शालाओं में आरटीई विद्यार्थियों के साथ होता है भेदभाव
नागपुर हाईकोर्ट का मौखिक निरीक्षण, असमानता के व्यवहार पर जताई चिंता

नागपुर/दि.17 – निजी विना अनुदानित शालाओं में आरटीई अंतर्गत प्रवेश लेनेवाले विद्यार्थियों के साथ कई स्थानों पर भेदभाव किया जाता है और उनके साथ समानता वाला व्यवहार नहीं किया जाता. जिसके चलते ऐसे विद्यार्थी स्कूल जाने में टाल-मटोल करते है. इसे खेदजनक स्थिति कहा जा सकता है. ऐसे में शिक्षा अधिकार अधिनियम के उद्देश्यों को साध्य करने हेतु प्रवेश के मानकों सहित शाला व्यवस्थापन की मानसिकता में भी बदलाव की जरुरत है, ऐसा मौखिक निरीक्षण मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ नेे एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दर्ज किया.
बता दें कि, राज्य सरकार ने विगत 22 फरवरी को एक विवादास्पद निर्णय जारी करते हुए शालाओं में आरटीई के तहत आरक्षित सीटों पर प्रवेश हेतु विद्यार्थियों के लिए उनके निवासस्थान से केवल एक किमी के दायरे में रहनेवाली निजी बिना अनुदानित शाला का चयन करने को अनिवार्य व बंधनकारक किया था. जिसके खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता आशीष फुलझेले, अनिकेत कुत्तरमारे एवं वैभव कांबले ने याचिका दायर की थी. जिस पर सुनवाई करते हुए न्या. अनिल पानसरे व न्या. निवेदिता मेहता की दो सदस्यीय खंडपीठ ने विगत 12 मार्च को घर से शाला की दूरी वाले मानक को रद्द करने का आदेश दिया था. साथ ही आरटीई प्रवेश हेतु दूरी से संबंधित मानक रहने का शिक्षा अधिकार अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं है. जिसके चलते यह मानक भी अवैध है, ऐसा स्पष्ट करते हुए कहा था कि, इस कानून के उद्देश्य को साध्य करने हेतु वंचित घटक के विद्यार्थियों को उनकी पसंद के अनुरुप किसी भी शाला में प्रवेश लेने की छूट होनी चाहिए. साथ ही साथ अदालत ने यह भी कहा था कि, कई निजी बिना अनुदानित शालाओं में आरटीई के अंतर्गत आरक्षित सीटों पर प्रवेश लेनेवाले विद्यार्थियों के साथ अन्य विद्यार्थियों की तुलना में भेदभाव एवं असमानतापूर्ण व्यवहार किया जाता है. जिसे अपने-आप में बेहद चिंताजनक स्थिति कहा जा सकता है.