राम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि जी का ‘अमरावती मंडल’ को इंटरव्यू
अयोध्या को बनायेंगे विश्व की सांस्कृतिक राजधानी

* संपादक अनिल अग्रवाल से 40 मिनट तक अनेक विषयों पर खुली चर्चा
* अपने लडकपन से लेकर अयोध्या, मथुरा न्यास के पदाधिकारी पद की यात्रा पर बोले आचार्य श्री
* आक्रांताओं की निशानी मिटाना आवश्यक था
* नाशिक कुंभ में हो घोषणापत्र और आचरण के आलंबन का आवाहन भी
अमरावती/दि. 11- अयोध्या श्री राम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी ने कहा कि अयोध्या को विश्व की सांस्कृतिक राजधानी बनाने का उद्देश्य तथा संकल्प है. विश्व में अपेक्षित संस्कृति मूल्यों और आचरण का अयोध्या में परिपूर्ण रूप से अनुपालन का सर्वप्रथम लक्ष्य रखा गया है. वहां के रूपांतरण की प्रक्रिया अभी भी चल रही है. आनेवाले समय में निश्चित ही अयोध्या नगरी विश्व के लिए संस्कृति का प्रतीक बनेगी. मनुष्य को सज्जन बनने और बनाने की प्रेरणा अवध से मिलेगी. आचार्य गोविंद देव गिरि जी ने ‘अमरावती मंडल’ के संपादक अनिल अग्रवाल से विशेष बातचीत की. लगभग 40 मिनट की इस साधक-बाधक चर्चा को मंडल न्यूज के माध्यम से ऑनलाइन एयर किया गया. हजारों लोगों ने इस इंटरव्यू को देखा और सराहा है. इस बातचीत में राजनीति से लेकर सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक सभी विषयो पर आचार्य श्री ने अपनी कीर्ति के अनुरूप अत्यंत स्पष्ट विचार रखे, बात कही. उनके लडकपन से लेकर भागवताचार्य और गीताचार्य बनने की यात्रा की विवेचना इस चर्चा में हुई.
* अयोध्या का तेज बढा
आचार्य श्री ने प्रश्नों के तुरंत समर्पक उत्तर दिए. उसी प्रकार संपादक अनिल अग्रवाल ने भी अनेकानेक विषयों, सामाजिक दायित्व, रीति एवं परंपराओं से लेकर युवा पीढी पर अध्यात्म के प्रभाव संबंधी प्रश्नों के साथ असंख्य लोगों की शंकाओं का निराकरण किया. उन्होंने आत्मविश्वासपूर्वक कहा कि, अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर के निर्माण और प्राणप्रतिष्ठा से न केवल अवध नगरी अपितु संपूर्ण भारतवर्ष का तेज बढा है. भारतीयों का आत्मविश्वास वृद्धिंगत हुआ है. आचार्य श्री ने कहा कि, 20 वर्ष पहले अवध सुनसान लगता था. आज चहल-पहल हम सभी देख रहे हैं. इस आंदोलन से जुडे रहने पर भी इतने बडे परिवर्तन की कल्पना नहीं कर पा रहे थे, ऐसा जोरदार परिवर्तन आया है.
* विश्व में बदली भारतवर्ष की छवि
अनिल अग्रवाल द्वारा प्रश्न किया गया कि, अगले 50-100 वर्षों में अयोध्या राम मंदिर के कारण समस्त विश्व में भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन की क्या छाप रहेगी. गोविंद देव गिरि जी ने बहुत स्पष्ट कहा कि, परिवर्तन निश्चित रुप से हुआ है. विश्व में वे भी पिछले 30 वर्षों से विदेश यात्राएं करते हैं. पहले भारतीयों को अलग दृष्टि से देखा जाता था. अब भारतीयों को देखने का दृष्टिकोण बदल गया है. उसी प्रकार भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर एवं प्राणप्रतिष्ठा से शांति, समाधान, बंधुत्व भाव का प्रचार-प्रसार समस्त विश्व में हो रहा है. आनेवाले दशकों में तो यह परिवर्तन अधिक अधोरेखित होने का दावा भी आचार्य श्री ने किया.
* युवा हुए प्रभावित, जा रहे अयोध्या, प्रयागराज
संपादक अनिल अग्रवाल ने पूछा कि, अयोध्या के राम मंदिर निर्माण का युवा पीढी पर कितना असर हुआ है, युवा पीढी क्या भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति का आचरण करने प्रेरित हुई है? गोविंद देव गिरि जी ने प्रश्न के लिए संपादक महोदय की सराहना की और उत्तर दिया कि, बहुत सकारात्मक परिवर्तन भारत ही नहीं विश्व के अनेक देशों की तरुण पीढी में देखने मिला है. पिछले 24 महीनों में ही थर्टी फर्स्ट से लेकर अनेक अवसरों, जन्म दिन, विवाह की वर्षगांठ आदि अवसरों पर युवा अयोध्या, मथुरा, काशी, प्रयागराज की ओर जा रहे हैं. आध्यात्मिक अनुभूति का चरम अनुभव कर रहे हैं. युवकों की संख्या में उत्थान आया है, जो हमारे तीर्थक्षेत्रों में जा रहे हैं. पहले यही युवा गोवा और ताजमहल देखने जाते थे. आज परिवर्तन हो गया है. आचार्य श्री ने दावा किया कि, हाल ही में संपन्न माघ मास दौरान 40 दिनों के कल्पवास में भी प्रयागराज जानेवालों की संख्या 4 करोड पार कर गई. इनमें भी अधिकांश युवा रहे. इतना ही नहीं तो मौनी अमावस्या पर 2 करोड से अधिक लोगों ने पवित्र डुबकी लगाई.
* अर्थ व्यवस्था में उछाल
भागवताचार्य गोविंद देव गिरि जी ने दावा किया कि, न सिर्फ अयोध्या अपितु समस्त उत्तर प्रदेश और देश की अर्थ व्यवस्था में उछाल आया है. अर्थ व्यवस्था सतत अग्रणी है. लोग धार्मिक पर्यटन को स्वयंभू प्रोत्साहन दे रहे हैं. सांस्कृतिक आयोजनों में बढ-चढकर भाग ले रहे हैं. धर्म पर्यटन ने यूपी की अर्थ व्यवस्था को संभाल लिया है. इतना ही नहीं तो समस्त उत्तर प्रदेश में बंधुभाव बढा है, सामाजिक सद्भाव बढा है. इसी वजह से अर्थकारण भी गति पकड चुका है. देश के अन्य भागों के धर्मस्थलों पर भी भाविकों की भीड सतत बढ रही है. यह सब सकारात्मक संकेत है कि, आनेवाले वर्षों में भारत बढती और गतिमान अर्थव्यवस्था है. दूसरी बात उन्होंने यह भी कही कि, अयोध्या से आक्रांताओं की निशानी मिटाना आवश्यक भी था. इससे राष्ट्र का आत्मविश्वास वृद्धिंगत हुआ है. राष्ट्र का तेज बढा है. विश्व को संस्कृति और धर्म की मूर्ति के रुप में भारत वर्ष स्पष्ट झलक रहा है. राम मंदिर नहीं अपितु राष्ट्र मंदिर का निर्माण और स्थापना हुई है.
* कांची कामकोटि शंकराचार्य के शिष्य
अपने विषय में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में आचार्य श्री ने बताया कि, उत्तर भारत के महात्माओं द्वारा बारंबार कहने, निर्देश करने पर उन्होंने कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य से पहली दीक्षा ग्रहण की. उपरांत भारत माता मंदिर के संस्थापक पद्मभूषण सत्यवृंदानंद गिरि जी से गंगा जी के तट पर अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर आज से ठीक दो दशक पहले 30 अप्रैल 2006 को दीक्षा ली. फिर अध्यात्म के मार्ग पर वे अधिक वेग से चल पडे हैं. इसी कडी में आज अयोध्या और मथुरा कृष्ण जन्मभूमि के कार्य में संलग्न है.
* कैसे करते प्रबंधन
संपादक अनिल अग्रवाल ने पूछा कि, राम जन्मभूमि न्यास के कोषाध्यक्ष के रुप में आपने प्रबंधन कैसे संभाला? तुरंत ही गोविंद देव गिरि जी ने उत्तर दिया कि, द्रव्य का प्रबंधन उनके बस की बात न थी. वस्तुत: अर्थ विषयक बातों का ज्ञान अधिक न था. किंतु गीता परिवार, संत श्री ज्ञानेश्वर गुरुकुल और अन्य संस्थाओं के परिचालन का अनुभव उपयोगी रहा है. वे 4 संस्थाओं के संस्थापक और पदाधिकारी है. अत: वैयक्तिक साधना से समय निकालकर अपने सहयोगियों के सहकार्य से यह प्रबंधन किया जा रहा है. ईश्वर की कृपा है कि, इसमें सफलता मिली है.
* 1500 से अधिक गीता कंठस्थ को प्रमाणपत्र
आचार्य श्री ने बताया कि, गीता परिवार के माध्यम से समस्त भारत वर्ष और पास-पडौस के कुछ देशों में धर्म ग्रंथ गीता वाचन का प्रचार, प्रसार अभियान चल रहा है. अब तक देश-विदेश के 1500 से अधिक व्यक्तियों को गीता के सभी श्लोक कंठस्थ होने का प्रमाणपत्र वे स्वयं प्रदान कर चुके हैं. समस्त भारत में अनेक कस्बो-नगरों में गीता परिवार का कार्य प्रगति पर है. आनेवाले वर्षों में गीता जाननेवाले, कंठस्थ करनेवालों की संख्या हजारों में होने का विश्वास आपने व्यक्त किया और बताया कि, युवा पीढी विशेषकर किशोर वय के बालक-बालिकाएं चाव से गीता पाठ कर रहे हैं. अमरावती में ही पिछले दिनों 10 हजार बच्चों ने समवेत गीता पाठ कर नया कीर्तिमान गढा.
* भागवत प्रवचन प्रारंभ का रोचक दृष्टांत
अपने किशोर वय की स्मृतियां भी अपनी प्रेरक जीवनयात्रा के विषय में बतलाते हुए गोविंद देव गिरि जी ने साझा की. आपने बताया कि, संपूर्ण परिवार में वैदिक परंपरा रही. उनके पिता वाचक और साधक थे. 108 वेद-पारायण कर चुके थे. अत: छोटी आयु से ही झुकाव था. अनायास मिले धर्मपूर्ण वातावरण में रुचि बढती गई. इसलिए 15 वर्ष की आयु में गीता पाठ करने लगे. 17 वर्ष की आयु में पिता बीमार पड जाने से कुल परंपरा निभाने उन्होंने 7 दिनों की भागवत विवेचना की. यह विवेचना पिता को भी पसंद आई और उन्होंने ही आगे भागवत कथा करने के लिए प्रेरित और निर्देशित करने की जानकारी पूज्य आचार्य श्री ने दी. * 60 वर्षों से सनातन धर्म की सेवा
आचार्य श्री ने बताया कि, तब से अनवरत श्रीमद् भागवत कथा और धर्म ग्रंथों का विवेचन, वेद पाठ निरंतर चल रहा है. व्यक्तिगत साधना भी करने वे प्रयत्नशील रहते है. सनातन धर्म की समर्पित सेवा में 60 वर्षों से जुडे है और पिछले अनेक दशकों से गीता परिवार की स्थापना कर समस्त विश्व में गीता के प्रति जन-जन का आदर और स्नेह बढाने प्रयासरत हैं. उन्होंने यह भी बताया कि, उनके परिवार में 150 वर्षों की वेद पाठ और वैदिक कार्यों की परंपरा रही है. कर्मकांड के लिए भी अहिल्या नगर में धर्मप्रेमी उनके पिता और पितामह का परामर्श लेते. ऐसे में अध्यात्म की राह पर आगे बढते चले गए और भगवत कृपा से जनमान्यता भी बढती गई. कीर्ति और यश देवकृपा से मिलने की बात विनम्रतापूर्वक गोविंद देव गिरि जी ने कही.
* कुंभ के प्रति अद्वितीय आकर्षण
आचार्य श्री ने दावा किया कि, भारत की सनातन संस्कृति के प्रति देश-विदेश में आदर का द़ृष्टिकोण बढा है. इसीलिए प्रयागराज महाकुंभ में 60 करोड लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई. निश्चित ही इसमें लाखों की संख्या में विदेशी भी सहभागी रहे. उन्होंने बताया कि, जो नास्तिक थे और भारी भीड के कारण स्नान नहीं कर पाए थे, ऐसे लोगों ने भी उन्हें आकर बतलाया कि, वे कालांतर में जाकर आस्था की डुबकी लगाकर आए. इस प्रकार का आकर्षण, प्रेरणा प्रयागराज कुंभ बना.
* नाशिक में नहीं काटा गया कोई पेड
नाशिक के अगले वर्ष के कुंभ संबंधी तैयारियों हेतु पेड-पौधे काटने के आरोप को गोविंद देव गिरि जी ने तुरंत अस्वीकार कर कहा कि, उनकी जानकारी के अनुसार एक भी भारतीय और पुराना पेड काटा नहीं गया है. उसी प्रकार नाशिक कुंभ को लेकर वे चाहते हैं कि, घोषणापत्र न सिर्फ जारी हो, अपितु उसका सभी में वितरण और स्वयं आचरण एवं अवलंब करने की बात भी उन्होंने कही.
* प्रधान सेवक के पारणा के समय अनुभव किया मातृत्वभाव
संपादक अनिल अग्रवाल ने दो वर्ष पूर्व के उस प्रसंग के समय आचार्य श्री के भाव संबंधी प्रश्न पूछते ही गोविंद देव गिरि जी भावनाप्रधान हो गए. उन्होंने भगवान श्रीराम की प्राणप्रतिष्ठा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 11 दिनों के उपवास के पारणा समय की अपनी अनुभूति को भावुक करनेवाला एवं जीवन का सबसे बिरला प्रसंग बतलाया. आपने कहा कि, प्राणप्रतिष्ठा से पूर्व 7 दिनों के उपवास का अनुरोध प्रधान सेवक अर्थात देश के जनप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्होंने किया था. गोविंद देव गिरि जी के निर्देश पर ही प्रधान सेवक उपवास के लिए न केवल तुरंत तैयार हुए. अपितु इस अवधि में बताए गए सभी नियमों का तीन गुना पालन प्रधान सेवक अर्थात मोदी जी ने किया था. अपनी स्मृति को उद्धृत करते हुए स्वामी जी ने बताया कि, 11 दिनों के उपवास पश्चात पारणा की बेला आई तो मोदी जी ने ही उनसे कहा था कि, आप ही सेवन करवा दीजिए. तब जल और दही देते हुए गोविंद देव गिरि जी भी भावना से भर गए थे. उनके हस्त मोदी जी को पारणा करवाते समय कांप रहे थे. यह अत्यंत भावनाविवश करनेवाला और जीवन का अद्भूत क्षण होने की बात आचार्य श्री ने कही और यह भी बताया कि, उस समय उनके तन-मन में मातृत्व भाव जाग गया था. उस ममत्व को वर्णित करना उनके लिए भी संभव नहीं.
* अमरावती छोटी आलंदी, अत: विशेष लगाव
अमरावती की बारंबार यात्रा के विषय में उनसे प्रश्न किया गया, तो उन्होंने कहा कि, प्रज्ञाचक्षु संत गुलाबराव महाराज को वे संत ज्ञानेश्वर जी समान गुरुवर्य मानते हैं. महाराज जी रचित धर्म ग्रंथों का वाचन किया है. अद्भूत निधि वह है. महाराज जी अमरावती को छोटी आलंदी कहते थे. भगवती अंबा का पुण्यस्थान है ही. अत: अंबानगरी के प्रति उनका सदैव लगाव, आसक्ति रही है. यहां की संस्थाएं भी राष्ट्र निर्माण में समुचित योगदान कर रही हैं. अंबानगरी वासियों का आग्रह रहता है. इसलिए वे अमरावती बारंबार आते हैं और आना भी चाहते हैं.
* दूरितांचे तिमिर जावो…
गोविंद देव गिरि जी ने कहा कि, संत ज्ञानेश्वर रचित पसायनदान में ही भारत का समस्त विश्व के लिए संदेश निहित है. भारतवर्ष की भावना भी इसमें निहित है. अत: रामराज्य की हमारी कल्पना सभी के लिए समान भाव की और नियमों की रही हैं. किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए ऐसा वातावरण का निर्माण ही रामराज्य की कल्पना साकार करने की ओर कदमताल होगा. समान नागरी संहिता के अनुपालन की आवश्यकता रामराज्य के लिए अभिप्रेरित है.





