सदन में बहुमत के लिए भाजपा ने मिलाया था एमआईएम से हाथ
अकोट नप को लेकर आखिर इतना हंगामा क्यों हैं बरपा

* गठबंधन में शिवसेना के दोनों धडे व बच्चू कडू की प्रहार भी शामिल
* अकोट विकास मंच नामक गुट को जिलाधीश के पास किया गया था पंजीकृत
* भाजपा पार्षद रवि ठाकुर को बनाया गया था गुट नेता, ठाकुर का व्हीप गुट पर होना था लागू
* किसी भी दल के स्थानीय नेताओं ने वरिष्ठों से नहीं ली थी पूर्व अनुमति
* हंगामा मचते ही भाजपा व एमआईएम के वरिष्ठ नेताओं ने दर्शाया कडा रुख
* सीएम फडणवीस की नाराजगी के बाद भाजपा ने विधायक प्रकाश भारसाकले के नाम जारी किया शोकॉज नोटिस
* एमआईएम के प्रदेश उपाध्यक्ष युसूफ पुंजानी ने भी अपने पार्षदों को दी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी
* शिवसेना के दोनों धडों व प्रहार पार्टी के नेताओं ने अभी स्पष्ट नहीं की अपनी भूमिका
* विधायक प्रकाश भारसाकले ने भी शोकॉज नोटिस पर फिलहाल नहीं दिया कोई स्पष्टीकरण
अकोट /दि.8 – अकोट नगर परिषद में सत्ता संतुलन साधने के लिए सांसद असदउद्दीन ओवैसी के नेतृत्ववाली ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमिन यानि एमआईआई के साथ भाजपा द्वारा किया गया राजनीतिक गठबंधन अब खुद भाजपा के लिए भारी सिरदर्द बन गया है. सदन में बहुमत हासिल करने के उद्देश्य से स्थानीय स्तर पर लिए गए फैसलों ने न केवल पार्टी नेतृत्व को असहज किया, बल्कि राज्य स्तर तक राजनीतिक भूचाल ला दिया.
बता दें कि, अकोट में विकास के नाम पर गठित अकोट विकास मंच में एमआईएम सहित विभिन्न दलों के निर्वाचित नगरसेवकों को साथ लेकर भाजपा ने सत्ता स्थापना की थी. लेकिन इस अभद्र गठबंधन पर चारों ओर से हुई तीव्र आलोचना के चलते यह गठबंधन टूट गया. एमआईएम के प्रदेश उपाध्यक्ष मोहम्मद युसूफ मोहम्मद शफी पुंजानी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि भाजपा को समर्थन दिया गया तो एमआईएम नगरसेवकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी. इसी कारण अकोट का यह गठबंधन समाप्त हो गया. इस बीच भाजपा प्रदेशाध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने अकोट के विधायक प्रकाश भारसाकले को कारण बताओ नोटिस जारी किया है.
अकोट नगर परिषद में भाजपा की माया घुले नगराध्यक्ष तो चुनी गईं, लेकिन 35 सदस्यीय परिषद में भाजपा को बहुमत नहीं मिला. भाजपा को सर्वाधिक 11 सीटें मिलीं. ऐसे में भाजपा ने अपनी ओर से पहल करते हुए अकोट विकास मंच बनाया. इसमें भाजपा के बाद सबसे अधिक सीटें जीतने वाला एमआईएम, शिंदे गुट की शिवसेना, ठाकरे गुट की शिवसेना, अजित पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस और बच्चू कडू की प्रहार जनशक्ति पार्टी शामिल हुई थी. इस नए गठबंधन का पंजीयन अकोला जिलाधिकारी कार्यालय में किया गया था. भाजपा नगरसेवक रवि ठाकुर को इस गठबंधन का गुटनेता बनाया गया. इस गठबंधन के सभी नगरसेवकों को भाजपा का व्हिप मानना अनिवार्य था. 13 जनवरी को होने वाली उपनगराध्यक्ष और स्वीकृत सदस्य की चुनाव प्रक्रिया में यह गठबंधन संयुक्त रूप से मतदान करने वाला था.
खास बात यह है कि, भाजपा के साथ अकोट विकास मंच में शामिल होनेवाले एमआईएम के 5 नगरसेवकों ने भी पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को विश्वास में लिए बिना भाजपा को समर्थन दिया था. इस पर एमआईएम ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि समर्थन देने वाले नगरसेवकों को पार्टी से निष्कासित किया जाएगा. परिणाम स्वरूप एमआईएम के पांच नगरसेवक अब इस गठबंधन से बाहर हो गए. साथ ही दूसरी ओर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने विधायक प्रकाश भारसाकले को नोटिस जारी कर कहा कि एमआईएम के साथ गठबंधन कर आपने भाजपा की नीति और ध्येय को नुकसान पहुंचाया है. बिना किसी को विश्वास में लिए इस कदम से पार्टी की छवि धूमिल हुई है. इस पर आप पर कार्रवाई क्यों न की जाए, इसका स्पष्टीकरण तुरंत दें. हालांकि अब तक विधायक प्रकाश भारसाकले ने अपनी ओर से पार्टी को कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है.
* ‘अकोट विकास मंच’ के गठन से भड़का विवाद
उल्लेखनीय है कि, अकोट नगर परिषद के चुनाव पश्चात स्थानीय नेताओं द्वारा यह गठजोड़ तैयार किया गया और सत्ता संचालन को वैध रूप देने के लिए ‘अकोट विकास मंच’ नामक एक गुट का गठन किया गया, जिसे जिलाधिकारी कार्यालय में विधिवत पंजीकृत भी कराया गया. भाजपा पार्षद रवि ठाकुर को इस गुट का नेता बनाया गया और गुट पर व्हीप लागू करने का निर्णय लिया गया. यहीं से मामला गंभीर हो गया, क्योंकि यह निर्णय लेने से पहले संबंधित पार्टियों के स्थानीय नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं से कोई पूर्व अनुमति नहीं ली थी, जिसके चलते सबसे बड़ा विवाद यहीं से शुरू हुआ.
* हंगामा मचते ही बदला शीर्ष नेतृत्व का रुख
जैसे ही यह गठबंधन सार्वजनिक हुआ, भाजपा और एमआईएम-दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं ने कड़ा रुख अपनाया. भाजपा नेतृत्व को विशेष आपत्ति इस बात पर थी कि पार्टी की विचारधारा के विपरीत जाकर एमआईएम से समझौता किया गया. मामला मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तक पहुंचते ही भाजपा में खलबली मच गई. मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद पार्टी ने अकोट विधायक प्रकाश भारसाकले के नाम शोकॉज नोटिस जारी कर दिया. यह संकेत स्पष्ट था कि संगठन अब किसी भी स्तर की मनमानी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है. हालांकि, विधायक भारसाकले ने अब तक इस नोटिस पर कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है, जिससे अटकलें और तेज हो गई हैं.
* एमआईएम ने भी दिखाई सख्ती
उधर दूसरी ओर, एमआईएम के प्रदेश उपाध्यक्ष युसूफ पुंजानी ने भी अपने पार्षदों को स्पष्ट चेतावनी दी है कि पार्टी लाइन से हटकर कोई भी कदम उठाने पर कानूनी और संगठनात्मक कार्रवाई की जाएगी. एमआईएम के प्रदेश उपाध्यक्ष युसूफ पुंजानी द्वारा पार्षदों को दी गई कानूनी कार्रवाई की चेतावनी यह बताती है कि यह गठबंधन नीचे से ऊपर तक असहज था. यानी जिनके लिए समझौता किया गया, वे भी उसे खुलकर अपनाने को तैयार नहीं हैं. जिसके चलते एमआईएम के पांचों नगरसेवकों ने इस गठबंधन से खुद को अलग करने की घोषणा कर डाली. परंतु यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि, जब यह गुट अकोला जिलाधीश कार्यालय में पंजीकृत हो चुका है, तो अब ऐसी सूरत में एमआईएम के उन पांचों नगरसेवकों पर अकोट विकास मंच के गुट नेता की ओर से जारी होनेवाला व्हीप लागू होगा अथवा नहीं.
* शिवसेना के दोनों धडों व प्रहार की भूमिका अब भी रहस्य
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि शिवसेना के दोनों धड़े यानि शिंदे गुट वाली शिवसेना के साथ ही भाजपा का हर कदम पर विरोध करनेवाले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना उबाठा एवं पूर्व मंत्री बच्चू कडू के नेतृत्ववाली प्रहार जनशक्ति पार्टी के नगरसेवक भी भाजपा के साथ इस गठबंधन में शामिल हुए है. जहां तक शिंदे गुट वाली शिवसेना का मसला है, तो वह राज्यस्तर पर भाजपा के साथ युति में शामिल है. परंतु हमेशा ही भाजपा के खिलाफ भूमिका अपनाने वाले शिवसेना उबाठा व प्रहार जनशक्ति पार्टी के नेताओं ने अब तक अपनी भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं रखा है. ऐसे में क्या वे गठबंधन में बने रहेंगे या दूरी बनाएंगे, इस पर सस्पेंस कायम है. शिवसेना के दोनों धड़े और प्रहार पार्टी की चुप्पी यह भी बताती है कि वे स्थिति का राजनीतिक लाभ तौल रहे हैं. जरूरत पड़ी तो जिम्मेदारी भाजपा पर डालकर खुद को अलग कर लेंगे. यानी यह गठबंधन टिके या टूटे, नुकसान भाजपा को ही उठाना पड़ सकता है.
* बहुमत की भूख में विचारधारा की बलि, अब भुगत रही भाजपा
अकोट नगर परिषद में जो कुछ हुआ, वह महज एक स्थानीय सत्ता-समीकरण नहीं बल्कि भाजपा की संगठनात्मक अनुशासन व्यवस्था की खुली अवहेलना का मामला बन चुका है. बहुमत की गणितीय मजबूरी में स्थानीय नेतृत्व ने जिस तरह एमआईएम जैसी वैचारिक रूप से विरोधी पार्टी से हाथ मिलाया, उसने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को असहज ही नहीं, बल्कि आक्रोशित कर दिया. नगर परिषद में कुर्सी बचाने और सत्ता हथियाने के लिए भाजपा के स्थानीय कर्णधारों ने यह मान लिया कि संख्या ही सत्य है, चाहे उसके लिए पार्टी की मूल राजनीतिक रेखा ही क्यों न लांघनी पड़े. एमआईएम के साथ समझौता, शिवसेना के दोनों धड़ों और बच्चू कडू की प्रहार पार्टी को एक ही छत के नीचे लाना, यह सब स्थानीय स्वार्थ की प्रयोगशाला में गढ़ा गया प्रयोग था, जिसमें किसी भी दल के वरिष्ठ नेतृत्व को भरोसे में लेना जरूरी नहीं समझा गया.
* सियासी चतुराई या खुला विद्रोह?
यहां यह भी कहा जा सकता है कि, ‘अकोट विकास मंच’ नामक गुट का जिलाधीश के पास पंजीकरण कराना और भाजपा पार्षद रवि ठाकुर को गुट नेता बनाकर उस पर व्हीप लागू करना, यह सिर्फ तकनीकी कदम नहीं था, बल्कि यह दरअसल भाजपा के अधिकृत संगठन ढांचे के समानांतर सत्ता केंद्र खड़ा करने की कोशिश थी. यहीं से मामला समझौते से टकराव में बदल गया. भाजपा के लिए एमआईएम सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वैचारिक विरोध का प्रतीक है. ऐसे में बिना अनुमति गठबंधन का मतलब साफ था कि, स्थानीय सत्ता के लिए पार्टी लाइन से ऊपर कुछ भी नहीं. इसीलिए जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ, भाजपा और एमआईएम-दोनों के शीर्ष नेताओं ने फौरन डैमेज कंट्रोल मोड अपनाया.
* फडणवीस की नाराजगी, संगठन के लिए चेतावनी की घंटी
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की नाराजगी के बाद विधायक प्रकाश भारसाकले को शोकॉज नोटिस जारी होना कोई औपचारिक कार्रवाई नहीं मानी जा रही. राजनीतिक हलकों में इसे स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि भाजपा अब स्थानीय स्तर पर चल रहे ‘स्वतंत्र सत्ता प्रयोगों’ को बर्दाश्त नहीं करेगी, संगठन से ऊपर जाकर गठबंधन करने वालों पर सीधी कार्रवाई होगी. हालांकि, विधायक भारसाकले की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है, क्या वे सफाई देंगे या पार्टी को मजबूर करेंगे कि वह अगला कदम खुद उठाए?
* स्थानीय राजनीति बनाम केंद्रीय अनुशासन
अकोट नगर परिषद का यह मामला साफ दर्शाता है कि स्थानीय सत्ता की जोड़-तोड़ जब केंद्रीय नेतृत्व की नीति से टकराती है, तो उसका अंजाम राजनीतिक बवाल के रूप में सामने आता है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भाजपा इस पूरे प्रकरण में कितनी सख्ती दिखाती है और क्या यह गठबंधन वास्तव में टिक पाता है या फिर बिखर जाता है. अकोट नगर परिषद का यह प्रकरण भाजपा के लिए चेतावनी से ज्यादा एक लिटमस टेस्ट है. अगर पार्टी यहां सख्ती दिखाती है, तो संदेश जाएगा कि विचारधारा और संगठन सर्वोपरि हैं और अगर मामला दबा दिया गया, तो यह उदाहरण बनेगा कि स्थानीय सत्ता के लिए केंद्रीय नीति लचीली है. अकोट की लड़ाई दरअसल यह तय करेगी कि भाजपा अनुशासन की राजनीति करेगी या संख्या की राजनीति.





