मराठा समाज के दो चेहरों से बदलेंगे सामाजिक समीकरण
सीएम शिंदे व अजित दादा की वजह से धार्मिक व राजनीतिक समीकरणों पर पडेगा परिणाम

मुंबई/दि.4 – महाराष्ट्र में मराठा समाज की जनसंख्या करीब 30 फीसद के आसपास है और महाराष्ट्र राज्य का गठन होने के समय से ही राज्य की राजनीति में मराठा समाज का जबर्दस्त प्रभाव रहता आया है. महाराष्ट्र में मराठा समाज के बिना राजनीति करना बेहद कठीन माना जाता है. विशेष तौर पर पश्चिम महाराष्ट्र में तो मराठा समाज के बिना राजनीति करना असंभव है. ऐसे में यद्यपि विगत कुछ वर्षों के दौरान देश में भाजपा ने सबसे बडा राजनीतिक दल बनने में सफलता प्राप्त की है, लेकिन महाराष्ट्र में एक प्रभावशाली व आक्रामक मराठा नेता का अभाव रहने के चलते पूरे महाराष्ट्र राज्य पर अपनी मजबूत पकड बनाना भाजपा के लिए अब तक संभव नहीं हो पाया है. इस बात का पूरा एहसास भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी है. अब तक भाजपा की प्रतिमा ‘शेठजी व भटजी’ वाली पार्टी के तौर पर रही. जिसके चलते पूरे राज्य में अपना प्रभाव रखने वाले और प्रशासकीय पकड भी रखने वाले मराठा नेता की खोज भाजपा द्बारा लगातार की जा रही थी. ऐसे में एकनाथ शिंदे के तौर पर भाजपा ने पहला मराठा नेता हासिल किया. वहीं अब अजित पवार के तौर पर भाजपा ने मराठा समाज के बेहद प्रभावशाली नेता को साथ लिया है. इन दो चेहरोें की वजह से महाराष्ट्र में धर्म व जाति आधारित राजनीति पर निश्चित तौर पर प्रभाव पडेगा और इन दो मराठा नेताओं की वजह से राज्य में सामाजिक समीकरण भी बदलेगे.
उल्लेखनीय है कि, एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में रहने के दौरान कभी भी अपनी पहचान मराठा नेता के तौर पर बनाने का प्रयास नहीं किया. वहीं उनका कार्यक्षेत्र मुंबई व ठाणे तक ही सीमित रहा. ऐसे में एकनाथ शिंदे को साथ लेने के बाद भाजपा को पश्चिम महाराष्ट्र व मराठवाडा में सहायता कर सकने वाले मराठा नेता की जरुरत महसूस हो रही थी और इस जरुरत को भाजपा ने अजित पवार को साधते हुए पूरा कर लिया है. इसके साथ ही राकांपा नेता छगन भुजबल को ओबीसी समाज का बडा नेता माना जाता है. जो इस समय अजित पवार के साथ है और शिंदे मंत्रिमंडल मेें कैबिनेट मंत्री भी बन गए है. इसके अलावा शिवसेना के अब्दूल सत्ता के तौर पर एक मुस्लिम चेहरा पहले से शिंदे मंत्रिमंडल में है. वहीं अब राकांपा के हसन मुश्रीफ के तौर पर दूसरे मुस्लिम व्यक्ति को भी मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया है. यदि यही स्थिति कायम रहती है और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्बारा इसी तरह से फूंक-फूंक कर कदम उठाए जाते है, तो आगामी एक साल के दौरान राज्य में सामाजिक समीकरण काफी बडे पैमाने पर बदल जाएंगे. साथ ही धार्मिक व जातिय समीकरणों को साधते हुए भाजपा द्बारा वोट बैंक को साधने का प्रयास किया जाएगा.