जीतेजी मरना सीखों यह जीवन जीने की कला
डॉ. सचिन परब का प्रतिपादन

* नारी तू ‘विश्व कल्याणी’ विषय पर द्वितीय व्याख्यान
* प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय का आयोजन
अमरावती /दि.4 – समाज के दो घटक स्त्री एवं पुरुष है. इनमें महिलाएं त्याग की मूर्ति होती है. वह अपने जीवन को समर्पित भाव के साथ परिवार, ऑफीस व समाज के लिए खुद के अस्तित्व को त्यागने हमेशा ही तैयार रहती है. लेकिन त्याग से अधिक हमें जीतेजी मरना सीखना चाहिए, तभी हम जीवन जीने की कला को सीख सकते है, ऐसा प्रतिपादन मुंबई के प्रेरणादायी वक्ता, लाइफ कोच, कार्पोरेट ट्रेनर, राजयोग ध्यान मार्गदर्शक डॉ. सचिन परब ने किया.
स्थानीय होटल महफिल इन के हॉल में सोमवार से चार दिवसीय प्रेरणादायी व्याख्यान का आयोजन प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किया गया है. जिसमें दूसरे दिन मंगलवार की शाम 6.30 बजे ‘नारी तू विश्व कल्याणी’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में वे बोल रहे थे. इस समय पार्षद सुरेखा लुंगारे, गुजराती महिला मंडल अध्यक्षा डॉ. जागृति शाह, लोहाणा महापरिषद विदर्भ महिला विभाग अध्यक्षा शीलाबेन पोपट, महावितरण के मुख्य अभियंता अशोक सालुंखे, के.एल. कॉलेज के प्राचार्य विजयकुमार भांगडिया, प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय की जिला संचालिका राजयोगिनी सीता दीदी प्रमुख रुप से उपस्थित थे.
डॉ. सचिन परब ने आगे कहा कि, विश्व में कई देश है. लेकिन भारत ऐसा एकमात्र देश है, जिसे मां कहा जाता है. जिस देश में नारी की पूजा होती है, उस देश में हमेशा ही देवताओं का वास होता है. भारत में पुरुष प्रधान संस्कृति को अधिक महत्व दिया गया है. जिसके कारण हम घर में बेटों से अधिक बेटीयों पर ध्यान देने की कोशिश करते है. लेकिन संस्कार दोनों पर समान रुप से होने चाहिए. बच्चों के लिए माता प्रथम गुरु होती, जो अपने जीवन को समर्पित भाव के साथ सभी को समर्पित रखते हुए दिन के 24 घंटे काम करती है. लेकिन उसे किसी भी प्रकार का मेहनताना नहीं दिया जाता.
महिलाओं को ‘घरेत्री’ भी कहा जाता है. इसलिए पहले महिलाओं का स्वास्थ्य हमेशा फीट रहना जरुरी है, तभी वह घर परिवार का ध्यान रख सकती है. ‘हर दिल जो प्यार करेगा, वही गाना गाएगा…’ इस गीत के साथ उन्होंने आगे कहा कि, हमें अपने मन में छिपे तनाव को दूर करने के लिए हमेशा गाना गाते रहना चाहिए. जब हम खाना बनाते है, तो हमें अपने भाव को ध्यान में रखना चाहिए. क्योंकि जो भाव के साथ हम भोजन पकाते है, वह हमारे अन्न में उतरते है. इसलिए लोग कहते है कि, ‘जैसा अन्न, वैसा मन’ इस भाव के साथ हम भोजन पकाते है. उस भाव के साथ उसे ग्रहण करनेवाला स्वीकार करता है. इसलिए भोजन पकाते समय भगवान को याद करना चाहिए. तभी उसमें भक्ति का भाव आएगा, जो और भी मीठा होगा.
महिलाएं घर को स्वर्ग बना सकती है. केवल हमें समय के साथ खुद को बदलते हुए कुछ बातों और संस्कृती को बरकरार रखने की कोशिश करनी चाहिए. जिस प्रकार आज भी दक्षिण भारत में अपनी संस्कृती का जतन कर वे आधुनिकता की ओर मार्गक्रमण कर रहे है, हमें भी अपने बच्चों में वह भाव लाने की आवश्यकता है. अन्यथा जिस प्रकार देश में बच्चों को अब स्कूल में छडी से मारना अपराध माना जाता है. वैसे कई कानूनों को बनाने की आवश्यकता पडेगी. इसके पीछे का कारण एक ही था कि, आज के बच्चों में पहले की तरह सहनशीलता नहीं रही है. जब किसी बच्चे को स्कूल में छडी से गुरुजन मारते है, तो उन्हें यह अपमान लगता है. जिसके कारण उनके मन में एक अलग ही भाव तैयार होकर समाज को देखने का, गुरु को देखने का नजरिया बदल जाता है.
इसलिए शासन को यह कानून पारित करना पडा है. ताकि उनके मन में किसी प्रकार की विपरित भावना निर्माण न हो. लेकिन हम अपने बच्चों को और अधिक असहनशील बनाने की कोशिश कर रहे है. बच्चों में अच्छे संस्कार नहीं, बल्कि उन्हें हिंसक बना रहे है. हमें यह स्वरुप बदलना है. जिस प्रकार सिंधुताई सपकाल ने बेसहारा बच्चों की मां बनकर अपने बच्चे के साथ उनका भी लालन-पालन किया, उसी प्रकार विश्व में महिलाएं परिवर्तन ला सकती है. वर्तमान में प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय यह एकमात्र संस्था है, जहां महिलाओं ने क्रांति लाकर इस विश्व में बदलाव लाने का प्रयास किया है. इसलिए हम कहते है कि, ‘नारी तू विश्व कल्याणी’ है.
प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय की जिला संचालिका राजयोगिनी सीता दीदी ने अपने संबोधन में इस कार्यक्रम का महत्व व प्रेरणादायी व्याख्यान की आवश्यकता पर बल दिया. कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन, मान्यवरों का स्वागत तथा विविध उपस्थित मान्यवरों के हाथों किताब का विमोचन कर की गई. इससे पूर्व सभी को प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय से संबंधित वीडियो दिखाया गया. इस अवसर पर बडी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति रही. कार्यक्रम में उपस्थित मान्यवरों ने भी अपने समयोचित विचार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सराहना की.





