विदर्भ

देश में पहली बार होगी हाथी गणना

महाराष्ट्र में अधिवास न रहने से सहभाग नहीं

  • 60 प्रतिशत हाथी भारत में

नागपुर/दि.11 – विश्वभर में हाथी की शिकार होती है. उनके निवास की जगह लुप्त हो रही है. इस कारण हाथी की संख्या बडी मात्रा में कम हुई है. जिससे धोखे में आयी हुई इस प्रजाति की गणना पहली बार ही की जाएगी. किंतु महाराष्ट्र में हाथी का अधिवास न रहने से गणना नहीं की जाएगी, इस तरह की जानकारी है. महाराष्ट्र में सिंधुदूर्ग जिले में आने वाले हाथी यह यात्री है. वे कर्नाटक से आते है.
भारत में सर्वाधिक 60 प्रतिशत हाथी है. शेष हाथी थाईलैंड, मलेशिया, नेपाल, म्यानमार, कंबोडिया, भुतान में है. इस वर्ष पहली बार हाथी की विष्टा पर से डिएनए निकालकर उसकी पहचान निश्चित कर गणना की जाएगी. किंतु महाराष्ट्र में हाथी का अधिवास ही नहीं है, जिससे उसका प्रोटोकॉल अभी तक तैयार नहीं किया गया. किंतु देशभर में पहली बार ही हाथी की गणना की जाएगी. प्रशिक्षण प्रक्रिया अमल में लायी जा रही है. कुछ जगह का प्रशिक्षण भी पूर्ण हुआ है. शेष हिस्से की प्रशिक्षण की प्रक्रिया पूर्ण होना बाकी है. यह समूची प्रक्रिया अमल में लाकर आंकडे विविध चरणों में 2023 के अंत तक सामने आयेंगे. साथ ही बाघ व तेंदुए की भी गणना होगी. हाथी के संरक्षण के लिए प्रथम स्थानीक व उस प्रदेश के लोगों का सहभाग रहने पर जोर दिया गया है. भारत छोड हाथी पाये जाने वाले अन्य देशों में अब हाथी की शिकार व निवास की जगह लगभग खत्म होने के कारण हाथी की संख्या कम हुई है. इसी कारण खतरे में आयी हुई प्रजाति की आययुसीएन सूची में आशियाई हाथी का समावेश किया गया है. वर्तमान गणना अंदाज के अनुसार विश्व में अब केवल 50 से 60 हजार हाथी है. इनमें से 60 प्रतिशत से ज्यादा हाथी भारत में हैं. विश्व हाथी दिन यह हाथी की गैरकानूनी शिकार, हस्ती दंत की तस्करी को रोकने के लिए योग्य नीति बनाना व इस मार्ग से हाथी के संवर्धन से संबंधित आगामी दिशा निश्चित करने की दृष्टि से यह निर्णय लिया गया है, ऐसा कहा जाता है. विदर्भ में ताडोबा-अंधारी, कमलापुर में ही वनों के काम करने के लिए केवल हाथी है.

  • महाराष्ट्र में हाथी का अधिवास न रहने से उसकी गणना नहीं की जाएगी. कर्नाटक से सिंधुदुर्ग जिले के कुछ हिस्से में 5 से 6 हाथी आते है और खेत का नुकसान करते है. उसके बाद फिर वह लौटकर कर्नाटक चले जाते है. जिससे राज्य में हाथी गणना नहीं की जाएगी.
    – सुनील लिमय, प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (वन्यजीव)
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