महिला पार्षदों के कामकाज में पुरुषों के हस्तक्षेप पर लगेगी लगाम

सरकार का बडा निर्णय, स्थानीय स्वायत्त निकायों में नहीं चलेगा ‘पतिराज’

* हस्तक्षेप साबित होने पर महिला पार्षद की सदस्यता हो सकती है खारिज
अमरावती /दि.24- स्थानीय स्वायत्त निकायों में महिला प्रतिनिधियों के कामकाज में पुरुषों के हस्तक्षेप पर सख्त रुख अपनाते हुए सरकार ने बड़ा निर्णय लिया है. अब ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगर परिषद, जिला परिषद व पंचायत समितियों सहित महानगरपालिका में चुनी गई महिला पार्षदों के कार्यों में उनके पति या परिवार के किसी पुरुष सदस्य का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा. सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि किसी मामले में यह सिद्ध होता है कि महिला पार्षद के स्थान पर उसका पति या कोई अन्य पुरुष सदस्य निर्णय ले रहा है या प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप कर रहा है, तो संबंधित महिला पार्षद की सदस्यता तक खारिज की जा सकती है. इस निर्णय का उद्देश्य महिला प्रतिनिधियों को वास्तविक अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान सुनिश्चित करना है, ताकि वे बिना दबाव या प्रभाव के अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें.
बता दें कि, लंबे समय से स्थानीय निकायों में ‘पतिराज’ की शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां निर्वाचित महिला प्रतिनिधि केवल नाममात्र की भूमिका में रहती हैं और वास्तविक नियंत्रण उनके पति या परिवारजन करते हैं. सरकार के इस कदम को महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि शिकायत मिलने पर जांच कर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना बनी रहे. ऐसे में कहा जा सकता है कि, महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने की दिशा में सरकार ने स्थानीय स्वायत्त निकायों में एक ऐतिहासिक और सख्त निर्णय लिया है. यह फैसला वर्षों से चली आ रही उस कुप्रथा के विरुद्ध है, जिसे आम बोलचाल में ‘पतिराज’ कहा जाता है, जहां महिलाओं हेतु आरक्षित सीट से निर्वाचित महिला प्रतिनिधि केवल नाममात्र की भूमिका निभाती हैं, जबकि वास्तविक सत्ता उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य अपने हाथ में रखते हैं. यह स्थिति न केवल संवैधानिक भावना के विरुद्ध है, बल्कि महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य को भी कमजोर करती रही है.
* लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है ‘पतिराज’
ज्ञात रहे कि, संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधनों के तहत महिलाओं को स्थानीय शासन में आरक्षण देकर उन्हें निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन जमीनी स्तर पर कई स्थानों पर यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी. अनेक मामलों में महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति बैठकें संचालित करते, दस्तावेजों पर निर्णय लेते और योजनाओं का संचालन करते पाए गए. इससे न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक बनता रहा, बल्कि महिला नेतृत्व की वैधानिक पहचान भी धूमिल होती रही.
* ‘पतिराज’ के खिलाफ सरकार का सख्त संदेश
नए दिशा-निर्देशों के तहत अब यह स्पष्ट कर दिया गया है कि महिला प्रतिनिधि ही अपने पद की एकमात्र वैध अधिकारी होंगी. किसी भी प्रकार की परोक्ष या प्रत्यक्ष दखलअंदाजी-चाहे वह बैठकों में भागीदारी हो, प्रशासनिक निर्देश देना हो या विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में हस्तक्षेप-अवैध मानी जाएगी. जांच में दोष सिद्ध होने पर महिला पार्षद की सदस्यता रद्द करने के साथ-साथ संबंधित पुरुष व्यक्ति पर भी कार्रवाई की जा सकती है. सरकार ने प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि शिकायत मिलने पर त्वरित जांच की जाए और निष्पक्ष रूप से कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि यह निर्णय केवल कागजों तक सीमित न रह जाए.
* महिला सशक्तिकरण की दिशा में निर्णायक कदम, चुनौतियां भी कम नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय महिला प्रतिनिधियों को वास्तविक नेतृत्व और स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति देगा. इससे न केवल महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय शासन की गुणवत्ता और पारदर्शिता में भी सुधार होगा. महिला नेतृत्व को औपचारिक नहीं, बल्कि वास्तविक और प्रभावी बनाने की दिशा में यह एक बड़ा संरचनात्मक सुधार माना जा रहा है. हालांकि, इस निर्णय को लागू करना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा. ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पारिवारिक दबाव, सामाजिक परंपराएं और सत्ता संरचना के पुराने ढांचे महिला प्रतिनिधियों की स्वतंत्र भूमिका में बाधा बन सकते हैं. ऐसे में केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और महिला प्रतिनिधियों के लिए कानूनी सहायता तंत्र भी आवश्यक होंगे. सरकार का यह निर्णय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने और महिला प्रतिनिधित्व को वास्तविक अर्थों में प्रभावी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है. यदि इसे सख्ती और संवेदनशीलता दोनों के साथ लागू किया गया, तो यह स्थानीय स्वायत्त निकायों में सत्ता संतुलन को बदल सकता है और महिला सशक्तिकरण को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है.

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