अंतत: सहकार विभाग का ‘वह’ अध्यादेश रद्द
सभासद की व्याख्या में हुआ तीसरी बार संशोधन

मुंबई/दि.19 – सहकारी संस्थाओं में क्रियाशील व अक्रियाशील सभासदों की व्याख्या स्पष्ट करने वाले महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम को पीछे लेने का निर्णय गत रोज हुई मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया. कांग्रेस व राकांपा को शह देने हेतु भाजपा व शिवसेना सरकार द्बारा लाए गए इस अध्यादेश को राकांपा के अजित पवार गुट के सत्ता में शामिल होने के उपरान्त पीछे ले लिया गया है.
बता दें कि, सहकारी संस्थाओं के क्रियाशील व अक्रियाशील सभासदों की व्याख्या को स्पष्ट करते हुए महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम की कुछ धाराओं में संशोधन किया गया था. जिसमें कहा गया था कि, किसी भी सहकारी संस्था का सदस्य संबंधित संस्था की आमसभा में 5 वर्ष की कालावधी के दौरान कम से कम एक बार उपस्थित रहना ही चाहिए. साथ ही उसके द्बारा 5 वर्ष की कालावधी के दौरान कम से कम एक बार संस्था द्बारा दी जाने वाली सेवाओं अथवा उत्पादित किए जाने वाले उत्पादों का प्रयोग किया जाना चाहिए. तभी ऐसे सदस्य को क्रियाशील सदस्य माना जाएगा. जिसे मतदान करने और संस्था का चुनाव लडने का अधिकार होगा. वहीं अन्य अक्रियाशील सदस्यों के पास संबंधित संस्था में मतदान करने अथवा चुनाव लडने का अधिकार नहीं रहेगा. राज्य सरकार द्बारा लिए गए इस फैसले से राज्य की राजनीति और सहकार क्षेत्र में अच्छा खासा हडकंप व्याप्त हो गया था. साथ ही इसे सरकार द्बारा कांगे्रस व राकांपा की ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली पकड को कमजोर करने के प्रयास के तौर पर देखा गया. क्योंकि सहकारी संस्थाओं के जरिए कांग्रेस व राकांपा ने विगत लंबे समय से ग्रामीण एवं तहसील क्षेत्रों की राजनीति में अपना वर्चस्व बना रखा है. परंतु अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का एक बडा धडा राकांपा नेता अजित पवार के नेतृत्व में पाला बदलकर राज्य की शिंदे-फडणवीस सरकार में शामिल हो गया. इसके चलते राज्य सरकार ने भी उक्त अध्यादेश को वापिस लेने का निर्णय लिया है.
* मतदान का अधिकार रहेगा कायम
राकांपा का अजित पवार के नेतृत्व वाला गुट सत्ता में शामिल होने ेके बाद राकांपा नेता व विधायक दिलीप वलसे पाटील को सहकार मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया. जिससे पहले अधिनियम संशोधन का विधेयक पावसकालीन सत्र में रखा जाना था. परंतु राज्य के सहकार मंत्री दिलीप वलसे पाटिल ने इस विधेयक को चर्चा में नहीं लिए जाने का निवेदन विधानसभा अध्यक्ष से किया था. ऐसे मेें इस विधेयक पर पावस सत्र के दौरान कोई चर्चा नहीं हुई. वहीं अब गत रोज हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन के अध्यादेश को ही वापिस लेने का निर्णय लिया है. जिसके चलते सहकार क्षेत्र से जुडे दिग्गजों ने राहत की सांस ली.