कार्यालयीन ड्यूटी करना यानी जालसाजी करना नहीं

हाईकोर्ट का फैसला, सरकारी अधिकारी के खिलाफ मामला रद्द

नागपुर/दि.4 – सरकारी अधिकारी द्बारा किसी प्रकरण में कार्यालयीन ड्यूटी करते समय आवश्यक आदेश देना यानी जालसाजी करना नहीं हैं. जालसाजी का माला लागू होने के लिए अधिकारी द्बारा कपटतता अथवा अप्रामाणिक उद्देश्य से काम करना आवश्यक है, ऐसा मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के न्यायमुर्ति प्रवीण पाटिल ने अपने फैसले में स्पष्ट किया.
यवतमाल के भूमिअभिलेख विभाग के उपअधिक्षक यशवंत चव्हाण ने उनके अधिन अधिकारी द्बारा दी गई जानकारी व कागजपत्रों के आधार पर एक संपत्ति के संचालक ने राजू इंगले का समावेश किया था. इस कारण 2025 में राजू के भाई शंकर ने नेर परसोपंत थाने में शिकायत देकर चव्हाण पर अनियमितता का आरोप किया था. इस कारण पुलिस ने चव्हाण के खिलाफ जालसाजी समेत विविध धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था. इसके लिए उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी. इस पर सुनवाई के बाद न्यायालय ने चव्हाण द्बारा अपने कर्तव्य से बाहर जाकर काम न किया रहने और उन्हें बे वजह निजी विवाद में फंसाए जाने की बात स्पष्ट की. साथ ही नियमानुसार ड्यूटी निभाते समय उनके खिलाफ फौजदारी मुकदमा चलाया नहीं जा सकता, ऐसा भी दर्ज कर विवादास्पद एफआईआर रद्द की, चव्हाण की तरफ से एड. अनूप ढोरे ने काम संभाला.

* कानूनी प्रक्रिया की
चव्हाण द्बारा अंतिम निर्णय लेने के पूर्व फेरफार आवेदन पर कानूनी प्रक्रिया की गई. साथ ही प्रकरण की प्राथमिक जांच भी की गई. 11 सितंबर 2020 को नोटीस जारी कर आपत्ति मंगवाई गई. लेकिन किसी की भी आपत्ति नहीं आयी. इस कारण लिपीक ने संपत्ति का निरीक्षण कर चव्हाण को रिपोर्ट दी. पश्चात चव्हाण ने 8 अक्तूबर 2020 को संबंधित संपत्ति पर राजू इंगले का नाम दर्ज करने के आदेश दिए.

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