इसे ही कहते हैं राजनीति… जो आगे चलकर भारी पड सकता है, उसे अभी रोकना बेहतर

खुद को महापौर पद का प्रत्याशी घोषित करना पड गया एड. प्रशांत देशपांडे पर भारी

* महापौर पद पर नजर रखनेवाले नेताओं व दावेदारों की आंखों में खटक गए थे एड. देशपांडे
* धुआंधार प्रचार दौरान मिलते जबरदस्त समर्थन को देखकर भी कईयों के पैरों तले से खिंसक गई थी जमीन
* अंबापेठ प्रभाग से भाजपा की टिकट सहित जीत के प्रबल दावेदार थे प्रशांत देशपांडे
* टिकट मिलना माना जा रहा था पूरी तरह से पक्का, टिकट कटने से एड. देशपांडे सहित हर कोई हैरत में
अमरावती/दि.31 – भारतीय जनता पार्टी सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मजबूत गढ कहे जाते प्रभाग क्र. 13 अंबापेठ से इस बार पार्टी एवं संगठन के साथ दो पीढियों से गहरा जुडाव रखनेवाले एड. प्रशांत देशपांडे को भाजपा की टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा था. चूंकि अब तक महापौर पद के आरक्षण का ड्रॉ नहीं निकला है. जिसके चलते यह भी माना जा रहा था कि, यदि अमरावती में महापौर पद सर्वसामान्य प्रवर्ग के लिए खुला रहता है, तो एड. प्रशांत देशपांडे इस पद के लिए भी प्रबल दावेदार हो सकते है. जिसके चलते एड. प्रशांत देशपांडे को भावी पार्षद के साथ-साथ भावी महापौर के तौर पर भी देखा जाने लगा था. लेकिन शायद यहीं पर असल राजनीति शुरु हो गई और ‘जो आगे चलकर अपने पर भारी पड सकता है, उसे अभी रोक दो’ वाली मानसिकता के तहत कुछ राजनीतिज्ञों ने अपना ‘खेला’ कर दिया. जिसके तहत ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी’ की तर्ज पर एड. प्रशांत देशपांडे की टिकट ही काट दी गई, ताकि न वे भाजपा की ओर से पार्षद निर्वाचित हो पाएं और न ही आगे चलकर महापौर पद की राह में कोई बाधा ही बन सके. ऐसे में कहा जा सकता है कि, यही अपने-आप में राजनीति का असल चेहरा है और इसी राजनीति का एड. प्रशांत देशपांडे शिकार हुए है.
यहां इस खबर का आशय एड. प्रशांत देशपांडे का महिमामंडन करना या उनका पक्षधर बनना कतई नहीं है, बल्कि प्रमुख उद्देश्य शहरवासियों को राजनीति का असल चेहरा दिखाना और राजनीतिज्ञों को आईना दिखाना है. कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि, एड. प्रशांत देशपांडे एक पढे-लिखे, प्रतिष्ठित व संभ्रांत परिवार से वास्ता रखने के साथ ही खुद अपने-आप में बेहद सम्मानित एवं बेदाग व्यक्तित्व है. उनके पिता स्व. एड. विजयराव देशपांडे अपने समय के बेहद नामांकित वकील रहने के साथ ही क्रीडा क्षेत्र से गहरा जुडाव रखा करते थे एवं श्री हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल की कार्यकारिणी में अग्रपंक्ति वाले पदाधिकारी भी थे. वहीं माता सौ. विद्याताई देशपांडे अमरावती शहर की पूर्व महापौर रहने के साथ ही श्री अंबादेवी संस्थान की अध्यक्षा भी रही. इसके अलावा खुद एड. प्रशांत देशपांडे शहर के वरिष्ठ विधिज्ञ रहने के साथ ही हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल, महाराष्ट्र धनुर्धर एसोसिएशन, महाराष्ट्र वॉलीबॉल एसोसिएशन तथा महाराष्ट्र ओलंपिक एसोसिएशन जैसे नानाविध क्रीडा संगठनों के साथ जुडे हुए है और शहर भाजपा में सक्रिय रुप से सहभागी रहने के साथ-साथ वक्त जरुरत पडने पर शहर भाजपा को अपनी विधि सेवा भी उपलब्ध कराते है. इसके अलावा एड. प्रशांत देशपांडे का नाट्यविधा क्षेत्र से भी बेहद गहरा संबंध है तथा वे युवाओं के सुप्त कलागुणों को प्रोत्साहित करने हेतु व्यापक मंच भी उपलब्ध कराते है. इन सबके साथ ही देशपांडे परिवार का संघ एवं भाजपा के साथ गहरा जुडाव भी सर्वविदित कहा जा सकता है. जिसके चलते जैसे ही एड. प्रशांत देशपांडे ने अंबापेठ प्रभाग से भाजपा की टिकट के लिए दावेदारी पेश कि, तो यह लगभग तय मान लिया गया था कि, भाजपा में एड. प्रशांत देशपांडे की टिकट लगभग पक्की है. परंतु हैरत उस समय हुई, जब इतनी जबरदस्त पृष्ठभूमि रहने के बावजूद भाजपा द्वारा एड. प्रशांत देशपांडे की टिकट काट दी गई.
यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि, क्रीडा, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र से संबंधित गुणों को अपने माता-पिता से विरासत में प्राप्त करनेवाले एड. प्रशांत देशपांडे ने हमेशा ही जिला वकील संघ के चुनावों में अपने राजनीतिक कौशल्य व निपुणता का परिचय दिया. परंतु वे राजनीति की मुख्य धारा में कभी भी स्पष्ट रुप से सक्रिय नहीं रहे, बल्कि उन्होंने हमेशा भाजपा के लिए ‘अंडर करंट’ काम करते हुए पार्टी में ‘करंट’ यानि उर्जा प्रवाहित करने का काम किया तथा विगत 15-20 वर्षों के दौरान एड. प्रशांत देशपांडे ने भाजपा में कई नए व पुराने चेहरों को राजनीतिक पटल पर चमकाने में अपनी ओर से भरपूर योगदान भी दिया. लेकिन जैसे ही एड. प्रशांत देशपांडे ने खुद मुख्य धारा की राजनीति में आने और चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय लिया, वैसे ही कई लोगों के माथे पर चिंता की लकिरे पड गई. क्योंकि जो प्रशांत देशपांडे अब तक उनके लिए काफी हद तक सुविधापूर्ण व मददगार साबित हो रहे थे, वही प्रशांत देशपांडे आगे चलकर उनके लिए सिरदर्द और राजनीतिक रुप से बाधा साबित हो सकते थे. जिसके चलते ऐसे लोगों ने अपनी राजनीति को बचाए रखने के लिए एड. प्रशांत देशपांडे के साथ ही एक तरह से राजनीति कर डाली और एड. प्रशांत देशपांडे आगे चलकर उन पर भारी न पड जाए, इस बात के मद्देनजर एड. प्रशांत देशपांडे की ऐन समय पर टिकट ही काट दी गई.
बता दें कि, इस बार अंबापेठ प्रभाग से भाजपा की टिकट पर चुनाव लडने की इच्छा व्यक्त करने के बाद एड. प्रशांत देशपांडे को भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं व प्रमुख पदाधिकारियों से टिकट मिलने को लेकर सकारात्मक संकेत भी मिले थे. जिस पर भरोसा करते हुए एड. प्रशांत देशपांडे ने अंबापेठ प्रभाग में जबरदस्त तरीके से अपना जनसंपर्क व प्रचार अभियान भी शुरु किया था. साथ ही उनके इस अभियान को अंबापेठ प्रभागवासियों की ओर से जबरदस्त प्रतिसाद व समर्थन भी मिल रहा था. जिसके फोटो व वीडियो एड. प्रशांत देशपांडे के फेसबुक अकाउंट व इंस्टा आईडी पर पोस्ट होने के साथ ही सोशल मीडिया के विविध प्लेटफॉर्म पर जमकर वायरल और शेयर भी हो रहे थे. संभवत: यही बात एड. प्रशांत देशपांडे के ‘गुप्त हितशत्रुओं’ की आंखों में खटक गई. क्योंकि प्रचार अभियान के पहले ही चरण के दौरान एड. प्रशांत देशपांडे जीत की तरफ बढत बनाते दिख रहे थे. ऐसे में यदि एड. प्रशांत देशपांडे को टिकट मिल जाती और यदि वे वाकई चुनाव जीत जाते, साथ ही यदि अमरावती का अगला महापौर पद सर्वसाधारण प्रवर्ग के लिए खुला रहता, तो उस सूरत में एड. प्रशांत देशपांडे निश्चित तौर पर महापौर पद के सबसे प्रबल दावेदार रहे होते. ‘अगर-मगर’ वाली इन्हीं तमाम संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए महापौर पद पर अपनी नजर रखनेवाले कुछ अन्य दावेदारों ने समय रहते एड. प्रशांत देशपांडे के बढते कदम को रोकने की रणनीति पर काम करना शुरु किया. जिसके तहत सोची-समझी राजनीति के तहत एड. प्रशांत देशपांडे की टिकट ही काट दी गई, ताकि आगे चलकर मनपा में एड. प्रशांत देशपांडे की वजह से कम से कम महापौर पद को लेकर कोई समस्या न हो.
* टिकट कटने के बावजूद बेहद शांत और संयत भूमिका
यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि, गत रोज लगभग सभी राजनीतिक दलों ने कमोबेश एक साथ ही अपने-अपने अधिकृत प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की और पार्टी प्रत्याशियों को एक झटके के साथ बी-फॉर्म बांटे गए, इस समय कई इच्छुकों ने अपनी पार्टी द्वारा खुद का टिकट काट दिए जाने के चलते बगावत का झंडा बुलंद करते हुए किसी अन्य पार्टी से टिकट हासिल कर लिया. साथ ही अपनी पुरानी पार्टी को लेकर जबरदस्त तरीके से अपनी भडास भी निकाली. परंतु इस जबरदस्त राजनीतिक उठापटक, गहमा-गहमी व उहापोह वाली स्थिति में एड. प्रशांत देशपांडे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति रहे, जिनकी ओर से अपनी टिकट कट जाने के बाद न तो पार्टी के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया गया और न ही पार्टी के खिलाफ कोई बयान ही दिया गया. बल्कि पार्टी द्वारा एड. प्रशांत देशपांडे को प्रत्याशी नहीं बनाए जाने और उनकी टिकट काट दिए जाने की खबर मिलते ही जब कई समर्थक एड. प्रशांत देशपांडे से मिलने हेतु उनके घर पर पहुंचे तथा उनसे हर हाल में चुनाव लडने का आग्रह किया, तो एड. प्रशांत देशपांडे ने अपने सभी समर्थकों से कहा कि, उन्हें ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना है. बल्कि शांत व संयम रहते हुए आगे भी पार्टी के लिए ही काम करना है. जिसके चलते बगावत करने या किसी अन्य पार्टी की टिकट पर अथवा निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लडने का सवाल ही नहीं उठता. साथ ही एड. प्रशांत देशपांडे ने अपने समर्थकों से भी इधर-उधर नहीं जाने और पार्टी के साथ ही बने रहने का आवाहन किया.
* भाजपा सहित विरोधियों का भी हुआ नुकसान
पढने व सुनने में भले ही आश्चर्यजनक लग सकता है, लेकिन अंबापेठ प्रभाग में एक जमीनी हकीकत यह भी है कि, एड. प्रशांत देशपांडे की स्वीकार्यता भाजपा सहित अन्य दलो से वास्ता रखनेवाले नेताओं व पदाधिकारियों में भी है और उनके विरोधियों द्वारा भी उनकी नेतृत्व क्षमता व राजनीतिक कौशल का लोहा माना जाता है. यही वजह रही कि, अन्य दलो से वास्ता रखनेवाले पूर्व पार्षद दिनेश बूब व जीतू ठाकुर सहित मनीष करवा जैसे चुनाव लडने के इच्छुकों ने केवल इस बात को ध्यान में रखते हुए अपने कदम पीछे खींचे थे कि, अगर ‘प्रशांतभाऊ’ चुनाव लड रहे है, तो हम उनके खिलाफ अपनी दावेदारी पेश नहीं करेंगे. यही सोचकर अंबापेठ प्रभाग की राजनीति पर अपनी मजबूत पकड रखनेवाले इन दावेदारों ने अपने नामांकन ही दायर नहीं किए थे. ऐसे में कहा जा सकता है कि, एड. प्रशांत देशपांडे का टिकट कटने के चलते जहां अंबापेठ प्रभाग में खुद भाजपा का एक प्रबल दावेदार के लिहाज से नुकसान हुआ है, वहीं दूसरी ओर इस निर्णय के चलते विपक्षी दलों से वास्ता रखनेवाले कुछ अन्य प्रबल दावेदारों का भी नुकसान हुआ है, जिन्होंने एड. प्रशांत देशपांडे की दावेदारी को ध्यान में रखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए थे. इस बात को भी ध्यान में रखते हुए आकलन किया जा सकता है कि, भाजपा ने एड. प्रशांत देशपांडे का टिकट काटकर खुद का कितना बडा नुकसान किया है.
* एड. प्रशांत देशपांडे की टिकट काटने के पीछे आखिर किसका हाथ?
चूंकि एड. प्रशांत देशपांडे को अंबापेठ प्रभाग में शुरु से ही भाजपा के टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, साथ ही एड. प्रशांत देशपांडे के ‘ऑरा’ को देखते हुए उन्हें टिकट मिलना भी लगभग तय था. साथ ही पार्टी के कुछ वरिष्ठों की ओर से टिकट को लेकर सकारात्मक संकेत व ठोस ‘शब्द’ मिलने के बाद ही एड. प्रशांत देशपांडे ने अंबापेठ प्रभाग में अपना चुनाव प्रचार करना शुरु किया था. जिसे जबरदस्त समर्थन व प्रतिसाद भी मिल रहा था. लेकिन इसके बावजूद कल ऐन समय पर एड. प्रशांत देशपांडे की टिकट काट दी गई. जिसके चलते हर कोई हैरत में रहने के साथ ही इस सवाल का जवाब जानना चाह रहा है कि, आखिर पिछले दो-तीन दिनों के दौरान पर्दे के पीछे किन लोगों के द्वारा कौनसी राजनीति खेली गई, जिसका शिकार एड. प्रशांत देशपांडे हुए है. इसके बारे में की गई पडताल के दौरान कुछ बेहद विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर कहा जा सकता है कि, अंबापेठ प्रभाग से भाजपा की टिकट के लिए प्रबल दावेदार रहनेवाले एड. प्रशांत देशपांडे ने खुद को आगे चलकर महापौर पद सर्वसाधारण प्रवर्ग हेतु खुला रहने पर महापौर पद के लिए भी प्रत्याशी बताना शुरु कर दिया था और यही बात एड. प्रशांत देशपांडे के लिए भारी व उलटी पड गई. क्योंकि महापौर पद पर कुछ अन्य लोगों की भी नजरे गडी हुई थी. जिनकी आंखों में एड. प्रशांत देशपांडे खटकने शुरु हो गए थे. जाहीर सी बात है कि, अगर एड. प्रशांत देशपांडे भाजपा की टिकट पर पार्षद निर्वाचित हो जाते, तो निश्चित रुप से पिछली बार मनपा की राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखनेवाले ‘जय-वीरु’ की जोडी पर इस बार भारी पडते. साथ ही साथ एड. प्रशांत देशपांडे के रुप में शहर भाजपा में एक नई लीडरशीप का भी उदय होता. यह बात ‘जय-वीरु’ की जोडी सहित शहर भाजपा को इस समय अपनी मुठ्ठी में रखनेवाली एक और जोडी को काफी हद तक नागवार गुजर रही थी. जिसके चलते ‘उन’ दो जोडियों ने बडनेरा क्षेत्र से वास्ता रखनेवाले ‘पांचवें’ के साथ मिलकर एड. प्रशांत देशपांडे की दावेदारी सहित उनके राजनीतिक भविष्य पर मिट्टी डालने का काम किया है.

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