नीम के पेड के नीचे मिली थी चांगापुर नरेश की प्रतिमा

पंचक्रोशी के श्रद्धा स्थान हनुमानजी मंदिर का रोचक इतिहास

* श्रीवल्लभ जी लढ्ढा ने देखा और स्थापित किया
* जन्मोत्सव पर प्रसादी और रक्तदान की परंपरा
* प्रत्येक शनिवार 1 हजार से अधिक श्रद्धालु करते सुंदरकांड पाठ
अमरावती/दि.28 – अमरावती, वलगांव, खल्लार और आसपास के अनेक ग्राम तथा कस्बों के श्रद्धास्थान चांगापुर नरेश हनुमानजी की मंदिर स्थापना की रोचक कथा कही जा सकती है. कभी नीम के पेड के नीचे थी चांगापुर हनुमानजी की प्रतिमा. जिसे वलगांव के सधन कास्तकार श्रीवल्लभ जी लढ्ढा ने श्रद्धापूर्वक मंदिर में स्थापित किया. आज पंचक्रोशी में इस शतायुषी मंदिर की कीर्ति पहुंची है और हजारों भाविक नित्य नियम से यहां दर्शन, पूजन करने आते हैं. उसी प्रकार वन भोजन का भी यह एक प्रसिद्धस्थल बना हुआ है. इतना ही नहीं यहां किसान परिवारों के सैकडों विवाह संपन्न हो चुके है. बीते कुछ दशकों से यहां Hanuman Birth Celebrationके दिन एक ओर जहां हजारों भाविक प्रसादी पाते है. वहीं दूसरी ओर सैकडों लोग भीषण गर्मी के बावजूद चांगापुर नरेश के प्रति अपनी अपरिमित श्रद्धा व्यक्त करते हुए रक्तदान भी करते हैं. मंदिर की अप्रोच रोड का भूमिपूजन दशकों पहले तत्कालीन राज्यपाल पट्टा सीता रमैया के हस्ते हुआ था. यह जानकारी श्यामसुंदर लढ्ढा ने अमरावती मंडल को दी.
* वलगांववासियों की बढी श्रद्धा
वलगांव निवासी श्रीवल्लभ जी लढ्ढा यहां खेतीबाडी के काम से आते थे. वे चांगापुर मोड पर नीम के पेड के नीचे थकावट दूर करने ठहरते. वहीं अपने साथ लाया भोजन करते. वहां नीम के पेड के पास ही हनुमानजी की प्रतिमा थी. जिसे श्रद्धानुसार पूजन दर्शन श्रीवल्लभ जी लढ्ढा करते थे. श्यामसुंदर लढ्ढा ने बताया कि, उस समय चांगापुर गांव का नाम था. किंतु यहां कोई बस्ती न थी. खेतीबाडी थी. श्रीवल्लभ जी लढ्ढा की नीम के पेड के नीचे की हनुमानजी की मूर्ति के प्रति श्रद्धा बढती गई. उन्होंने अपने ग्राम के लोगों को भी हनुमानजी के दर्शन-पूजन के लिए प्रेरित किया्. समस्त वलगांव वहां नित्य नियम से दर्शन के लिए उमडने लगा.
* जगह खरीदी, मंदिर की स्थापना
श्यामसुंदर लढ्ढा ने बताया कि, दादा जी की आस्था बढती गई. तब चांगापुर में जगह खरीदी. वहां मंदिर बनवाया. कुआ खुदवाया. साथ ही वलगांव और आसपास के ग्रामों के निरधन घरों के बेटा-बेटियों के विवाह हेतु स्थल विकसित किया गया. आज इस स्थान को श्रीवल्लभ ट्रस्ट के नाम से जाना जाता है. यहां श्रीवल्लभ जी लढ्ढा की पहल से गरीब घरों के बच्चों के विवाह नाममात्र शुल्क में किये जाते थे. लढ्ढा ने वहां कमरे और सभागार विकसित करने के साथ ही मंगल प्रसंगों को ध्यान में रख बिछायत, बर्तन आदि भी जुटा लिये थे. केवल दो और पांच रुपए में उक्त स्थल और वहां का बर्तन बिछायत विवाह आदि प्रसंग के लिए उपलब्ध होता था. अत: आसपास के गांवों रामा, साउर, रेवसा, चत्रापुर, सावरखेड, कुंड सर्जापुर आदि गांवों के लोग वहां अपने पुत्र-पुत्री के विवाह करवाने लगे. हजारों विवाह संपन्न हो जाने का दावा लढ्ढा ने किया.
* देउ महाराज ने दशकों तक की सेवा
मंदिर का यह निर्माण 4 अप्रैल 1939 को पूर्ण हुआ था. अर्थात आजादी के पहले का वह काल रहा. ऐसे में अनेक सामान्य परिवारों को अपने मंगल प्रसंगों के लिए यह स्थान उपयुक्त लगता और अनेकानेक आयोजन यहां 9 दशकों से सतत हो रहे हैं. फलस्वरुप आसपास के सभी गांवों, कस्बों में चांगापुर नरेश मंदिर की ख्याति होती गई. इसे चांगापुर नरेश नाम पुष्कर्णा समाज के देउ महाराज ने दिया. उन्होंने अनेक दशकों तक चांगापुर नरेश हनुमानजी की सेवा की. चांगापुर और देउ महाराज इस कदर जुड गये कि, चांगापुर का नाम लेते ही लोगों को महाराज जी का स्मरण हो आता. देउ महाराज अविवाहित रहे. मदनजी व्यास के यहां जन्मे देउ महाराज ने वर्षों वर्ष चांगापुर नरेश हनुमानजी की सेवा की. उसी प्रकार अनेकानेक हनुमान भक्तों को वे चांगापुर नरेश के दर्शन, नित्य पूजन आदि के लिए प्रेरित भी करते गये. लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले हनुमानजी के रुप में चांगापुर नरेश की प्रसिद्धि बढती गई. साथ ही दर्शनार्थियों की संख्या बढती गई.
* राज्यपाल के हस्ते सडक का शिलान्यास
कालांतर में चांगापुर की महिमा और कीर्ति बढने के साथ वलगांव रोड से भीतर मंदिर तक पक्की सडक निर्माण का विचार किया गया. तत्कालीन राज्यपाल पट्टा सीतारामैया के हस्ते अप्रोच सडक का भूमिपूजन किये जाने की जानकारी श्यामसुंदर लढ्ढा ने दी और बताया कि, इस भूमिपूजन के कारण मंदिर की लोकप्रियता और बढी. अप्रोच रोड के कारण वाहन लेकर आने वालों की संख्या दिनोंदिन बढती गई. फलस्वरुप भाविकों की संख्या बढती गई.
* सुंदर परिसर, गुफा से धर्म पर्यटन बढा
अमरावती शहर भी समय के साथ विस्तृत होता गया. ऐसे में महज 5 किमी के फासले पर स्थित चांगापुर देवस्थान के रुप में विख्यात होने के साथ-साथ धर्म पर्यटन का भी स्थल बना. यहां श्रावण मास में वन भोजन के कार्यक्रम होने लगे. यहां की वास्तु और उसमें गुफा, कुआ और आसपास खेती के कारण बारिश के सीजन में मौसम बडा सुहवना हो जाने से भी भाविकों की संख्या सतत बढती रही. वन भोजन के आयोजनों के साथ यहां मंगल प्रसंग पहले की समान ही नित्य होते रहे. उसी प्रकार चांगापुर नरेश हनुमानजी के प्रति श्रद्धा में भी बढोत्तरी होती गई. श्रद्धालु मंगलवार और शनिवार नित्य नियम से यहां दर्शन के लिए अवश्य आते.
* आये हैं अनेक धर्म नेता, संत महात्मा
श्यामसुंदर लढ्ढा ने बताया कि, दादाजी श्रीवल्लभ जी लढ्ढा द्वारा चांगापुर में शुरु किये गये अनेकानेक उपक्रम कालांतर में पिता सत्यनारायणजी उर्फ सत्तू सेठ लढ्ढा ने निरंतर रखे. इतना ही नहीं तो अनेकानेक संत महात्माओं ने चांगापुर हनुमान मंदिर को अपनी चरण धूलि से पावन किया. भगवाताचार्य रमाकांत व्यास, आचार्य किशोर व्यास और अनेक कथा मर्मज्ञो की कथा और प्रवचन यहां सफलतापूर्वक आयोजित हो चुके हैं. कई धर्म सम्मेलनों का साक्षीदार चांगापुर का यह श्री वल्लभ ट्रस्ट बना है. सत्तू सेठ लढ्ढा ने 1996-97 में मंदिर का नवनिर्माण करवाया. 6 हजार वर्ग फीट का विशाल सभागार बनाया गया. उसी प्रकार रसोई आदि के लिए भी सुंदर व्यवस्था करने के साथ एक अन्य बडा सभागार निर्मित हुआ. वहां भी लग्न प्रसंग और अन्य आयोजन कुशलतापूर्वक हो चुके हैं. संपूर्ण परिसर लगभग डेढ एकड में विस्तृत है.
* आज भी 40 हजार लेते हैं प्रसादी
श्यामसुंदर लढ्ढा ने बताया कि, हनुमान जन्मोत्सव निश्चित ही सबसे बडा उत्सव रहा है. आज भी यहां भक्तों के वृहद योगदान से हजारों की प्रसादी आयोजित की जाती है. सैकडों लोग सेवा देते है. जन्मोत्सव के दिन तडके 3.30 बजे रुद्राभिषेक होता है. उपरान्त चांगापुर नरेश की सबेरे 5 बजे जन्मोत्सव आरती होती है. गाजे-बाजे से होने वाली आरती में हजारों भक्तों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति रहती है. करीब 40 हजार भाविक सबेरे से संध्या तक चलने वाले भंडारे में प्रसादी पाते हैं. साथ-साथ रक्तदान शिविर का यज्ञ चलता है. इस यज्ञ में 550-600 भक्त स्वयंस्फूर्ति से रक्तदान करते आये हैं. यह क्रम अनवरत है. चांगापुर नरेश का जब तक आशीर्वाद होगा चलता रहेगा. कई भाविकों ने भी अमरावती मंडल से हनुमान जन्मोत्सव उपलक्ष्य चर्चा करते हुए बताया कि, उनके जीवन के बहुतेरे संकट चांगापुर नरेश हनुमानजी ने दूर किये हैं. इसी प्रकार घर-परिवार को लेकर की गई कामनाएं भी साकार हुई है. अमरावती के कई प्रतिष्ठित परिवार चांगापुर नरेश पर असीम श्रद्धा रखते आये हैं. बाहरगांव बस गये कई परिवारों ने आज भी अमरावती आने के बाद हनुमानजी के एक बार दर्शन के संकल्प कर रखे हैं. इतना ही नहीं विदेशों में बसे भक्त भी यहां आते ही सर्वप्रथम चांगापुर नरेश के दर्शन करते हैं.
* प्रत्येक शनिवार 1100 करते पाठ
श्यामसुंदर लढ्ढा बताते हैं कि, चांगापुर नरेश का भक्तिभाव निरंतर बढता गया है. युवा वर्ग प्रत्येक शनिवार और मंगलवार दर्शन-पूजन के लिए अवश्य आते हैं. कई भाविक पैदल भी आते है. इसी क्रम में पिछले कुछ वर्षों से प्रत्येक शनिवार की रात्रि 1100-1200 भक्त यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं. सुंदरकांड का सामूहिक पाठ करते हैं. उपरान्त प्रसादी पाते हैं. यह सभी भाविक चांगापुर नरेश पर निश्चित ही अपार श्रद्धा रखते हैं. पिछले 10-11 वर्षों से तो यह क्रम निरंतर चल रहा है. लोगों की अनेकानेक मनोकामनाएं चांगापुर नरेश ने पूर्ण की है. इच्छित फल दिये हैं. कह सकते हैं कि, जाकी रही भावना जैसी….

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