सतपुड़ा की दुर्गम मेलघाटी भैंस को मिला राष्ट्रीय मानांकन

विदर्भ के पशुपालकों के लिए गर्व का क्षण, दूध उत्पादन और आय बढ़ने की उम्मीद

* अधिक उत्पादन क्षमता और उच्च वसा युक्त दूध से बढ़ेगा दुग्ध व्यवसाय
अमरावती/दि.20- देश में दूध की बढ़ती मांग के साथ-साथ उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता है। इस दिशा में अधिक दूध देने वाली पशु नस्लों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी क्रम में सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के दुर्गम क्षेत्रों में पायी जानेवाली मेलघाटी भैंस को अब राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई है. पशु चिकित्सा महाविद्यालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, मेलघाटी भैंस अधिक वसा युक्त दूध देने की क्षमता रखती है. इसके दूध में औसतन सात प्रतिशत वसा पाई जाती है, जिससे खोया, घी जैसे दुग्ध उत्पाद तैयार किए जाते हैं. महाराष्ट्र की नागपुरी, पंढरपुरी, मराठवाड़ी और पूर्णाथडी भैंस नस्लों के साथ-साथ विदर्भ की स्थानीय मेलघाटी भैंस को भी अब आधिकारिक नस्ल के रूप में मान्यता दी गई है.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों महाराष्ट्र पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. नितिन पाटिल को मेलघाटी भैंस का पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किया गया. इस उपलब्धि में अकोला पशु चिकित्सा महाविद्यालय के सहयोगी अधिष्ठाता डॉ. चैतन्य पावशे, परियोजना शोधकर्ता डॉ. शैलेंद्र कुरलकर, डॉ. प्रविण बनकर और डॉ. प्राजक्ता कुरलकर का विशेष योगदान रहा.
* उत्पादन और प्रजनन क्षमता उत्कृष्ट
अमरावती जिले के सातपुड़ा पर्वत क्षेत्र के दुर्गम मेलघाट इलाके में स्थानीय आदिवासी और गवली समाज द्वारा पीढ़ियों से मेलघाटी भैंस का पालन किया जा रहा है. धारणी और चिखलदरा क्षेत्रों में पाई जाने वाली इस भैंस को ‘पहाड़ी भैंस’ भी कहा जाता है. इसका रंग काला व चमकदार, त्वचा रोएंदार, शरीर मध्यम आकार का, तथा सींग ऊपर और भीतर की ओर मुड़े हुए होते हैं. यह नस्ल दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में अच्छी तरह अनुकूलन कर लेती है और इसकी उत्पादन तथा पुनरुत्पादन क्षमता अत्यंत श्रेष्ठ मानी जाती है.
* मेलघाटी भैंस के खोये की विशेष मांग
मेलघाटी भैंस के दूध में उच्च वसा होने के कारण इससे तैयार किए गए खोये और घी की स्थानीय बाजारों में विशेष मांग रहती है. अकोला पशु चिकित्सा महाविद्यालय के डॉ. प्रविण बनकर के अनुसार, राष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद इस नस्ल की भैंसों की मांग दूध उत्पादकों में और अधिक बढ़ने की संभावना है.
* पशुपालकों को होगा सीधा लाभ
मेलघाटी भैंस को आधिकारिक नस्ल के रूप में मान्यता मिलने से अब पशुपालकों को शासन की विभिन्न योजनाओं, अनुदानों, संरक्षण एवं सुधार परियोजनाओं का सीधा लाभ मिलेगा. इससे इस स्थानीय नस्ल का संरक्षण और वैज्ञानिक तरीके से संवर्धन संभव होगा तथा पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की उम्मीद है. कुल मिलाकर, मेलघाटी भैंस के राष्ट्रीय मानांकन से विदर्भ की पशुधन परंपरा को नई पहचान मिली है और यह मान्यता स्थानीय पशुपालकों के लिए आर्थिक व सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगी.

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