अब अमरावती में संजय खोडके पर ही राकांपा का पूरा दारोमदार

मनपा की सत्ता में शामिल होने अथवा नहीं होने का खुद ही लेना होगा निर्णय

* पार्टी प्रमुख व डेप्युटी सीएम अजीत पवार के आकस्मिक निधन से बदली राजनीतिक स्थिति
* अब पार्टी में कोई ‘पक्षश्रेष्ठी’ नहीं, चार अलग-अलग नेता दे रहे अलग-अलग निर्णय
अमरावती/दि.31 – आगामी 6 फरवरी को अमरावती महानगर पालिका के नवनिर्वाचित पार्षदों की पहली विशेष सभा होने के साथ ही अमरावती के नए महापौर व उपमहापौर पद के लिए चुनाव होने जा रहा है. इस हेतु 25 पार्षदों वाली भाजपा एवं 15 सदस्यों वाली युवा स्वाभिमान पार्टी के बीच गठबंधन होना पूरी तरह से तय हो चुका है. साथ ही इस गठबंधन में शिंदे गुट वाली शिवसेना के 3 पार्षदों का भी शामिल होना लगभग तय है. लेकिन अजीत पवार गुट वाली राकांपा का स्थानीय स्तर पर नेतृत्व करनेवाले पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष व विधायक संजय खोडके ने अब तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है. बल्कि संजय खोडके ने बीते दिनों यहां तक साफ तौर पर कह दिया था कि, जिस गठबंधन में विधायक रवि राणा के नेतृत्ववाली युवा स्वाभिमान पार्टी शामिल रहेंगे, ऐसे किसी गठबंधन में वे (खोडके) शामिल नहीं होनेवाले. साथ ही साथ खोडके ने यह कहते हुए गठबंधन की संभावना खुली रखी थी कि, इस बारे में जरुरत पडने पर ‘पक्षश्रेष्ठी’ यानि पार्टी प्रमुख व डेप्युटी सीएम अजीत पवार की ओर से मिलनेवाले निर्देशों का पालन किया जाएगा. लेकिन अब चूंकि डेप्युटी सीएम अजीत पवार का अकस्मात ही भीषण हवाई हादसे में निधन हो गया है. जिसके चलते राज्य सहित अमरावती मनपा के स्तर पर अजीत पवार गुट वाली राकांपा के लिए राजनीतिक स्थिति पूरी तरह से बदल गई है और अब अमरावती महानगर पालिका में किसी पार्टी के साथ गठबंधन करने अथवा नहीं करने तथा मनपा की सत्ता में शामिल होने अथवा विपक्ष में रहने से संबंधित निर्णय को लेकर पूरा दारोमदार विधायक संजय खोडके पर आ गया है.
यहां यह ध्यान देने योग्य बात हैं कि, अजीत पवार गुट वाली राकांपा में खुद दिवंगत अजीत पवार ही एकमात्र सबसे ‘हैवीवेट’ चेहरा थे. जिनके नाम और चेहरे के बलबूते पार्टी की पूरे राज्य में जबरदस्त तूती बोला करती थी और पार्टी की राजनीति व रणनीति का पूरा भार दिवंगत अजीत पवार अपने अकेले के कंधे पर ही उठाया करते थे. जिनकी राजनीतिक व रणनीतिक सूझबूझ का हर कोई जबरदस्त कायल भी हुआ करता था. ऐसे में अजीत पवार का अकस्मात ही निधन हो जाने के चलते अब उनके नेतृत्ववाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में काफी हद तक अफरा-तफरी तथा संभ्रम वाला माहौल है. साथ ही साथ पार्टी से जुडा हर व्यक्ति सदमें में रहने के साथ-साथ अपने एवं पार्टी के राजनीतिक भविष्य को लेकर संभ्रमित है. जिससे अमरावती शहर व जिले से वास्ता रखनेवाले राकांपाइ भी अछूते नहीं है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि, इससे पहले पार्टी में पक्षश्रेष्ठी के तौर पर खुद अजीत पवार का आदेश ही सर्वोपरी हुआ करता था. परंतु अजीत पवार का देहावसान होते ही पार्टी के कई नेताओं में खुद को वरिष्ठ साबित करने की प्रतिस्पर्धा शुरु हो गई है और ऐसे नेताओं द्वारा लगभग खुद को ‘पक्षश्रेष्ठी’ मानते हुए दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे है. ऐसे में अलग-अलग नेताओं द्वारा अलग-अलग निर्देश दिए जाने और अलग-अलग फैसले लिए जाने के चलते पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों में और भी अधिक संभ्रमवाला माहौल है. इस स्थिति से अमरावती के पार्टी पदाधिकारी भी अछूते नहीं है.
ज्ञात रहे कि, अमरावती से वास्ता रखनेवाले विधान परिषद सदस्य संजय खोडके की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हमेशा एक अलग जगह रही और उनकी गिनती अजीत पवार के बेहद खासम-खास, नजदिकी एवं विश्वासपात्र सिपहसालारों में हुआ करती रही. जिन्हें अजीत पवार ने पार्टी में प्रदेश उपाध्यक्ष का जिम्मा सौंपने के साथ ही विधि मंडल समन्वयक की भी जिम्मेदारी सौंपते हुए विधान परिषद में सदस्य भी बनाया था. जिसके चलते संजय खोडके की गिनती राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दूसरी पंक्ति वाले नेताओं में होती आई है. चूंकि अब पार्टी प्रमुख अजीत पवार का अकस्मात ही निधन हो गया है. जिसके चलते पूरे विदर्भ क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालने वाले पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष व विधायक संजय खोडके पर अब अमरावती महानगर पालिका के महापौर व उपमहापौर पद के चुनाव को लेकर खुद ही फैसला लेने और फिर उस हिसाब से आगे बढने की नौबत आन पडी है. क्योंकि, इस समय पार्टी में ‘पक्षश्रेष्ठी’ कोई भी नहीं है.
ज्ञात रहे कि, अमरावती शहर की राजनीति में विधायक संजय खोडके सहित उनकी पत्नी व विधायक सुलभा खोडके की समाज के सभी घटकों में सम-समान मान्यता व स्वीकार्यता मानी जाती है. हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में राकांपा प्रत्याशी सुलभा खोडके को मुस्लिम समुदाय के अपेक्षित वोट नहीं मिले थे और इस बार भी मनपा चुनाव के दौरान मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में राकांपा प्रत्याशियों का प्रदर्शन कुछ विशेष नहीं रहा. ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए. विधायक खोडके दंपति को अभी से ही अपनी रणनीति तय करना जरुरी होगा. इस बात को ध्यान में रखते हुए ही संभवत: विधायक संजय खोडके ने मनपा चुनाव में ‘एकला चलो’ की भूमिका अपनाई थी और अजीत पवार गुट वाली राकांपा ने अपने अकेले के दम पर सर्वाधिक 85 सीटों पर अपने प्रत्याशी खडे किए थे. जिसमें से पार्टी के 11 प्रत्याशी चुनाव जीतकर पार्षद निर्वाचित हुए. चूंकि इस समय मनपा में त्रिशंकू सदन वाली स्थिति है. जिसके चलते किसी भी राजनीतिक दल को मनपा में अपनी सत्ता स्थापित करने हेतु अन्य दलों के पार्षदों का साथ व समर्थन लेना जरुरी है. परंतु यहीं पर आकर विधायक खोडके के लिए स्थिति पेशोपेश वाली बन गई है. क्योंकि यदि वे भाजपा के साथ हाथ मिलाकर सत्ता में शामिल होते है, तो इससे उनके मुस्लिम समर्थक मतदाताओं में गलत संदेश जाने की संभावना है. वहीं यदि वे भाजपा के साथ सत्ता में शामिल नहीं होते है, और विपक्ष में रहते है, तो घर में दो-दो विधायक पद रहने के बावजूद इसका उन्हें स्थानीय स्तर पर कोई फायदा नहीं होगा. साथ ही अब चूंकि उनके सिर से अजीत पवार का साया भी हट गया है, तो मुंबई में भी उनके लिए राजनीतिक स्थिति पहले की तरह नहीं रहेगी. यानि दोनों तरफ से नुकसान ही होगा. ऐसे में यदि विधायक खोडके द्वारा मनपा की सत्ता में भाजपा के साथ शामिल होने के बारे में सोचा भी जाता है, तो उनके सामने विधायक रवि राणा व युवा स्वाभिमान पार्टी की चुनौती व समस्या बनी रहेगी. क्योंकि विधायक खोडके दंपति एवं विधायक रवि राणा के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता किसी से छीपी नहीं है और दोनों ही एक-दूसरे को फुटीं आंख भी देखना पसंद नहीं करते. यही वजह है कि, विधायक खोडके ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि, यदि मनपा की सत्ता में भाजपा के साथ विधायक राणा और युवा स्वाभिमान पार्टी शामिल होते है, तो वे (खोडके) उस गठबंधन में शामिल नहीं होंगे. साथ ही विधायक खोडके ने इस बारे में आगे का निर्णय ‘पक्षश्रेष्ठी’ के निर्देशानुसार लिया जाएगा. ऐसे में सभी की निगाहें इस बात की ओर लगी हुई थी कि, राकांपा के पार्टी नेतृत्व द्वारा अमरावती महानगर पालिका को लेकर विधायक खोडके को क्या दिशा-निर्देश दिए जाते है, परंतु इसी बीच अजीत पवार का ही निधन हो गया. ऐसे में अब सबसे बडा सवाल यह है कि, चूंकि अब वरिष्ठ स्तर से दिशा-निर्देश देनेवाला कोई है ही नहीं, तो अब विधायक खोडके द्वारा किस आधार पर निर्णय लिया जाएगा और आगे बढा जाएगा.
दैनिक ‘अमरावती मंडल’ के राजनीतिक आकलन एवं राजनीतिक जानकारों द्वारा किए गए विश्लेषण के मुताबिक मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए भले ही विधायक खोडके द्वारा विधायक रवि राणा का व्यक्तिगत स्तर पर जबरदस्त विरोध किया जाता रहा है. लेकिन अब मौजूदा स्थितियों में केवल इसी एक वजह को ध्यान में रखते हुए विधायक खोडके द्वारा अपने राजनीतिक भविष्य को दांव पर नहीं लगाया जाएगा. बल्कि हालात के साथ पटरी बिठाने हेतु कुछ हद तक संतुलित भूमिका अपनाई जाएगी. जिसे लेकर एक संभावना यह भी बनती नजर आ रही है कि, आगामी 2 फरवरी को होनेवाली नामांकन प्रक्रिया तथा 6 फरवरी को होनेवाले महापौर व उपमहापौर पद के चुनाव को ध्यान में रखते हुए आज या कल में राकांपा नेता व विधायक संजय खोडके की राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ चर्चा हो सकती है. जिसके बाद विधायक खोडके द्वारा नए राजनीतिक हालात को ध्यान में रखते हुए अपने लिए सुविधाजनक रहनेवाला कोई निर्णय लिया जा सकता है.

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