कार्यालयीन कर्तव्य निभाना फर्जीवाड़ा नहीं

नागपुर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

नागपुर /दि.4- किसी सरकारी अधिकारी द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य का पालन करते हुए दिया गया आदेश अपने आप में फर्जीवाड़ा नहीं माना जा सकता. फर्जीवाड़े का अपराध तभी बनता है जब कार्य कपटपूर्ण या बेईमानी की मंशा से किया गया हो. यह महत्वपूर्ण टिप्पणी बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने की है. न्यायमूर्ति प्रवीण पाटिल ने यह निर्णय सुनाया.
मामला यवतमाल के भूमि अभिलेख विभाग के उप-अधीक्षक यशवंत चव्हाण से जुड़ा है. उन्होंने अधीनस्थ अधिकारियों से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर एक संपत्ति के रिकॉर्ड में राजू इंगले का नाम दर्ज करने का आदेश दिया था. वर्ष 2025 में इस मामले को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने चव्हाण के खिलाफ फर्जीवाड़े समेत विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली.
चव्हाण ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की. सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि संबंधित अधिकारी ने नियमानुसार प्रक्रिया अपनाई थी. 11 सितंबर 2020 को सार्वजनिक नोटिस जारी कर आपत्तियां आमंत्रित की गई थीं, लेकिन कोई आपत्ति प्राप्त नहीं हुई. इसके बाद निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर 8 अक्टूबर 2020 को आदेश पारित किया गया. अदालत ने कहा कि अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई कार्य नहीं किया और उन्हें निजी विवाद में अनावश्यक रूप से घसीटा गया. इस आधार पर न्यायालय ने दर्ज एफआईआर को रद्द कर

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