सरकार विरोधी सामग्री के आरोप में विश्वविद्यालय ने हटाई कादंबरी
अमरावती में साहित्य को लेकर नया राजनीतिक विवाद

* पाठ्यक्रम से ‘ते पन्नास दिवस’ बाहर
अमरावती /दि.6– संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय में एक बड़ा विवाद सामने आया है, जहां कोरोना काल के सरकारी निर्णयों की आलोचना करने के आरोप में ‘ते पन्नास दिवस’ कादंबरी को बी.ए. मराठी के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है. इस निर्णय के बाद शैक्षणिक और साहित्यिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है.
जानकारी के अनुसार, लेखक पवन भगत की इस कादंबरी को छह महीने पहले ही विधिवत प्रक्रिया पूरी कर पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था और इसकी पढ़ाई भी शुरू हो चुकी थी. मराठी अध्ययन मंडल के अध्यक्ष डॉ. काशीनाथ बर्हाटे ने बताया कि विशेषज्ञों की सहमति से पुस्तक को पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया था.
हालांकि, 9 दिसंबर को हुई बैठक में कुछ सदस्यों ने इस पर आपत्ति जताई. इसके बाद कुलगुरु डॉ. मिलिंद बारहाते ने मामले को पुनर्विचार के लिए समिति के पास भेजा. विशेष बात यह रही कि डॉ. मोना चिमोटे के नेतृत्व वाली समिति ने पुस्तक में कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं होने की बात कही थी, फिर भी विवाद थमा नहीं. आखिरकार विद्या परिषद की बैठक में इस मुद्दे पर मतदान कराया गया, जिसमें 23 के मुकाबले 8 मतों से कादंबरी को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय लिया गया.
विवाद की जड़ में विद्या परिषद सदस्य संगीता जगताप द्वारा उठाई गई आपत्ति है. उन्होंने कुलसचिव को पत्र देकर आरोप लगाया था कि कादंबरी में मजदूरों की पीड़ा के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदू विचारधारा पर गलत तरीके से टिप्पणी की गई है. उनके अनुसार, कोरोना लॉकडाउन के दौरान सरकार के निर्णयों का विकृत चित्रण किया गया है. इस मुद्दे पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी विरोध जताया था. वहीं, लेखक पवन भगत ने इस निर्णय को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताते हुए इसे अघोषित आपातकाल करार दिया है उनका कहना है कि विश्वविद्यालय ने पहले स्वयं इस कृति का चयन किया और अब राजनीतिक दबाव में इसे हटाया जा रहा है. इस पूरे घटनाक्रम के बाद अमरावती में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति के हस्तक्षेप को लेकर बहस तेज हो गई है.
* लेखनी पर राजनीति की छाया
विश्वविद्यालय के इस फैसले ने साहित्यिक जगत में असंतोष पैदा कर दिया है. आलोचकों का मानना है कि शैक्षणिक विषयों में बढ़ता राजनीतिक हस्तक्षेप चिंताजनक है. मजदूरों की पीड़ा को दर्शाने वाली रचना को हटाने के निर्णय ने शिक्षा के राजनीतिकरण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.





