अमरावतीमहाराष्ट्र

स्कूल ऑफ स्कॉलर्स में फीस वसूली का चौंकाने वाला मामला

फीस नहीं भरने से छात्र को नहीं दिया हॉल टिकट

* सहपाठी की सहायता के लिए छात्र सामने आए
* दो समाजसेवी बने मसीहा
* 40 हजार रुपए भुगतान के बाद दिया बोर्ड परीक्षा का हॉल टिकट
धामनगांव रेलवे/दि.18-एक ओर, सख्त कानून है कि किसी भी छात्र को शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और इसका पालन करना सभी सरकारी गैर-सरकारी और निजी संस्थानों की जिम्मेदारी है, लेकिन स्कूल ऑफ स्कॉलर्स के एक छात्र को स्कूल की फीस का भुगतान न करने के कारण बोर्ड परीक्षा के लिए हॉल टिकट से वंचित कर दिया गया. आखिरकार, धामनगांव रेलवे के दो समाजसेवियों ने 40 हजार रुपये की स्कूल फीस का भुगतान करने के बाद ही छात्र को हॉल टिकट दिया गया. इस मामले पर जब मुख्याध्यापिका से पूछा गया तो उन्होंने मामला खत्म हो जाने के बाद अब मीडिया की जांच क्यों हो रही है? ऐसा उल्टा सवाल स्कूल की मुख्याध्यापिका ने किया.
धामनगांव रेलवे स्कूल ऑफ स्कॉलर्स मेघे ग्रुप वह एक शैक्षणिक संस्था है जो गरीब छात्रों को गोद लेती है और उनकी शिक्षा के साथ-साथ उनके जीवन स्तर में सुधार करती है. इस स्कूल में परिसर के सैकडों छात्र पढ रहे हैं. 10 वीं सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा 15 फरवरी से शुरु हुई है. सभी बच्चों को हॉल टिकट दिए गए. लेकिन चांदूर रेल्वे निवासी अनुसूचित जाति के एक छात्र ने आर्थिक स्थित कमजोर होने से स्कूल फीस नहीं भरने से स्कूल प्रशासन ने उसका हॉल टिकट रोक दिया था. अपना सहपाठी अब परीक्षा नहीं दे पाएंगा, यह देखते हुए सभी छात्रों ने स्कूल प्रशासन से उस छात्र के लिए समय सीमा बढाने का अनुरोध किया, लेकिन स्कूल प्रशासन ने शुल्क का भुगतान करने के बाद ही हॉल टिकट प्राप्त करने की भूमिका निभाई, अंततः दो छात्रों ने अपने पिता को स्कूल में बुलाया. इस दौरान लगभग आधे से एक घंटे तक चली बातचीत में स्कूल प्रशासन की सख्त भूमिका के सामने किसी की एक नहीं चली, आखिरकार चांदूर रेल्वे के छात्र को परीक्षा के लिए हॉल टिकट तभी दिया गया जब दोनों कार्यकर्ताओं ने स्कूल की फीस का भुगतान किया.
भले ही कानून हो कि किसी को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, फिर भी क्या प्रतिष्ठित स्कूल प्रशासन की फीस वसूली के इस तरीके पर कोई आपत्ति लेगा? यह एक वास्तविक प्रश्न है और इस संदर्भ और भी जांच करने पर कई अभिभावकों ने कहा है कि स्कूल ऑफ स्कॉलर्स में हर साल ऐसा मामला सामने आता है.

शैक्षणिक नुकसान से बचाने फीस का भुगतान
यह घटना होने की सूचना मिलने के बाद मैं और मेरा दोस्त गोपाल भूत स्कूल ऑफ स्कॉलर्स पहुंचे और स्कूल की मुख्याध्यापिका से छात्र को हॉल टिकट देने के लिए अनुरोध किया. कहने के बाद भी जब यह हॉल टिकट नहीं दिया गया तो आखिरकार मैंने 20 हजार रुपये का भुगतान किया और हेल्पिंग हैंड्स संस्था के कुछ सदस्यों ने मदद के लिए हाथ बढाया और छात्र की पूरी स्कूल फीस का भुगतान किया और परीक्षा के लिए हॉल टिकट प्राप्त किया. सामाजिक कार्यकर्ता संदीप निकम ने कहा कि मैं उस बच्चे के शैक्षणिक नुकसान को रोकने के लिए हमेशा तैयार हूं और स्कूल प्रशासन को भी छात्र के शैक्षणिक नुकसान पर विचार करना चाहिए.

इस तरह का मामला हुआ ही नहीं
दसवीं कक्षा की परीक्षा के लिए सभी छात्रों को हॉल टिकट देना शुरू था. 14 फरवरी को सभी छात्रों को बिना शर्त हॉल टिकट दिए गए और हमने उस छात्र को चांदूर रेलवे के उस छात्र को भी हमने हॉल टिकट दिया. वह परीक्षा में प्रविष्ठ भी हुआ है. स्कूल ऑफ स्कॉलर्स की फीस वसुली का पैटर्न तय है. इसलिए मैनेजमेंट के मुताबिक छात्रों से फीस वसूल की जाती है. और जब मामला खत्म हो गया तो अब ये मीडिया पूछताछ क्यों? ऐसा उलट सवाल स्कूल ऑफ स्कॉलर्स की मुख्याध्यापिका प्रचिति धर्माधिकारी ने किया.

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