह सब खुलेआम हो रहा है, और चुनाव आयोग केवल निगरानी में है जैसे औपचारिक बयानों तक सीमित है. अखबारों पर हर खबर का हिसाब, हर शब्द की जांच, हर पंक्ति पर नोटिस का खतरा मंडराता रहता है. लेकिन सवाल यह है कि जो माध्यम सबसे अधिक असर डाल रहा है, वही सबसे कम नियंत्रित क्यों है. क्या इसलिए कि अखबार जवाब देते हैं, पत्रकार सामने होते हैं, दफ्तर का पता होता है और सोशल मीडिया इसलिए बच जाता है क्योंकि वहां न चेहरा है, न पता और न ही जिम्मेदारी. ऐसे में इसे चुनावी बराबरी का मजाक कहा जा सकता है. क्योंकि जब एक पक्ष नियमों में जकड़ा हो और दूसरा बिना रोकटोक प्रचार करे, तो इसे निष्पक्ष चुनाव नहीं, बल्कि चुनावी असंतुलन कहा जाएगा. चुनाव आयोग अगर सचमुच निष्पक्ष है, तो उसे बताना होगा कि वायरल झूठ किस कानून के तहत अपराध है.
* चुनावी समानता पर सवाल
चुनाव आयोग का मूल उद्देश्य निष्पक्ष, पारदर्शी और समान चुनाव कराना है. लेकिन जब एक ओर नियंत्रित प्रिंट मीडिया और दूसरी ओर अनियंत्रित डिजिटल प्रचार का दौर चल रहा है. तो यह समानता कैसे संभव है. मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सोशल मीडिया के लिए स्पष्ट गाइडलाइन, पूर्व प्रमाणन व्यवस्था, त्वरित मॉनिटरिंग सेल और सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में चुनाव निष्पक्षता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है. ऐसे में आज जरूरत इस बात की है कि चुनाव आयोग अखबार और सोशल मीडिया के बीच नियमों का संतुलन बनाए. लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा, जब हर माध्यम पर समान नियम और समान जवाबदेही लागू होगी.
* फर्जी अकाउंट्स पर कार्रवाई क्यों नहीं?
आज वोट विचार से नहीं, एल्गोरिद्म से प्रभावित हो रहा है. जिसका वीडियो ज्यादा वायरल, वही ज्यादा सच्चा, यह खतरनाक मानसिकता लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है. अगर समय रहते सोशल मीडिया को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले चुनावों में ईवीएम नहीं, एल्गोरिद्म चुनाव जिताएगा, नीतियां नहीं, नफरत वोट दिलाएगी. अब भी समय है. चुनाव आयोग को चाहिए कि अखबार और डिजिटल मीडिया के लिए एक समान नियम बनाए, सोशल मीडिया पोस्ट का पूर्व और पश्चात प्रमाणन लागू करे, फेक कंटेंट पर तत्काल और सार्वजनिक कार्रवाई करे. वरना इतिहास यही लिखेगा कि लोकतंत्र हारा नहीं था, उसे वायरल कर के हराया गया.





