टिकट बंटवारे में अफरा-तफरी का शिकार दिखी भाजपा
दावेदार तय करने में कई जगहों पर हुई भारी गलतियां

* पार्टी की लोकप्रियता के मुगालते में कई सीटों पर ‘सेल्फ गोल’
* गुटबाजी के चलते कई प्रबल दावेदारों को डाला गया हाशिए पर
* कुछ सीटों पर निष्ठावानों की बजाए ‘आयाराम’ को दी गई तवज्जो
* भाजपा में ही सबसे अधिक उठे बगावती स्वर, कई दावेदारों ने ऐन समय पर दूसरी पार्टियों का थामा दामन
* भाजपा पर मंडरा रहा अंतर्गत गुटबाजी व अंत:र्कलह के परिणामों का जबरदस्त खतरा
* पार्टी की नीतियों व वरिष्ठों के निर्देशों पर भारी पडे स्थानीय नेताओं के हित व अहंकार
अमरावती/दि.31 – महानगरपालिका चुनाव के लिए टिकट वितरण प्रक्रिया के दौरान भारतीय जनता पार्टी में भारी अफरा-तफरी देखने को मिली है. महानगरपालिका चुनाव में उतरने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी अपने ही फैसलों की शिकार होती दिखाई दे रही है. टिकट बंटवारे की प्रक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी संगठन के बजाय व्यक्तिगत गुटों और स्थानीय नेताओं के अहंकार के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है. नतीजा यह रहा कि कई वार्डों में भाजपा ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. दावेदार तय करने में कई स्थानों पर गंभीर गलतियां सामने आई हैं, जिससे पार्टी की अंदरूनी कमजोरियां उजागर हो गई हैं. दिलचस्प बात यह है कि पार्टी की लोकप्रियता ही इस बार उसके लिए सबसे बड़ी परेशानी बनती नजर आ रही है. टिकट बंटवारे में जमीनी हकीकत और जातिगत समीकरणों का समुचित आकलन नहीं किए जाने के आरोप लग रहे हैं. पार्टी के भीतर सक्रिय गुटबाजी के चलते कई मजबूत और प्रबल दावेदारों को हाशिए पर डाल दिया गया, जबकि कुछ सीटों पर निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बजाय बार-बार दल बदलने वाले ‘आयाराम’ नेताओं को तरजीह दी गई.
ज्ञात रहे कि, प्रत्याशियों के नाम घोषित करने और टिकट बंटवारे को लेकर भाजपा ने विगत एक सप्ताह के दौरान जिस तरह से काम किया, उसे राजनीतिक नियोजन कम तथा हडबडी व अफरा-तफरी अधिक कहा जा सकता है. जिसके चलते महानगर पालिका जैसे महत्वपूर्ण निकाय के चुनाव को लेकर भाजपा ने इसी हडबडी का शिकार होते हुए कई चीजों की निश्चित तौर पर अनदेखी की. जिसके चलते भाजपा कई गलतियां भी कर गई. जो पार्टी के लिए निश्चित तौर पर ‘सेल्फ गोल’ साबित होनेवाली है. यहां यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि, इस समय मनपा चुनाव के लिहाज से भाजपा के पास ही सबसे बडी कोर कमिटी है और भाजपा के पास अमरावती शहर में मनपा चुनाव का अच्छा-खासा अनुभव रहनेवाले पूर्व पालकमंत्री प्रवीण पोटे व पूर्व शहराध्यक्ष जयंत डेहनकर जैसे नेता भी है. इसके अलावा पार्टी ने जहां जलगांव जामोद के अपने विधायक संजय कुटे को मनपा चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया था, वहीं कोर कमिटी में प्रा. दिनेश सूर्यवंशी, किरण पातुरकर व शिवराय कुलकर्णी जैसे प्रदेश पदाधिकारी का भी समावेश किया गया था. इन सभी के पास भी अमरावती मनपा के चुनाव को लेकर अच्छा-खासा अनुभव कहा जा सकता है. लेकिन इतनी अनुभवी टीम रहने के बावजूद टिकट के बंटवारे को लेकर जिस तरह का दृश्य कल दिखाई दिया, उसे अनपेक्षित कहा जा सकता है. ऐसे में अब यह सवाल भी उठता दिखाई दे रहा है कि, कहीं पार्टी के शहराध्यक्ष, महिला शहराध्यक्ष व युवा मोर्चा शहराध्यक्ष जैसे पदों पर नए चेहरों को मौका देना पार्टी के लिए भारी तो नहीं पड गया.
* तीनों अध्यक्ष पदों पर नए व अनुभवहीन चेहरों की नियुक्ति पर उठ रहे सवाल
ज्ञात रहे कि, इससे पहले वर्ष 2022 में अमरावती मनपा सहित जिला परिषद व पंचायत समितियों के साथ ही नगर परिषद व नगर पंचायतों के चुनाव होने की संभावना बनी थी. जिसे ध्यान में रखते हुए भाजपा ने चुनाव लडने का अनुभव और हर हाल में चुनाव जीतने का जजबा रखनेवाले पूर्व पालकमंत्री प्रवीण पोटे पाटिल को शहराध्यक्ष व राज्यसभा सांसद डॉ. अनिल बोंडे को जिलाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी थी. परंतु कोविड संक्रमण व लॉकडाउन सहित ओबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में प्रलंबित रहनेवाली याचिका के चलते अगले करीब चार वर्ष तक निकाय चुनाव अधर में लटके रहे. इस दौरान सांसद अनिल बोंडे व पूर्व मंत्री प्रवीण पोटे का जिलाध्यक्ष व शहराध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त हो गया. जिसके बाद भाजपा द्वारा अमरावती के शहराध्यक्ष पद पर डॉ. नितिन धांडे की नियुक्ति की गई. जिन्हें मनपा क्षेत्र की राजनीति के लिहाज से पूरी तरह नए व लगभग अनुभवहीन कहा जा सकता है. इसके अलावा भाजपा ने अपनी ग्रामीण इकाई को भी दो भागों में विभाजित कर एक की बजाए दो ग्रामीण जिलाध्यक्ष नियुक्त किए. जिसके तहत मेलघाट क्षेत्र वाले हिस्से में पूर्व विधायक प्रभुदास भिलावेकर तथा शेष अमरावती वाले हिस्से में रविराज देशमुख को जिलाध्यक्ष नियुक्त किया गया. इसमें से प्रभुदास भिलावेकर केवल एक बार मेलघाट क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए थे. जिन्हें आगे चलकर हार का सामना करना पडा था. साथ ही पार्टी ने मेलघाट में उनकी बजाए कांग्रेस से आयातीत केवलराम काले को अपना प्रत्याशी बनाया था. वहीं दूसरी ओर रविराज देशमुख के पास भी चुनाव लडने का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में भाजपा के मौजूदा तीनों अध्यक्ष चुनाव संबंधी मामलों के लिए पूरी तरह नए-नवेले कहे जा सकते. जिसका पहला परिणाम जारी माह के दौरान ही हुए नगर परिषद व नगर पंचायत के चुनाव के समय जीत के मुहाने पर पहुंचने के बावजूद हार का सामना करने के तौर पर भाजपा के सामने आ चुका है. वहीं अब दूसरे चरण के तहत होने जा रहे मनपा चुनाव की नामांकन प्रक्रिया के दौरान भी टिकट बांटने के समय मची हडबडी व अपरा-तफरी को इसी निर्णय का परिणाम कहा जा सकता है.
* नई लीडरशीप को उभरने से रोकने की जद्दोजहद में दिखे स्थानीय नेता
विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि, स्थानीय नेताओं पर नई लीडरशिप को उभरने से रोकने की जद्दोजहद करने का भी आरोप है. पार्टी की नीतियों और वरिष्ठ नेतृत्व के निर्देशों पर कई जगह स्थानीय हित, गुटीय समीकरण और व्यक्तिगत अहंकार भारी पड़ते दिखाई दिए. इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा में ही सबसे अधिक बगावती स्वर उभरकर सामने आए. जिन क्षेत्रों में पार्टी के पास मजबूत, जमीनी पकड़ वाले और जीताऊ चेहरे थे, वहीं गलत आकलन और गुटीय दबाव में उन्हें किनारे कर दिया गया. जिसका सबसे बडा उदाहरण एड. प्रशांत देशपांडे, प्रा. संजय तीरथकर, संजय अग्रवाल, पुरुषोत्तम बजाज व सतीश करेसिया जैसे प्रबल दावेदारों की टिकट काटे जाने को कहा जा सकता है. इसके उलट कुछ सीटों पर ऐसे चेहरों को टिकट थमाया गया, जिनकी पहचान विचारधारा से ज्यादा दल-बदल की राजनीति से जुड़ी रही है. इससे पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भारी रोष फैल गया है. पार्टी के भीतर नई लीडरशिप उभरने का डर इतना हावी रहा कि युवा और सक्रिय चेहरों को जानबूझकर बाहर रखा गया. स्थानीय सत्ता केंद्रों ने अपने वर्चस्व को बचाने के लिए संभावित चुनौती देने वाले नेताओं को टिकट की दौड़ से ही बाहर कर दिया. यही वजह है कि भाजपा में सबसे ज्यादा बगावती सुर सुनाई दे रहे हैं.
* जमीनी हकीकत व जातिगत समीकरण का नहीं हुआ आकलन
यहां यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि, भाजपा की लोकप्रियता इस बार उसके लिए वरदान नहीं, बल्कि सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित होती दिख रही है. हर सीट हमारी के भ्रम में जमीनी हकीकत, सामाजिक संतुलन और जातिगत समीकरणों को दरकिनार कर दिया गया. यहां पर उदाहरण के तौर पर प्रभाग क्र. 14 जवाहर गेट-बुधवारा का नाम लिया जा सकता है. जहां पर 7 हजार मुस्लिम एवं 5 हजार हिंदी व राजस्थानी भाषी मतदाता ऐसे कुल 12 हजार हिंदी भाषी मतदाता रहने के बावजूद भाजपा ने चारों प्रत्याशी मराठी भाषी ही दिए है. जबकि इस प्रभाग में रहनेवाले 5 हजार राजस्थानी व हिंदी भाषी मतदाता सीधे तौर पर भाजपा का वोट बैंक माने जाते है. इस प्रभाग से भाजपा के पास अनिशा मनीष चौबे व कंचन उपाध्याय सहित भाजयुमो के शहराध्यक्ष विक्की शर्मा की पत्नी व दीपक डाबी की पत्नी सर्वसाधारण महिला संवर्ग वाली सीट से टिकट के लिए प्रबल दावेदार थे. जिनकी अनदेखी करते हुए भाजपा ने इस सीट से गंगा खारकर को अपना प्रत्याशी बनाया है. जिनके परिवार से ही वास्ता रखनेवाले राजू शंकर खारकर इसी प्रभाग से शिंदे गुट वाली शिवसेना की ओर से प्रत्याशी भी है. ऐसे में कहा जा सकता है कि, जवाहर गेट-बुधवारा प्रभाग में भाजपा जातिगत समीकरण सहित जमीनी हकीकत का आकलन करने में चुक गई. साथ ही इस प्रभाग में किए गए सर्वे रिपोर्ट की भी लगभग अनदेखी की गई. ऐसे में फीडबैक को अनदेखा करने का खामियाजा अब बगावत के रूप में सामने आ रहा है.
* असंतुष्टों व बागीयों की वजह से मनपा चुनाव में भाजपा के सामने पैदा हो सकती है कई मुश्किले व चुनौतियां
टिकट न मिलने से नाराज कई दावेदारों ने ऐन चुनावी वक्त पर दूसरी पार्टियों का दामन थाम लिया. इससे न केवल भाजपा की चुनावी रणनीति कमजोर हुई, बल्कि विरोधियों को बैठे-बिठाए मजबूत हथियार मिल गया. असंतोष और बगावत का यह सिलसिला भाजपा के लिए अंदरूनी संकट का रूप ले चुका है. टिकट न मिलने से नाराज कई दावेदारों ने ऐन समय पर दूसरी पार्टियों का दामन थाम लिया, जिससे चुनावी समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं. असंतुष्टों और बागियों की बढ़ती संख्या के कारण मनपा चुनाव में भाजपा के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. यहां पर उदाहरण के तौर पर प्रभाग क्र. 6 विलास नगर-मोरबाग से टिकट के प्रबल दावेदार रहनेवाले दीपक साहू (सम्राट) के नाम का उल्लेख किया जा सकता है. जिनकी टिकट लगभग तय मानी जा रही थी. परंतु ऐन समय पर उनकी टिकट काट दी गई. इसके अलावा जवाहर गेट प्रभाग से भाजयुमो के शहराध्यक्ष विक्की शर्मा व भाजपा अंबा मंडल के अध्यक्ष मनीष चौबे की दावेदारी को भी ऐन समय पर दरकिनार किया गया. जिसका खामियाजा अब भाजपा को बगावत के तौर पर भुगतना पड रहा है. साथ ही अब स्थिति यह है कि भाजपा को बाहरी विपक्ष से ज्यादा अपने ही असंतुष्टों और बागियों से लड़ना पड़ सकता है. यदि समय रहते संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक संतुलन नहीं साधा गया, तो मनपा चुनाव में भाजपा को अपने ही फैसलों का भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. कुल मिलाकर भाजपा पर अब अंतर्गत गुटबाजी और अंतर्कलह के परिणामों का जबरदस्त खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है, जिसका सीधा असर आगामी मनपा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है.
* शिंदे सेना के साथ भी आपसी गुटबाजी के चलते ही युति नहीं होने का लग रहा आरोप
– एक-दो सीटों को लेकर शिंदे सेना के साथ जान-बुझकर मामला लटकाने की बात आई सामने
उधर, शिंदे गुट की शिवसेना के साथ युति नहीं होने के पीछे भी आपसी गुटबाजी को प्रमुख कारण बताया जा रहा है. सूत्रों के अनुसार एक-दो सीटों को लेकर जान-बूझकर मामला लटकाने की बात भी सामने आई है, जिससे गठबंधन की संभावनाएं कमजोर पड़ीं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शिंदे गुट की शिवसेना के साथ युति टूटने के पीछे भी वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि भाजपा की आंतरिक गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. एक-दो सीटों को लेकर जानबूझकर मामला लटकाने और गठबंधन को कमजोर करने के आरोपों ने पार्टी की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.
ध्यान दिला दें कि, भाजपा व शिंदे सेना गुट के बीच युति की संभावनाओं को लेकर विगत बुधवार से लेकर रविवार की शाम तक अमरावती सहित नागपुर में कई दौर की चर्चाएं व बैठके हुई. जिनमें भाजपा की ओर से राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले व पार्टी के प्रदेश संगठन मंत्री उपेंद्र कोठीकर तथा शिंदे गुट वाली शिवसेना की ओर से मंत्री उदय सामंत व संजय राठोड जैसे बडे नेताओं की उपस्थिति रही. इसके अलावा भाजपा के साथ युति करने के साथ ही सीट बंटवारे को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए शिंदे गुट के मंत्री संजय राठोड करीब तीन बार चर्चा हेतु अमरावती पहुंचे. वहीं भाजपा के मनपा निर्वाचन प्रभारी विधायक संजय कुटे विगत पूरा सप्ताह अमरावती में ही डेरा जमाए रहे. साथ ही साथ सीएम देवेंद्र फडणवीस व डेप्युटी सीएम एकनाथ शिंदे की ओर से भी स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि, मनपा चुनाव हेतु दोनों दलों के बीच हर हाल में युति करना ही है. लेकिन इसके बावजूद युति को लेकर चर्चा पूरा समय ‘हां या ना’ के बीच झुलती रही और शिंदे सेना को 17 सीटें देने की शर्त पर युति होने की खबर रविवार की शाम सामने आने के बाद सोमवार की सुबह होते-होते युति के टूट जाने की खबर सामने आई. ऐसे में अब हर कोई यह जानना चाह रहा है कि, आखिर एक सप्ताह तक चली जद्दोजहद के बाद बनी बात महज एक रात में क्यों और कैसे बिगड गई. जाहीर तौर पर कुछ प्रमुख प्रभागों की ‘खासम-खास’ सीटों के बंटवारे को लेकर स्थानीय नेताओं व पदाधिकारियों के व्यक्तिगत हित आडे आ गए. जिसके चलते दोनों ही पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं की ओर से जारी दिशा-निर्देशों तक की साफ तौर पर अनदेखी की गई है. जिसके चलते कहा जा सकता है कि, युति करने और सीटों के बंटवारे पर भी स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत गुटबाजी भारी पडी है. इसके चलते अब भाजपा और शिंदे सेना एक-दूसरे के आमने-सामने है. इसकी वजह से दोनों दलों के बीच हिंदुत्ववादी वोट बैंक का निश्चित तौर पर बंटवारा होगा, जो दोनों ही दलों पर भारी पडनेवाला है.





