नक्सल समस्या हल हो सकती तो मेलघाट की आदिवासियों की समस्या क्यों नहीं
आज जो आंदोलन कर रहे, वे भी सत्ता में रहे हैं

* आदिवासियों की एक पीढी अलग-अलग नेता के आंदोलन में शामिल रही है
* अब नई पीढी को न्याय की आशा
* क्या अगली बार भाजपा करेगी आंदोलन, फिर भी समस्या रहेगी कायम?
चिखलदरा/दि.28 – 25-30 गांवों के आदिवासी मजदूरों की करोडों की मनरेगा मजदूरी बकाया रहने से कांग्रेस द्वारा सांसद बलवंत वानखडे के नेतृत्व में काटकुंभ में किये गये आंदोलन की खबर ताजा रहते पूर्व विधायक बच्चू कडू कल 1 मार्च से ढाई सौ किमी पैदल आंदोलन यात्रा शुरु कर रहे हैं. ऐसे में मेलघाट के तमाम लोगों के जेहन में नाना प्रकार के सवाल और शंकाएं घुमड रही हैं. जिसके अनुसार कांग्रेस ने सराहनीय आंदोलन किया. जिसकी बदौलत आदिवासियों की करोडों की बकाया मजदूरी आनन-फानन में राज्य शासन को उपलब्ध करवानी पडी. मेलघाट की अन्य सडक, पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवा की मूलभूत सुविधाओं के अभाव की घोर समस्या है. ऐसे में यहां के बाशिंदे पूछ रहे हैं कि, गडचिरोली की नक्सली समस्या हल हो सकती है, तो मेलघाट के आदिवासियों की समस्या क्यों नहीं सुलझ सकती?
* बच्चू कडू मैदान में
आदिवासियों के दो दर्जन से अधिक गांवों में आज भी मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है. ऐसे में पूर्व मंत्री बच्चू कडू मैदान में कूद गये हैं. वे कल से पैदल प्रवास कर आदिवासियों की समस्या जानेंगे और उन्हें सुलझाने, न्याय देने का प्रयत्न करेंगे. स्वयं बच्चू कडू ने यह घोषणा कर रखी है. 1 मार्च से शुरु होने वाली उनकी पदयात्रा सप्ताहभर चलेगी.
* टाइगर प्रोजेक्ट ने बनाया बंधक
पहले कांग्रेस और अब बच्चू कडू के कथित आंदोलन के बीच आदिवासियों के प्रतिनिधि सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि, 30-40 गांवों के आदिवासियों को 1972 से मानो बंधक बनाया गया है. जब बाघ प्रकल्प स्थापित हुआ. इसके कारणइन आदिवासियों को सडक, बिजली, पानी की सुविधा भी मयस्सर नहीं है. ऐसे में कई पीढियों से रह रहे आदिवासियों के सवाल है. उन्हें मानव अधिकारों के तहत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित रखा गया है. जंगल में रहकर भी वे अपने पशुओं को चरा नहीं सकते. वनविभाग के नियम उन्हें इस बात से वंचित करते हैं.
* चुनाव का बहिष्कार भी काम न आया
आदिवासियों ने अपनी मांगों के लिए कई बार अनेक दलों और नेताओं के नेतृत्व में आंदोलन किये. चुनाव का बहिष्कार भी करके देखा. यहां सडके नहीं होने से अधिकारी और कर्मचारी भी यहां की पोस्टींग लेने से कतराते है. रास्ता रोको आंदोलन सहित तीन दशकों पहले कुपोशन पर न्यायालयीन लडाई भी लडी गई. मगर कोई लाभ नहीं हुआ. आदिवासियों की एक पूरी पीढी ने इस दौरान कभी कांग्रेस, कभी भाजपा और कभी अन्य किसी दल के नेता के नेतृत्व में आंदोलन किया. एनजीओ भी आंदोलन में शामिल होकर आदिवासी अब बूढे हो गये हैं.
* बच्चू कडू के आंदोलन से उम्मीद
आदिवासियों की नई पीढी को बच्चू कडू के कल से शुरु हो रहे पदयात्रा आंदोलन से आशा की किरण नजर आ रही है. बच्चू कडू गांव-गांव जनता दरबार लगाने वाले हैं. वे तत्काल प्रशासन को फोन कर गांव की समस्या और डिमांड के बारे में जानकारी देंगे. मांग पूरी करने कहेंगे. सामान्य जनजातिय लोगों की इस आंदोलन से उम्मीद दिखाई दे रही है. मेलघाटवासी प्रार्थना कर रहे हैं कि, कडू के आंदोलन को सफलता मिले. क्षेत्र में बच्चू कडू को चाहने वाले काफी है. उनके आंदोलन भी यहां की जनता ने देखे है. मेलघाट के वर्तमान विधायक सत्ता पक्ष में होने से अभी आंदोलन नहीं कर सकते. किंतु भविष्य में उनकी क्या भूमिका रहेगी. या उन्हें भी यहां के आंदोलन, मोर्चे का सौभाग्य मिलेगा. यह कोई नहीं जानता. जिस तरह की जिंदगी मेलघाट के आदिवासी जी रहे हैं. निश्चित ही 21 वीं सदी के विकास और तकनीक के युग में इसे शर्मनाक कहा जा सकता है. शासन को इसकी दखल लेना आवश्यक है. आदिवासी समाज शासन से यह अपेक्षा रखता है.





