एमआईएम के पूर्व पार्षद अब्दुल नाजीम को मिली बडी राहत
नागपुर हाईकोर्ट ने अ. नाजीम के खिलाफ दर्ज एफआईआर को किया रद्द

* पूर्व सांसद नवनीत राणा ने एट्रॉसीटी एक्ट के तहत दर्ज करवाई थी शिकायत
* वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव दौरान पूर्व पार्षद अ. नाजीम ने की थी विवादास्पद टिप्पणी
* अचलपुर के सरमसपुरा पुलिस थाने में दर्ज हुआ था मामला, हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती
अमरावती /दि.23 – वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान दर्ज कराए गए एट्रोसिटी प्रकरण में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भाजपा नेत्री व पूर्व सांसद नवनीत राणा द्वारा एमआईएम के पूर्व गटनेता अब्दुल नाजीम के विरुद्ध दर्ज कराए गए आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है. यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण पाटिल ने सुनाया.
बता दें कि, वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अचलपुर निर्वाचन क्षेत्र में आयोजित प्रचार सभा में एमआईएम के तत्कालीन मनपा गुट नेता अब्दुल नाजीम द्वारा कथित रूप से अपशब्द कहे जाने और आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए भाजपा नेत्री व तत्कालीन सांसद नवनीत राणा ने अचलपुर के सरमसपुरा पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में कहा गया था कि चुनावी भाषण के दौरान अब्दुल नाज़ीम ने ऐसी टिप्पणी की, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और जातिसूचक संदर्भ में अपमान किया गया. इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 500 (मानहानि) और 506 (आपराधिक धमकी) के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1)(आर), 3 (1)(यू) और 3 (1)(जेडसी) के तहत अपराध दर्ज किया था.
पश्चात इस एफआईआर को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए अब्दुल नाजीम की ओर से दलील दी गई कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में एट्रोसिटी अधिनियम लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्व स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं होते. यह भी कहा गया कि कथित बयान चुनावी माहौल में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तहत दिया गया था और उसमें अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध का प्रथमदृष्टया गठन नहीं होता. इस मामले में अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजों, शिकायत की भाषा और आरोपों की प्रकृति का परीक्षण किया. न्यायालय ने पाया कि एट्रोसिटी अधिनियम की धाराएं लागू करने के लिए जो विशिष्ट और प्रत्यक्ष तत्व आवश्यक हैं, वे इस प्रकरण में पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हैं. जिसके चलते न्यायमूर्ति प्रविण पाटील ने अपने आदेश में कहा कि प्रकरण की संपूर्ण परिस्थितियों और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए मामला न्यायालय में आगे चलाने का कोई औचित्य नहीं बनता. फलस्वरूप दर्ज अपराध को रद्द किया जाता है.
नागपुर खंडपीठ के इस निर्णय के बाद अमरावती जिले सहित राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है. यह फैसला चुनावी भाषणों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में एट्रोसिटी कानून के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में चुनावी बयानबाजी से जुड़े मामलों में एक संदर्भ बिंदु के रूप में देखा जा सकता है, विशेषकर तब जब एट्रोसिटी अधिनियम की धाराएं लागू की जाती हैं. फिलहाल इस निर्णय के बाद अब्दुल नाज़ीम को बड़ी कानूनी राहत मिली है, जबकि शिकायतकर्ता पक्ष के पास आदेश को उच्च स्तर पर चुनौती देने का विकल्प खुला है.





