अब महाराष्ट्र में भी शुगर फ्री आलू की खेती शुरु

कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च रंग लाई, पैदावार बढेगी

* पुणे, नाशिक, अ. नगर व सातारा जिले खेती के लिए अनुकुल
पुणे /दि.21 – राज्य में अब ‘शुगर-फ्री’ कहे जा रहे खास किस्म के आलू की खेती ने जोर पकड़ा है. खास तौर पर सोलापुर समेत कुछ जिलों में इसकी खेती और बाजार में मांग बढ़ रही है. किसानों का दावा है कि यह किस्म न सिर्फ सेहत के लिए बेहतर है, बल्कि आम आलू की तुलना में ज्यादा मुनाफा भी दे रही है.
महाराष्ट्र में नीलकंठ किस्म का आलू खेती और बाजार दोनों स्तर पर आकर्षण का केंद्र बन रहा है. यह पहल किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्वास्थ्य जागरूक उपभोक्ताओं के लिए भी एक नया विकल्प पेश कर रही है.

* कौन सी है यह किस्म?
इस खास आलू की किस्म को नीलकंठ नाम से जाना जा रहा है. इस आलू का रंग हल्का बैंगनी या मटमैला व आकार सामान्य आलू जैसा होता है. साथ ही इसके स्वाद में ज्यादा अंतर नहीं होता. उत्पादकों का कहना है कि इसमें शुगर और फिनोल की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे इसे मधुमेह रोगियों के लिए बेहतर विकल्प बताया जा रहा है. इस आलू की बनावट कसी हुई होती है और स्वाद हलका मीठा होता है. जिसके चलते यह उबालकर खाने तथा सलाद व सब्जी बनाने के लिए बेहतर माना जाता है. इस आलू का छिलका पतला, लेकिन काफी मजबूत होता है. जिससे इस आलू की भंडारण क्षमता बेहतर रहती है.

* क्या हैं मुख्य दावे?
सामान्य आलू से अधिक पैदावार, बाजार में बेहतर कीमत, दोगुना दाम मिलने की संभावना, लंबे समय तक भंडारण (स्टोरेज) की क्षमता, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक ग्राहकों में बढ़ती मांग.

* किसानों को कैसे होगा फायदा?
विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म कम खराब होती है और ज्यादा समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है. इससे किसानों को तुरंत बेचने की मजबूरी नहीं रहती और उचित बाजार मूल्य मिलने पर बिक्री की जा सकती है. साथ ही इस आलू की बाजार में कीमत सामान्य आलू से कुछ अधिक मिलती है. जिसके चलते यह आलू किसानों हेतु लाभदायक फसल साबित हो सकती है.

* स्वास्थ्य के लिहाज से कितना सुरक्षित?
हालांकि इसे ‘शुगर-फ्री’ कहा जा रहा है, लेकिन कृषि व स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मधुमेह मरीजों को किसी भी नए खाद्य उत्पाद को नियमित आहार में शामिल करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. इस आलू में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडंट व फायबर की अच्छी-खासी मात्रा होती है. फायबर अधिक होने से पाचन क्रिया बेहतर रहती है. इस आलू में विटामीन-सी, पोटॅशियम और आयरन भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते है. ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में पोटॅशियम सहायक होता है. जबकि विटामीन-सी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है.

* अक्तूबर-नवंबर में होती है बुआई
खेती की दृष्टि से बैंगनी और लाल आलू की फसल लगभग 90 से 110 दिनों में तैयार हो जाती है. साथ ही इसकी बुआई अक्तूबर से नवंबर माह के बीच की जाती है. अच्छी जल निकालनी वाली दोमट मिट्टी में इसका उत्पादन बेहतर होता है. नीले आलू की बुआई के लिए मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए. जैविक पदार्थ से भरपूर मिट्टी इस आलू की बुआई व फसल के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक यदि महाराष्ट्र में इस आलू की पैदावार बडे पैमाने पर शुरु की जाती है, तो इससे किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिल सकता है.

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