मराठी विद्यापीठ के कारण रिध्दपुर की नई पहचान
4 कोर्सेस शुरू, 2 पदवी और 2 स्नातकोत्तर अभ्यासक्रम

* गांव में मराठी जानकारों का जमावडा
अमरावती/ दि. 6-देश के पहले मराठी भाषा विद्यापीठ के कारण मोर्शी तहसील के रिध्दपुर को नई पहचान प्राप्त हुई है. ठीक एक वर्ष पूर्व रिध्दपुर में मराठी विश्वविद्यालय स्थापित किया गया. अब यहां चार कोर्सेस शुरू किए गये हैं. जिसमें दो स्नातक और दो स्नातकोत्तर कोर्स रहने की जानकारी विद्यापीठ अधिकारियों ने दी.
चारों कोर्सेस की शुरू है एक्जाम
स्नातक कोर्स में भाषा और लिपि शास्त्र तथा प्रादर्शिक कला (बीपीए नाटक) यह दो विषय शामिल है. स्नातकोत्तर अभ्यासक्रम में मराठी अभिजात भाषा और मानस शास्त्र यह दो विषय हैं. चारों अभ्यासक्रम के पहले सत्र की परीक्षा शुरू है. अब यहां मराठी साहित्यकारों का सतत आना जाना और जमावडा रहता है. मराठी रचनाकार लगातार यहां एकत्र होते हैं.
महानुभाव की काशी
रिध्दपुर को महानुभाव पंथ की काशी कहा जाता है. मराठी का पहला हस्तलिखित आद्य ग्रंथ ‘लीला चरित्र ’ यहां लिखा गया था. इसके अलावा स्मृति स्थल, गोविंद प्रभु चरित्र, दृष्टांत पाठ, सिध्दांत सूत्र पाठ, मूर्ति प्रकार जैसे ग्रंथ भी यहां रचे गये. मराठी सरिता का यह उदगम स्थल माना जाता है, ऐसी पावन भूमि में तीन वर्ष पूर्व वर्धा की अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गांधी हिन्दी विद्यापीठ ने भी अपना अध्यासन प्रारंभ किया था.
आश्रम प्रमुख मोहन महाराज का आग्रह
रिध्दपुर की मिट्टी श्री गोविंद प्रभु, श्री चक्रधर स्वामी, श्री नागदेवाचार्य इन महापुरूषों के निवास से पुनीत हुई है. माहिम भट्ट, केशीराज व्यास, महादाईसा जैसी प्रज्ञावंत प्रतिभाएं इसी मिट्टी में पली बढी समता का विचार 13 वीं सदी में ही गोविंद प्रभु ने रखा था. अत: कंवर नगर स्थित महानुभाव पंथियों के आश्रम के प्रमुख मोहन महाराज अमृते कारंजेकर ने राज्य तथा केन्द्र शासन से यहां मराठी भाषा विद्यापीठ स्थापित करने का अनुरोध किया था. सरकार ने उसे मान्य कर देश का पहला मराठी भाषा विश्वविद्यालय यहां स्थापित किया.
रिध्दपुर एक नजर में
– जनसंख्या 10 हजार
– साक्षरता 80 प्रतिशत
– जिला मुख्यालय से दूरी – 35 किमी
– कनेक्टिविटी की बात करें तो एसटी बसेस और निजी वाहनों से पहुंच सकते हैं
विशेषता
चक्रधर स्वामी ने हिन्दू धर्म की अस्पृश्यता, स्त्री दास्य, मांसाहार मान्य न था. आचार्य धर्म की आत्मा होकर बैठे सिध्दांतों को न मानने के कारण चक्रधर स्वामी ने यहां महानुभाव पंथ की स्थापना की थी.





