राजगुरू ने अमरावती की धरती पर भरी थी क्रांति की गर्जना
बलिदान की 95 वीं वर्षगांठ पर अमरावती शहर ने किया नमन

अमरावती/दि.25 – 23 मार्च भारतीय इतिहास का वह अमर दिन है, जब भगत सिंह, सुखदेव और शिवराम हरि राजगुरु ने वर्ष 1931 में लाहौर जेल में हंसते-हंसते फांसी को गले लगाकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया. उनकी शहादत की 95वीं वर्षगांठ पर अमरावती शहर गर्व और श्रद्धा से उन्हें याद कर रहा है.
अमरावती का इन क्रांतिकारियों, विशेषकर राजगुरु से गहरा संबंध रहा है. क्रांतिकारी मार्ग पर आगे बढ़ने से पहले राजगुरु वर्ष 1927-28 के दौरान अमरावती में रहे थे. यहां उन्होंने हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल में प्रवेश लेकर लाठी, मल्लखंब और आत्मरक्षा का कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया. यहीं से उन्होंने ‘व्यायाम विशारद’ की उपाधि हासिल की और अपने शरीर व मन को क्रांति के लिए तैयार किया. इतिहास के अनुसार, अमरावती प्रवास के दौरान राजगुरु को महात्मा गांधी और लाला लाजपत राय जैसे महान नेताओं का सान्निध्य भी मिला। इन महान हस्तियों के विचारों और संवादों ने उनके भीतर देशभक्ति की ज्वाला को और प्रज्वलित किया. यहीं से उन्होंने युवाओं को भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए आगे आने का आह्वान किया. 23 मार्च 1931 को जैसे ही उनके बलिदान की खबर फैली, अमरावती सहित पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी. शहर में जनआक्रोश और देशभक्ति का माहौल देखने को मिला. लोगों ने जुलूस निकालकर इन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि दी और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की.
शहीद दिवस की पूर्व संध्या पर अमरावती के इचछन चौक स्थित शहीद स्तंभ को रोशनी से सजाया गया. शहरवासियों ने दीप प्रज्वलित कर और श्रद्धांजलि अर्पित कर शहीदों के बलिदान को याद किया. आज भी अमरावती की धरती पर राजगुरु के पदचिह्न युवाओं को देशभक्ति, साहस और बलिदान की प्रेरणा देते हैं. उनका जीवन संदेश देता है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है और उसके लिए हर बलिदान छोटा है.





