‘अमरावती मंडल’ की खबर साबित हुई सटीक

भाजपा ने कल का फैसला वापिस लिया

* भाजपा 69 सीटों पर चुनाव लडेगी
* वायएसपी के लिए केवल 6 सीटें छोडी
* विधायक संजय कुटे की पत्रवार्ता में घोषणा
* प्रभाग-11 में शैलेश राऊत, प्रभाग-17 में मृणाल चौधरी व प्रभाग-21 में गौरव बांते ही रहेंगे भाजपा के उम्मीदवार
* ‘मनभेद’ और ‘मतभेद’ के बीना अपने-अपने उम्मीदवारों को बनाएंगे विजयी
* कई प्रभागों में भाजपा और युवा स्वाभिमान पार्टी के बीच होगी सीधी लडाई
अमरावती/दि.3 – मनपा चुनाव को लेकर ‘अमरावती मंडल’ में प्रकाशित खबर एक बार फिर सटीक साबित हुई है. भारतीय जनता पार्टी ने कल लिया गया अपना फैसला वापस लेते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी 69 सीटों पर अपने अधिकृत उम्मीदवार उतारेगी, जबकि युवा स्वाभिमान पार्टी (वायएसपी) के लिए केवल 6 सीटें छोड़ी गई हैं. यह घोषणा भाजपा विधायक संजय कुटे ने शनिवार को आयोजित पत्रवार्ता में की. उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा और युवा स्वाभिमान पार्टी के बीच किसी भी प्रकार का गठबंधन नहीं है और दोनों दल अपने-अपने उम्मीदवारों को बिना किसी ‘मनभेद’ या ‘मतभेद’ के विजयी बनाने का प्रयास करेंगे. इस पत्रवार्ता में विधायक संजय कुटे ने बताया कि प्रभाग क्रमांक 11 से शैलेश राऊत, प्रभाग क्रमांक 17 से मृणाल चौधरी तथा प्रभाग क्रमांक 21 से गौरव बांते ही भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार बने रहेंगे. इन तीनों सीटों पर युवा स्वाभिमान पार्टी को समर्थन नहीं दिया जाएगा.
मनपा के आगामी चुनाव हेतु भाजपा द्वारा लिए गए इस फैसले के बाद शहर के कई प्रभागों में भाजपा और युवा स्वाभिमान पार्टी के बीच सीधी चुनावी भिड़ंत तय मानी जा रही है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा के इस स्पष्ट रुख से कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति समाप्त होगी और चुनावी रणनीति को मजबूती मिलेगी. भाजपा द्वारा 69 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही मनपा चुनाव की राजनीति में एक बार फिर नए समीकरण उभरते नजर आ रहे हैं.
* भाजपा का यू-टर्न: रणनीति की मजबूरी या सियासी संदेश?
अमरावती महानगरपालिका चुनाव की राजनीति में भाजपा द्वारा लिया गया ताजा यू-टर्न केवल एक संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक दबावों और जमीनी सच्चाइयों को दर्शाने वाला कदम माना जा रहा है. कल तक जिन सीटों पर युवा स्वाभिमान पार्टी (वायएसपी) को समर्थन देने की बात कही जा रही थी, वहां अब भाजपा ने अपने उम्मीदवार बरकरार रखने का फैसला कर लिया है.
* फैसला क्यों बदला?
सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर से उठती नाराजगी, कार्यकर्ताओं का दबाव और अपनों को नजरअंदाज करने की शिकायतें भाजपा नेतृत्व के लिए गंभीर बनती जा रही थीं. देर रात पार्टी नेताओं और पदाधिकारियों के साथ हुई बैठक में यह स्पष्ट संदेश सामने आया कि यदि अधिक सीटें छोड़ी गईं, तो इसका सीधा नुकसान संगठन और वोट बैंक को होगा. इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने 69 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का अंतिम फैसला लिया.
* वायएसपी को सीमित समर्थन का संकेत
भाजपा द्वारा युवा स्वाभिमान पार्टी के लिए केवल 6 सीटें छोड़ना यह दर्शाता है कि पार्टी अब किसी भी तरह का अघोषित गठबंधन करने के मूड में नहीं है. यह फैसला भाजपा की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूती देने के साथ-साथ यह संदेश भी देता है कि संगठन की प्राथमिकता अपने कार्यकर्ताओं और पारंपरिक मतदाताओं को साथ बनाए रखने की है.
* तीन प्रभागों का प्रतीकात्मक महत्व
प्रभाग क्रमांक 11, 17 और 21 में भाजपा उम्मीदवारों-शैलेश राऊत, मृणाल चौधरी और गौरव बांते-को बरकरार रखना केवल नामों का फैसला नहीं है. यह उन कार्यकर्ताओं के लिए संकेत है जो अंतिम समय में हुए फैसलों से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. इन प्रभागों में भाजपा का रुख स्पष्ट होने से अंदरूनी असंतोष को काफी हद तक शांत करने की कोशिश की गई है.
* सीधी टक्कर से क्या होगा असर?
अब कई प्रभागों में भाजपा और वायएसपी के बीच सीधी लड़ाई तय मानी जा रही है. इसका असर वोटों के विभाजन पर भी पड़ेगा. जहां भाजपा अपने संगठनात्मक ढांचे और कैडर के भरोसे मैदान में उतरेगी, वहीं वायएसपी स्थानीय प्रभाव और व्यक्तिगत संपर्क को हथियार बनाएगी. ऐसे में मुकाबला केवल दलों का नहीं, बल्कि ग्राउंड मैनेजमेंट बनाम स्थानीय पकड़ का होगा.
* ‘मनभेद नहीं, मतभेद नहीं’ के जरिए सियासी संदेश
विधायक संजय कुटे द्वारा मनभेद और मतभेद नहीं की बात कहना यह दर्शाता है कि भाजपा इस फैसले को टकराव नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा के रूप में पेश करना चाहती है. यह बयान संभावित नाराजगी को कम करने और भविष्य के राजनीतिक रिश्तों के दरवाजे खुले रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. भाजपा का यह यू-टर्न मनपा चुनाव को और अधिक रोचक बना रहा है. 69 सीटों पर अकेले दम पर उतरने का फैसला जहां संगठनात्मक मजबूती का दावा करता है, वहीं वायएसपी के साथ सीधी टक्कर भाजपा के लिए जोखिम और अवसर-दोनों लेकर आई है. अब असली परीक्षा मतदान के दिन होगी, जहां यह स्पष्ट होगा कि भाजपा का यह बदला हुआ रुख रणनीतिक जीत साबित होता है या राजनीतिक मजबूरी.

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