राजस्थान की लोकसंस्कृति का प्रमुख पर्व है गणगौर उत्सव

राजस्थानी समाज की महिला व युवतियों में उत्साह

* श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा त्यौहार
अमरावती /दि.7 – राजस्थान की लोकसंस्कृति का प्रमुख पर्व गणगौर उत्सव हर साल की तरह इस साल भी शहर में श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. राजस्थानी मारवाडी समाज की महिलाओं व युवतियों में इस त्यौहार को लेकर उत्साह दिखाई दे रहा है. 16 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव पारंपारिक रिति-रिवाजों, गीत-संगीत के साथ मनाया जा रहा है. गणगौर का पर्व भगवान शिव (ईसर) और माता पार्वती (गौरा) की आराधना का प्रतिक है.
इसकी परंपरा प्राचीन राजस्थान से जुडी मानी जाती है और सैकडों वर्षों से यह पर्व मनाया जा रहा है. होली के दूसरे दिन से इसकी शुरुआत हो चुकी है और चैत्र शुक्ल तृतिया तक यह उत्सव चलेगा. अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की कामना से और विवाहित महिलाएं पति की दुर्घायू व सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती है और भगवान शिव तथा माता पार्वती आराधना करती है. गणगौर केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरस्ता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है. शहर में बसे राजस्थानी समाज के लिए यह पर्व अपनी जडों से जुडे रहने का अवसर बन गया है. राजस्थानी समाज द्वारा अंतिम दिन चैत्र शुक्ल तृतीया को भगवान शिव और माता-पार्वती की शोभायात्रा निकाली जाएगी. जिसमें बडी संख्या में महिलाएं, युवतियां शामिल होंगी.
प्रशासन से अनुमति लेकर निर्धारित मार्गों से शोभायात्रा में भगवान शिव और माता पार्वती के प्रतीक ईसर गौरा की मूर्तियों को सर पर लिये चलते है और महिलाएं तथा युवतियां पारंपारिक राजस्थानी पोशाख परिधान कर शोभायात्रा में पारंपारिक राजस्थानी गीत गाते हुए चलती है और उसके बाद पारंपारिक रिति-रिवाज से प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है. राजस्थान की संस्कृति, आस्था और लोकपरंपराओं की सुंदर झलक फिर देखने को मिल रही है. होली के दूसरे दिन से गणगौर उत्सव की शुरुआत हो चुकी है. इसके तहत भगवान शिव (ईसर), माता पार्वती (गौरा) की प्रतिमा स्थापित कर पहली पूजा सुहाग सामग्री अर्पित की गई.
दूसरे दिन से सातवें दिन तक रोजाना सुबह और शाम मूर्तियों को जल अर्पण किया जाता है और शाम को समूह में गणगौर के गीत गाये जा रहे है. आठवें दिन अष्ठमी को विशेष पूजन और मेहंदी कार्यक्रम होंगे. कई महिला मंडलों द्वारा मेहंदी व पारंपारिक परिधान प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है. नौवें दिन से बारहवें दिन सामुहिक बिंदोरा निकाला जाएगा. तेरहवें दिन सिजारा होगा. इस दिन ससुराल पक्ष से घेवर, मिठाई, सुहाग और श्रृंगार का सामान भेजा जाता है. नई नवेली दुल्हने, महिलाएं व युवतियां नये वस्त्र पहनकर यह उत्सव मनाती है. 14 वें और 15 वें दिन गणगौर माता की झांकी सजायी जाती है और अंतिम 16 वें दिन चैत्र शुक्ल तृतीया को भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी और प्रतिमाओं का विधिवत विसर्जन किया जाएगा.

* 16 दिनों तक महिलाएं सुबह-शाम करती है पूजा-अर्चना
हर साल की तरह इस साल भी होली के दूसरे दिन गणगौर उत्सव की शुरुआत हो चुकी है. चैत्र शुक्ल तृतीया तक लगभग 16 दिनों तक चलने वाले इस पर्व पर महिलाएं, युवतियां रोजाना सुबह-शाम गणगौर माता की पूजा अर्चना करती है और पारंपारिक गीत गाती है. सिर पर मिट्टी या लडकी की सजी-धजी प्रतिमाएं लेकर शोभायात्रा निकालती है और अंतिम दिन गणगौर की झांकी निकालकर विधिवत विसर्जन किया जाता है.

* शहर में यहां हो रहा गणगौर पर्व का आयोजन
शहर के राजस्थानी समाज द्वारा शहर के विभिन्न स्थानों पर गणगौर पर्व को लेकर सामूहिक आयोजन किये जा रहे है. जिसमें राधाकृष्ण मंदिर, महेश भवन, अग्रसेन भवन, बिकानेरी भवन, धनराज लेन स्थित रंगारी गली आदि का समावेश है. राजस्थानी महिला मंडल और मारवाडी समाज संस्थाओं द्वारा सांस्कृतिक संध्या, मेहंदी स्पर्धा, पारंपारिक वेशभूषा स्पर्धा और भजन संध्या का भी आयोजित किया जा रहा है. कई स्थानों पर गणगौर माता की आकर्षक झांकियां भी सजाई गई है.

* महिलाओं और युवतियों में उत्साह
गणगौर उत्सव को लेकर महिलाओं और युवतियों में खासा उत्साह देखा जा रहा है. पारंपारिक राजस्थानी परिधान कर आभूषणों से सजी महिलाएं व युवतियां भगवान शिव व पार्वती की आराधना कर रही है. सुबह और शाम दोनों समय पारंपारिक राजस्थानी गीत गूंज रहे है. जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय दिखाई दे रहा है. युवतियां सोशल मीडिया पर उत्सव की तस्वीरें सांझा कर रही है. राजस्थानी समाज के कई परिवारों में पीडियों से चली आ रही गणगौर पूजन की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.

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